तहलका टुडे टीम
लखनऊ।ईद-उल-फितर के मौके पर बड़ा इमामबाड़ा स्थित आसिफी मस्जिद में इस बार का मंजर सिर्फ इबादत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अकीदत, एहतेजाज (प्रोटेस्ट) और मजहबी एकता का संगम बनकर उभरा।
इस खास मौके पर उत्तर प्रदेश के पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. अनीस अंसारी ने शिया समुदाय के साथ नमाज़ अदा कर एक ऐसा संदेश दिया, जिसने सियासत से ऊपर उठकर इंसानियत और एकता को सामने रख दिया।
🕰️ वक्त से पहले मौजूदगी, जज़्बे का इज़हार
जहां आम लोग नमाज़ के वक्त के करीब पहुंचे,
वहीं डॉ. अनीस अंसारी सुबह 10 बजे ही मस्जिद पहुंच गए,
जबकि नमाज़ 11 बजे अदा हुई।
जहां आम लोग नमाज़ के वक्त के करीब पहुंचे,
वहीं डॉ. अनीस अंसारी सुबह 10 बजे ही मस्जिद पहुंच गए,
जबकि नमाज़ 11 बजे अदा हुई।
यह मोहब्बत, अकीदत, दर्द और एहतिजाज का ऐसा संगम था, जिसने हर दिल को छू लिया और वक्त के साथ एक यादगार बन गया।

🕌 पहली सफ में खड़ी एकता
नमाज़ की इमामत **मौलाना सरताज हैदर साहब** ने की।
पहली सफ में
– मौलाना फिरोज हुसैन,
– मौलाना शबाहत हुसैन,
– और उनके साथ डॉ. अनीस अंसारी—
👉 यह सिर्फ एक कतार नहीं, बल्कि मजहबी एकता की जिंदा तस्वीर थी।
🤲 एक नमाज़… जो अल्फ़ाज़ से बड़ी बन गई
सफें सजीं, तकबीर की आवाज़ बुलंद हुई—
और उन्हीं सफों में एक शख्सियत खामोशी से खड़ी थी—
👉 पूर्व आईएएस डॉ. अनीस अंसारी
उन्होंने शिया समुदाय के साथ नमाज़ अदा की—
लेकिन उनका अंदाज़ एक संदेश बन गया—
- पहली रकअत में हाथ खोलकर,
- दूसरी में हाथ बांधकर,
- कुनूत में हाथ नीचे रखकर—
👉 यह सब जैसे कह रहा था—
“फर्क़ इबादत के तरीके में हो सकता है, लेकिन दिल एक हैं।”
🕌 पहली सफ में खड़ी एकता
नमाज़ की इमामत **मौलाना सरताज हैदर साहब** ने की।
पहली सफ में
– मौलाना फिरोज हुसैन,
– मौलाना शबाहत हुसैन,
– और उनके साथ डॉ. अनीस अंसारी—
👉 यह सिर्फ एक कतार नहीं, बल्कि **मजहबी एकता की जिंदा तस्वीर** थी।
🤝 गले नहीं मिले… मगर दिल जुड़ गए
इस बार ईद का अंदाज़ थोड़ा बदला हुआ था—
👉 मुसाफ़ा हुआ, हाथ मिले… दिल जुड़े,
और फिर एक ऐसा लम्हा आया जिसने हर आंख को नम कर दिया—
👶 बच्चे आगे बढ़े…
👉 बड़ों के हाथ अपने सिर पर रखवाए,
👉 दुआएं लीं…
यह नज़ारा बता रहा था—
“तहज़ीब और अदब अभी जिंदा है।”
🌍 दुआ में फतह, लहजे में एहतिजाज
नमाज़ के बाद—
👉 ईरान की कामयाबी के लिए दुआ,
👉 अमेरिका और इज़रायल पर लानत,
और फिर—
👉 जमकर अमेरिका इजराइल के खिलाफ नारेबाजी, एहतिजाज, और ज़ालिम के खिलाफ खुला इज़हार।
यह सिर्फ गुस्सा नहीं था—
👉 यह इंसाफ की पुकार थी।
📺 पूरी दुनिया ने देखा—जब नमाज़ बनी एहसास
इस पूरी नमाज़ को Hussaini Channel ने लाइव प्रसारित किया।
👉 लखनऊ की इस मस्जिद से उठी दुआएं
👉 दुनिया के कोनों तक पहुंचीं,
और यह इबादत बन गई—
एक वैश्विक एहसास।
🎙️ आफताबे शरीयत की मौजूदगी—जब आवाज़ बनी रहनुमाई
इस मौके पर भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी,
👉 आफताबे शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब की मौजूदगी ने इस पूरे मंजर को और भी अहम बना दिया।
उन्होंने मीडिया से मुखातिब होते हुए बेहद दर्द और जिम्मेदारी के साथ कहा—
👉 “आज ईद का दिन है, लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में इंसानियत लहूलुहान है। ऐसे वक्त में हमारी जिम्मेदारी है कि हम मज़लूमों के साथ खड़े हों और अमन, इंसाफ और एकता का पैग़ाम दें।”
उन्होंने साफ किया—
- मजहब का असल मकसद इंसान को जोड़ना है,
- ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होना ही असली ईमान है,
- और शिया-सुन्नी एकता ही उम्मत की ताकत है।
उनके बयान ने
👉 इस नमाज़ को सिर्फ इबादत नहीं,
👉 बल्कि एक रहनुमाई (guidance) बना दिया।
👤 डॉ अनीस अंसारी—एक शख्सियत, कई पहचान
- LLM (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी)
- PhD (इकोनॉमिक्स), लखनऊ यूनिवर्सिटी
- सीनियर फेलो, ICSSR
- पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव / कृषि उत्पादन आयुक्त (UP)
- ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती लैंग्वेज यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति
- पूर्व चेयरमैन, (UPCC)
- उर्दू शायर, समाजसेवी
👉 उस दिन यह सब पहचानें एक जगह सिमट गईं—
“इंसानियत और एकता”
आसिफी मस्जिद की यह ईद की नमाज बता गई—
- नमाज़ सिर्फ इबादत नहीं, एक संदेश है,
- दुआ सिर्फ अपने लिए नहीं, मज़लूमों के लिए भी होती है,
- और जब आवाज़ उठती है,
तो वह इंसाफ की दिशा तय करती है।
यह ईद, यह नमाज़, और यह मंजर—
लखनऊ की सरज़मीं पर लिखा गया एक ऐसा पैग़ाम है
जो लंबे वक्त तक याद रखा जाएगा।




