वरिष्ठ पत्रकार जैगम मुर्तज़ा की क़लम से
पिछले तीन दिनों में आईआरजीसी ने दो-तीन ऐसे अहम कदम उठाए हैं, जिन्होंने अमेरिका और इज़रायल की सैन्य रणनीति को गहरे दबाव में ला दिया है। खाड़ी में मौजूद अमेरिकी अड्डों को बिजली सप्लाई करने वाले तमाम केंद्रों और उपकेंद्रों को टारगेट किया गया है। इसका सीधा असर वहां तैनात तक़रीबन 50 हज़ार अमेरिकी सैनिकों पर पड़ा है, जिन्हें अब बिजली और पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतों की क़िल्लत का सामना करना पड़ रहा है। यूएसएस जेरार्ड पर पहले सामने आई टॉयलेट और पानी की समस्या के बाद यह संकट कहीं ज़्यादा बड़ा और गंभीर माना जा रहा है।
इसके साथ ही अब सिविलियन हवाई अड्डों पर मौजूद जेट फ्यूल टैंक भी निशाने पर लिए गए हैं। पिछले दिनों यह ख़बरें सामने आई थीं कि अमेरिकी और इज़रायली जेट, मिलिट्री एयरबेस की ख़राब हालत के चलते सिविलियन हवाई पट्टियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। एयरक्राफ्ट कैरियर ऐसी दूरी पर नहीं हैं कि उनका उपयोग आसान और प्रभावी हो सके, और इज़रायल से उड़ान भरकर आना-जाना भी अब पहले जैसा सहज नहीं रह गया है। इसी सिलसिले में उन होटलों को भी निशाना बनाया गया है, जहां अमेरिकी अधिकारियों को बेस से हटाकर अस्थायी तौर पर ठहराया गया था। कुल मिलाकर अरब की ज़मीन पर अमेरिकी फौजियों के लिए हालात तंग कर दिए गए हैं — वह भी सीधे जान लेने के बजाय, भारी आर्थिक और रणनीतिक नुक़सान पहुंचाकर। संदेश बिल्कुल साफ़ है: “आप यहां रह तो सकते हैं, लेकिन आराम से नहीं।”
आईआरजीसी की यह रणनीति सिर्फ़ मिसाइल चलाने की नहीं, बल्कि दुश्मन की रोज़मर्रा की सैन्य क्षमता को धीरे-धीरे खोखला करने की है। यह युद्ध का वह मॉडल है जिसमें सामने वाले को एक ही झटके में खत्म नहीं किया जाता, बल्कि उसके हर सहारे — बिजली, पानी, ईंधन, रसद, आवागमन, अस्थायी ठिकाने और मनोबल — को क्रमशः कमज़ोर किया जाता है। यही वजह है कि अमेरिकी मौजूदगी अब सैन्य ताक़त से ज़्यादा बोझ जैसी दिखने लगी है।
दूसरी तरफ़, अमेरिका और इज़रायल के विमानों में लंबी दूरी की मिसाइलों का स्टॉक काफ़ी हद तक समाप्त हो चुका है। यही वजह है कि अब उन्हें ख़तरा उठाकर सीधे ईरानी एयरोस्पेस में दाख़िल होना पड़ रहा है। इस कोशिश में कई विमान निशाना भी बने हैं। एक डानकार के मुताबिक़, इससे ईरान को उतना बड़ा फर्क़ नहीं पड़ेगा जितना पश्चिमी मीडिया दिखाने की कोशिश कर रहा है। एफ-16, एफ-22 या एफ-35 जैसे विमान अगर शॉर्ट रेंज मिसाइलों से कुछ नुक़सान पहुंचा भी दें, तब भी वे “क़हर” नहीं बरपा सकते। वजह साफ़ है — मिलिट्री ग्रेड कंक्रीट और पहाड़ी सुरंगों के सामने ऐसी मिसाइलें निर्णायक साबित नहीं होतीं।
इज़रायल की इस वक़्त सबसे बड़ी कोशिश ईरानी एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करने की है, ताकि उसके बाद खुले आसमान में बमवर्षक विमानों के लिए रास्ता साफ़ हो सके। लेकिन ईरानी फ़ौज अभी अपने सारे एयर डिफेंस सिस्टम मैदान में नहीं उतार रही। इसका मतलब यह है कि उसने अभी अपने सारे पत्ते नहीं खोले हैं। जंग में यह सबसे अहम सैन्य बुद्धिमत्ता होती है — अपनी असली क्षमता को अंतिम क्षण तक छुपाकर रखना। जब तक ईरान के पास एक भी सक्रिय एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है, तब तक अमेरिकी बी-52 जैसे भारी बमवर्षक ईरानी आसमान में बेख़ौफ़ उड़ान नहीं भर सकते। और जब तक ग्रेविटी बमों का इस्तेमाल संभव नहीं होता, तब तक ईरान के भूमिगत ठिकानों, सुरंगों, पहाड़ी बंकरों और गहरे सैन्य अड्डों को निर्णायक नुक़सान पहुंचाना लगभग नामुमकिन है।
यही वजह है कि इस वक़्त ईरानी रणनीति बेहद संयमित, ठंडी और लंबी दूरी की नज़र वाली दिखाई देती है। वह तहख़ानों में रह सकता है, पहाड़ियों में वक़्त गुज़ार सकता है, और ज़मीन पर अपना नियंत्रण बनाए रख सकता है। जंग में सिर्फ़ यह नहीं देखा जाता कि किसके पास ज़्यादा हथियार हैं, बल्कि यह देखा जाता है कि किसके पास ज़्यादा सहनशक्ति, ज़्यादा गहराई और ज़्यादा वक़्त है। जब तक अमेरिका “एयर सुपीरियरिटी” स्थापित नहीं कर पाता, तब तक ईरान पर कोई बहुत बड़ा और निर्णायक ख़तरा नहीं बनता।
अब बात इस जंग के राजनीतिक असर की। ट्रंप एंड कंपनी बार-बार यह बयान दे रहे हैं कि सऊदी अरब, क़तर, क़ुवैत और यूएई इस जंग में उनके साथ हैं। लेकिन असल में यह एक रणनीतिक ट्रैप भी हो सकता है। मक़सद यह है कि ईरान को इतना उकसाया जाए कि वह ग़ुस्से में अरब देशों के सिविलियन टार्गेट्स पर हमला कर बैठे। अगर ऐसा होता है, तो जंग का नैरेटिव अचानक बदल जाएगा और ईरान को “पूरे अरब जगत के ख़िलाफ़” खड़ा दिखाने की कोशिश की जाएगी।
अरब देशों की परेशानी यह है कि वे ट्रंप को खुलकर कुछ कह नहीं सकते, और दूसरी तरफ़ ईरान से सीधे लड़ने की हालत में भी नहीं हैं। वे इस आग में झोंके जाना नहीं चाहते, लेकिन उनसे “साथ” का ऐलान करवाकर अमेरिका खुद पीछे हटने की गुंजाइश बना रहा है। बहरीन और यूएई की बयानबाज़ी भले कुछ और हो, मगर ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि ये तमाम सिटी-स्टेट्स शॉर्ट रेंज, भारी वारहेड वाली मिसाइलों की जद में बैठे हुए हैं। आमने-सामने की असली लड़ाई में ये चमकदार शहर कुछ ही दिनों में मलबे में बदल सकते हैं। यही वह कड़वी सच्चाई है जिसे खाड़ी के हुक्मरान सबसे बेहतर जानते हैं, मगर सबसे कम बोलते हैं।
बहरहाल, इस पूरे समीकरण में अरबों और ईरान — दोनों के हित में यही है कि वे अपने-अपने मुल्कों में होने वाले हमलों को सीमित दायरे में “हज़म” करते रहें और जंग को उस मुक़ाम तक न पहुंचने दें जहां पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, बंदरगाह, तेल ठिकाने और नागरिक ढांचे ध्वस्त हो जाएं। ईरान जितना दुख इस वक़्त झेल जाएगा, उतने ही लंबे अरसे की शांति ख़रीद सकता है। एक या दो महीने की लड़ाई में भारी मालियत की हानि ज़रूर होगी, मगर उसकी भरपाई बाद में संभव है। कुछ सौ लोग और मारे जाएंगे, जिनमें बड़े नेता और कमांडर भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन अगर रोज़ 25-30 में से सिर्फ़ 5 मिसाइलें भी इंटरसेप्टर सिस्टम से निकलकर अपने निशाने पर लगती रहीं, तो तीन महीनों में इज़रायल के तीनों बड़े शहर — तेल अवीव, यरूशलम और हायफ़ा — खंडहर का मंजर पेश कर सकते हैं।
यही इस जंग का सबसे डरावना लेकिन सबसे यथार्थवादी पहलू है। इज़रायल की असली ताक़त उसकी टेक्नोलॉजी, उसकी एयर फ़ोर्स और उसकी शुरुआती बढ़त है; जबकि ईरान की असली ताक़त उसकी गहराई, उसकी सहनशीलता, उसकी भौगोलिक सुरक्षा और उसके जवाबी वार की निरंतर क्षमता है। जंग के शुरुआती दिनों में चमक अक्सर तेज़ हथियारों की होती है, लेकिन लंबी लड़ाई हमेशा उस पक्ष के पक्ष में जाती है जो टूटने से पहले झुकना नहीं जानता।
इस वक़्त ईरान की नीति यही नज़र आती है — तुरंत जीत नहीं, बल्कि विरोधी को लंबी थकान, भारी आर्थिक क्षति और रणनीतिक बेबसी की तरफ़ धकेलना। अगर वह इसमें कामयाब रहा, तो यह सिर्फ़ एक सैन्य जीत नहीं होगी, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन रेखा को बदल देने वाली घटना साबित हो सकती है।
दुख अस्थायी होता है, लेकिन कुछ जंगें आने वाली कई पीढ़ियों की सुरक्षा और सम्मान तय करती हैं। ईरान शायद इसी हिसाब से यह लड़ाई लड़ रहा है — कि आज का विनाश, कल की मजबूती बन सके। और अगर यही उसकी असली रणनीति है, तो समझ लीजिए कि यह जंग सिर्फ़ मिसाइलों की नहीं, बल्कि सब्र, सहनशक्ति और रणनीतिक दिमाग़ की भी है




