“ख़ून की क़ुर्बानियों से मिली आज़ादी की हिफ़ाज़त करनी होगी” आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई का पैग़ाम—ग़ाज़ा पर दुनिया की ख़ामोशी पर सवाल, भारत-ईरान के रिश्तों को इंसाफ़, इंसानियत और अमन की नई ताक़त बनाने पर ज़ोर

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नई दिल्ली। / सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा

इस्लामी जम्हूरिया ईरान के चीफ़ जस्टिस आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई ने भारत के अपने दौरे के दौरान आज़ादी, ख़ुदमुख़्तारी, इंसाफ़, इंसानियत, अमन और भारत-ईरान के सदियों पुराने रिश्तों पर बेहद अहम और असरदार पैग़ाम दिया। भारत के मज़हबी रहनुमाओं, दानिशवरों, प्रोफ़ेसरों और मुअज़्ज़िज़ उलमा से मुलाक़ात में उन्होंने कहा कि तारीख़ की क़ुर्बानियों से सबक़ लेकर आज को बेहतर और आने वाले कल को महफ़ूज़ बनाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई ने इस मुलाक़ात को अपने लिए सम्मान और ख़ुशक़िस्मती का मौक़ा बताते हुए कहा कि उन्हें इतनी मुअज़्ज़िज़ शख़्सियतों, रहनुमाओं, दानिशवरों और उलमा के बीच आने का मौक़ा मिला। उन्होंने इस मुबारक मुलाक़ात के लिए अल्लाह का दिल से शुक्र अदा किया।

48 साल की जद्दोजहद और क़ुर्बानियों का ज़िक्र

ईरान की आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी का ज़िक्र करते हुए आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई ने कहा कि पिछली लगभग आधी सदी यानी 48 वर्षों में ईरान ने अपनी आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी की हिफ़ाज़त के लिए बड़ी क़ुर्बानियाँ दी हैं।

उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक ताक़तों और दुनिया की ज़ोर-ज़बरदस्ती करने वाली ताक़तों से आज़ादी की इस राह में ईरान ने अपने कई महान शहीदों को खोया और बड़ी तादाद में लोग ज़ख़्मी हुए। मुल्क ने अपनी आकांक्षाओं, यक़ीन और उसूलों के मुताबिक़ आगे बढ़ने के लिए इन 48 वर्षों में भारी मुश्किलें झेली हैं।

उनके मुताबिक़, बहाया गया ख़ून, झेली गई तकलीफ़ें और लगातार की गई जद्दोजहद बेनतीजा नहीं रही। आज ईरान दुनिया की सबसे ताक़तवर और वर्चस्ववादी ताक़त अमेरिका के सामने भी सर उठाकर और मज़बूती के साथ खड़ा है।

आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई ने भारत आने से पहले भी कहा था कि ईरान ने पिछले क़रीब आधे दशक में उस पर थोपे गए संघर्षों में अपने विरोधियों को उनके मक़सद हासिल नहीं करने दिए और वह वर्चस्ववाद तथा एकतरफ़ा ताक़त के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ दुनिया तक पहुँचाना चाहते हैं।

ग़ाज़ा के ज़ख़्म पर दुनिया से सवाल

ग़ाज़ा की दर्दनाक सूरतेहाल का ज़िक्र करते हुए आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की ख़ामोशी पर गंभीर सवाल उठाया।

उन्होंने सवाल किया, “क्या इन तमाम ज़ुल्म और ज्यादतियों को देखकर कोई ख़ामोश और बेपरवाह रह सकता है?”

उन्होंने कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय इदारे और दुनिया के तमाम आज़ादी-पसंद लोग ग़ाज़ा में होने वाले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ वक़्त रहते आवाज़ बुलंद करते, तो शायद आज दूसरे मुल्कों के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी और अमानवीय हमलों की हिम्मत इतनी आसानी से न होती।

उन्होंने इस बात पर भी अफ़सोस जताया कि जिन लोगों पर ऐसे अपराधों के इल्ज़ाम हैं, वे अपने किए पर शर्मिंदा होने के बजाय उन कार्रवाइयों पर फ़ख़्र का इज़हार करते हैं।

“अगर हम मिलकर खड़े हों तो ज़ुल्म का रास्ता रोका जा सकता है”

आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई ने दुनिया के मुल्कों और इंसानों से इत्तेहाद और बाहमी तआवुन की अपील की। उन्होंने कहा कि अगर हम मिलकर सोचें, एक-दूसरे का साथ दें और इंसाफ़ के लिए एक आवाज़ बनें, तो कुछ लालची और वर्चस्ववादी ताक़तों के लिए अलग-अलग मुल्कों को निशाना बनाना आसान नहीं रहेगा।

उन्होंने कहा कि अगर ऐसी ताक़तों को नहीं रोका गया तो आज एक मुल्क और कल कोई दूसरा मुल्क इसकी ज़द में आ सकता है। किसी एक मुल्क पर होने वाला ज़ुल्म सिर्फ़ उसी मुल्क का मामला नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए ख़तरे की घंटी है।

भारत और ईरान में हुए स्मृति समारोहों के लिए दिली शुक्रिया

आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई ने भारत और ईरान के मुख़्तलिफ़ शहरों में आयोजित स्मृति समारोहों में शरीक होने वाले तमाम मुअज़्ज़िज़ लोगों का ख़ास तौर पर शुक्रिया अदा किया।

उन्होंने कहा कि भारत के मुख़्तलिफ़ राज्यों और शहरों के साथ-साथ ईरान में भी आयोजित इन कार्यक्रमों में लोगों की मौजूदगी, तआवुन और ख़ुलूस ने उन्हें ख़ास सम्मान दिया।

उन्होंने कहा, “मैं भारत और ईरान के विभिन्न शहरों में आयोजित स्मृति समारोहों में शामिल होने वाले सभी प्रतिष्ठित लोगों के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता और आभार व्यक्त करना चाहता हूँ। मैं आप सभी का दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ कि आपने अपनी मौजूदगी, सहयोग और सद्भावना से इन कार्यक्रमों को सम्मान दिया।”

उन्होंने भारत में अलग-अलग जगहों पर आयोजित इन कार्यक्रमों को दोनों मुल्कों के लोगों के बीच मौजूद मोहब्बत और हमदर्दी की अहम मिसाल बताया।

“तारीख़ के कुछ लम्हे नई तब्दीली की शुरुआत होते हैं”

आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई ने कहा कि तारीख़ के सफ़े पलटने पर मालूम होता है कि कुछ दौर और कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो आगे आने वाले समय के लिए निर्णायक मोड़ बन जाते हैं। हर बड़ी तब्दीली अपने बाद आने वाले दौर के लिए एक नई शुरुआत का रास्ता खोलती है।

भारत और ईरान की प्राचीन तहज़ीब और संस्कृति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों मुल्कों को अपने शानदार माज़ी से सबक़ लेते हुए यह सोचना चाहिए कि आज क्या किया जाए और आने वाले मुस्तक़बिल को किस तरह बेहतर बनाया जाए।

उनका संदेश था—माज़ी सिर्फ़ याद करने के लिए नहीं, बल्कि उससे सबक़ लेकर हाल और मुस्तक़बिल की बुनियाद मज़बूत करने के लिए होता है।

डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही: “भारत-ईरान के रिश्ते 5,000 साल पुराने”

भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने भारत और ईरान के रिश्तों की गहराई पर रोशनी डालते हुए कहा कि दोनों मुल्कों के ताल्लुक़ात 5,000 साल पुराने हैं।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच दिखाई देने वाली मोहब्बत, आत्मीयता और अपनापन इस बात की गवाही देता है कि इन रिश्तों की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह रिश्ता महज़ सियासी या कूटनीतिक नहीं, बल्कि तारीख़, तहज़ीब, फ़लसफ़े, तालीम और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। डॉ. इलाही पहले भी भारत-ईरान के 5,000 साल पुराने सभ्यतागत रिश्तों में संस्कृति, फ़लसफ़े और तालीम की साझेदारी का ज़िक्र कर चुके हैं।

उन्होंने आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई की भारत यात्रा और भारत के मज़हबी रहनुमाओं तथा मुअज़्ज़िज़ उलमा से उनकी मुलाक़ात को बेहद अहम और क़ीमती मौक़ा बताया।

इंसाफ़, इंसानी गरिमा और अमन पर हो संवाद

डॉ. हकीम इलाही ने कहा कि यह मुलाक़ात इंसाफ़, इंसानी गरिमा, मानवाधिकार, अख़लाक़ और अमन जैसे बुनियादी मसलों पर सार्थक बातचीत का ज़रिया बन सकती है।

उन्होंने कहा कि ये ऐसी क़दरें हैं जो तमाम मज़ाहिब और इंसानियत की बड़ी-बड़ी तहज़ीबों के बीच साझा जुड़ाव, आपसी समझ और एहतराम की बुनियाद बन सकती हैं।

यह पहल उस व्यापक न्यायिक संवाद के माहौल से भी जुड़ती है जिसमें भारत 4 से 6 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली में BRICS Chief Justices’ Forum की मेज़बानी कर रहा है। भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़, इस फ़ोरम में न्यायिक सहयोग, अंतरराष्ट्रीय विवादों के हल, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और न्यायपालिका तथा टिकाऊ विकास जैसे मसलों पर चर्चा होनी है; ईरान के मुख्य न्यायाधीश भी इसमें शिरकत कर रहे हैं।

इंसान—रहमत और भलाई का पैग़ाम भी, ज़ुल्म का सबब भी

अपने संबोधन के सबसे गहरे और मार्मिक हिस्से में आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई ने इंसान की फ़ितरत और उसके अख़लाक़ी ज़िम्मे की बात की।

उन्होंने कहा कि अपनी दुनियावी और माद्दी फ़ितरत की वजह से इंसान कभी ज़ालिम, सरकश, नाशुक्रा और जाहिल हो सकता है। लेकिन यही इंसान अपने अंदर ख़ुदा के क़रीब पहुँचने, नेक बनने, अपने अंदर इस्लाह पैदा करने, रहमदिल बनने और दूसरों की भलाई करने की क़ुदरत भी रखता है।

उन्होंने कहा कि इंसान चाहे तो पूरी इंसानियत की बेहतरी के लिए काम कर सकता है। वह लोगों को तारीकी और बुराई से निकालकर रोशनी, बराबरी, इंसाफ़ और इंसानियत की तरफ़ ले जा सकता है।

लेकिन जब इंसान अपनी अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी भूल जाता है, तो वही इंसान, “ख़ुदा न करे, जानवर से भी बदतर हो सकता है।”

कौन हैं आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई?

आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई ईरान की न्यायिक व्यवस्था के प्रमुख और लंबे प्रशासनिक व न्यायिक तजुर्बे रखने वाले वरिष्ठ अधिकारी हैं। वह 2021 से ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख हैं। इससे पहले वह अभियोजक जनरल, न्यायपालिका के नायब प्रमुख और प्रवक्ता समेत कई अहम ज़िम्मेदारियाँ निभा चुके हैं। वह 2005 से 2009 तक ईरान के ख़ुफ़िया मंत्री भी रह चुके हैं।

भारत यात्रा के मौक़े पर उनकी मौजूदगी BRICS के न्यायिक संवाद के लिहाज़ से भी अहम है। सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के अनुसार, फ़ोरम में भारत समेत BRICS सदस्य देशों और साझेदार देशों के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी शामिल हो रहे हैं।

क़ुर्बानी से इंसाफ़ तक, तारीख़ से मुस्तक़बिल तक

आयतुल्लाह ग़ुलाम-हुसैन मोहसिनी-एजेई के संबोधन में ईरान की 48 साल की जद्दोजहद, आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी की क़ुर्बानियों के साथ-साथ ग़ाज़ा की मानवीय त्रासदी और दुनिया में बढ़ते टकराव पर चिंता सामने आई। उन्होंने ज़ुल्म के मुक़ाबले में इत्तेहाद और इंसाफ़ की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

वहीं डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने भारत और ईरान की 5,000 साल पुरानी तहज़ीबी क़रीबी को इंसाफ़, इंसानी गरिमा, मानवाधिकार, अख़लाक़ और अमन के साझा उसूलों से जोड़ने की बात कही।

इन तमाम बातों का हासिल एक ही पैग़ाम में सिमटता है—माज़ी को सिर्फ़ याद न किया जाए, बल्कि उससे सबक़ लेकर ऐसा मुस्तक़बिल बनाया जाए जिसमें इंसाफ़ ज़िंदा रहे, इंसानी गरिमा महफ़ूज़ हो और अमन को सबसे बड़ी कामयाबी समझा जाए।

आयतुल्लाह मोहसिनी-एजेई की बात का सबसे मार्मिक पहलू भी यही है कि इंसान के पास ज़ुल्म करने की ताक़त भी है और रहम, इंसाफ़ और भलाई का रास्ता चुनने की क़ुदरत भी।

**फ़ैसला इंसान को करना है—वह तारीख़ में ज़ुल्म की दास्तान लिखेगा या इंसानियत, इंसाफ़ और अमन की।**

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