बाराबंकी की राजनीति में ‘मोहरा सिद्धांत’ हफीज़ भारती: जो हर बिसात पर फिट, हर चाल के लिए रेडी

Hafeez Bharti’s return to BSP reignites political chess in Barabanki. A satirical deep-dive into pawn politics shaking SP, BSP, BJP and Congress.

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तहलका टुडे टीम/मोहम्मद वसीक 

बाराबंकी।अगर बाराबंकी की राजनीति को समझना है, तो नेताओं के भाषण नहीं, मोहरे देखने होंगे
और इस समय बाराबंकी की सबसे चर्चित, सबसे इस्तेमाल की जाने वाली और सबसे ज्यादा “रीयूज़ेबल” राजनीतिक यूनिट का नाम है—हफीज़ भारती

ये वही हफीज़ भारती हैं जो

  • कभी बसपा में थे,
  • बसपा से ही रामनगर विधानसभा में अरविंद सिंह गोप के खिलाफ चुनाव लड़े,
  • फिर अचानक सपा की साइकिल पर सवार हो गए,
  • गोप को हराने में बेनी बाबू ,राकेश वर्मा के मोहरे बने,
  • और अब एक बार फिर हाथी पर चढ़कर बसपा में वापसी करने के लिए आज दिखाई पड़े हैं।

राजनीति में इसे दलबदल नहीं कहते,
👉 इसे कहते हैं “ऑल-सीजन यूज़ मोहरा”

राजनीतिक विशेषज्ञ का तंज: नेता नहीं, टूल है

एक वरिष्ठ राजनीतिक विशेषज्ञ नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं—

“एक समय हफीज़ भारती गोप को हराने के लिए मोहरा बने थे।
इस बार वही हफीज़ भारती, बेनी बाबू के बेटे और पूर्व मंत्री राकेश वर्मा के लिए ‘नाक के बाल’ बने रहे।
अब बसपा में आने के बाद या तो उन्हें कुर्सी दी जाएगी,
या रामनगर से विधानसभा का उम्मीदवार बनाकर उन्हीं राकेश वर्मा के खिलाफ फिर मोहरा उतारा जाएगा।”

यानी समस्या व्यक्ति नहीं है,
👉 समस्या ये है कि मोहरा हर बार ज़िंदा बच जाता है।

नगर पालिका चेयरमैन और ‘विकास’ की नई परिभाषा

नगर पालिका चेयरमैन रहते वक्त हफीज़ भारती का नाम
घोटालों, कमीशन और रातों-रात बने करोड़ों के मकान को लेकर खूब चर्चा में रहा।
समर्थक कहते हैं—“ये सब राजनीतिक साज़िश है”
विरोधी कहते हैं—“ये सब नगरपालिका का रिटर्न गिफ्ट है”

लेकिन राजनीति में ये बातें मायने नहीं रखतीं।
पार्टी बदलते ही—

  • आरोप फाइलों में
  • सवाल मौन में
  • और नेता मंच पर

अब खेल का नया चरण: चक्रव्यूह राजनीति

सूत्रों की मानें तो
गोप के साथ खड़ी बसपा और भाजपा की पुरानी टीम अब पैंतरा बदल चुकी है।
सीधा वार नहीं होगा,
अब खेल होगा—

  • भ्रम का
  • घेराबंदी का
  • और पूरा चक्रव्यूह रचने का

जिसमें विरोधी को ऐसा उलझाया जाएगा कि

“रास्ता दिखेगा, पर बाहर नहीं निकल पाएगा।”

और इस चक्रव्यूह का पहला, आज़माया हुआ और भरोसेमंद मोहरा—
हफीज़ भारती।

मायावती से मुलाकात: राजनीतिक शुद्धिकरण

प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल के साथ मायावती से मुलाकात के बाद
राजनीतिक गलियारों में संदेश साफ़ चला गया—

“अब यह मोहरा वैध है।”

राजनीति में इससे बड़ा सर्टिफिकेट नहीं होता।
मुलाकात के बाद अतीत अपने आप धुंधला हो जाता है।

बीजेपी, कांग्रेस और सपा—तीनों की बेचैनी

  • सपा सोच रही है: “जो कल तक हमारा था, आज हमारे खिलाफ क्यों?”
  • बसपा खुश है: “पुराना हथियार फिर से मिल गया”
  • बीजेपी चुप है, क्योंकि उसे पता है—
    👉 मोहरा कहीं भी हो, फायदा अक्सर उसे ही होता है
  • कांग्रेस हमेशा की तरह सोच में है कि
    “ये खेल शुरू कब हुआ?”

बाराबंकी का शाश्वत सत्य

बाराबंकी की राजनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया—

  • यहाँ नेता नहीं चलते
  • यहाँ विचारधारा नहीं टिकती
  • यहाँ मोहरे चलते हैं

और जो मोहरा हर पार्टी में फिट हो जाए,
वही सबसे बड़ा खिलाड़ी माना जाता है।

अब जनता सिर्फ़ यही देख रही है—
अगली बिसात किसके खिलाफ सजेगी,
और हफीज़ भारती इस बार किसके हाथ में होंगे।

क्योंकि बाराबंकी में चुनाव नहीं होते—
👉 यहाँ प्रयोग होते हैं।

 

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