Tahalka Today | Special Desk/हसनैन मुस्तफा
पटना:पश्चिमी एशिया की धधकती आग के बीच जब पूरी दुनिया की निगाहें होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल बाजार और ईरान-अमेरिका टकराव पर टिकी हुई हैं, उसी दौरान भारत के लिए एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने कूटनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है।
भारत में रहबर-ए-मुअज्ज़म के प्रतिनिधि आगा अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने पटना में एक बेहद अहम बयान देकर साफ कर दिया है कि भारत और ईरान के रिश्ते सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि भरोसे, सम्मान और रणनीतिक समझदारी पर खड़े हैं।
उनके बयान ने एक तरफ पाकिस्तान की कथित “मध्यस्थता” की खबरों की हवा निकाल दी, तो दूसरी तरफ भारत के लिए एक बड़े भरोसे, राहत और कूटनीतिक सम्मान का रास्ता खोल दिया।
युद्ध के इस धुएं भरे दौर में, जब हर देश अपने-अपने खेमे चुन रहा है, ईरान ने भारत को एक ऐसे मुल्क के रूप में पेश किया है जो न सिर्फ भरोसेमंद है, बल्कि शांति की दिशा में अहम भूमिका भी निभा सकता है।
होर्मुज पर भारत के लिए राहत भरी खबर
पटना, बिहार में मीडिया से बातचीत के दौरान जब आगा अब्दुल माजिद हकीम इलाही से पूछा गया कि क्या मौजूदा तनावपूर्ण हालात में भारतीय जहाज़ों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की इजाज़त दी जाएगी, तो उन्होंने साफ और सकारात्मक जवाब दिया:
“हां, अब तक कुछ भारतीय जहाज़ गुज़रे हैं और मुझे उम्मीद है कि यह जारी रहेगा।”
यह बयान सिर्फ एक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत के लिए एक रणनीतिक राहत है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल, गैस और ऊर्जा व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस मार्ग का खुला रहना सीधे तौर पर राष्ट्रीय हित, अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब से जुड़ा हुआ है।
युद्ध के इस तनावपूर्ण माहौल में ईरान का यह संकेत बहुत मायने रखता है कि भारत के लिए रास्ता बंद नहीं, बल्कि भरोसे के साथ खुला हुआ है।
इस पर देखिए
https://x.com/i/status/2040798697659970024
“समस्या इजाज़त की नहीं, सुरक्षा की है”
आगा इलाही ने आगे बेहद अहम बात कही। उन्होंने साफ किया कि मौजूदा संकट का मूल कारण कोई सामान्य समुद्री नीति नहीं, बल्कि यह युद्ध खुद है।
उन्होंने कहा:
“इस युद्ध से पहले कोई समस्या नहीं थी… इसका मतलब है कि सभी झगड़ों और संकटों का सोर्स यही युद्ध है…”
इसके बाद उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात जोड़ी:
“समस्या यह नहीं है कि ईरान इजाज़त देता है या नहीं। यह एक सुरक्षा का मुद्दा है…”
यानी ईरान का संदेश बिल्कुल साफ है —
जो देश सामान्य व्यापार, शांति और वैध समुद्री गतिविधियों के लिए इस मार्ग का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनके लिए रास्ता खुला है।
लेकिन जो ताकतें इसी रास्ते का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ हमले, दबाव या सैन्य कार्रवाई के लिए करना चाहती हैं, उनके लिए हालात बिल्कुल अलग हैं।
उन्होंने दो टूक कहा:
“कुछ दुश्मन देश जो ईरान पर हमला करने के लिए इस जलडमरूमध्य का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें इजाज़त नहीं है, लेकिन दूसरे देश गुजरने के लिए आज़ाद हैं।”
यही वो लाइन है जिसने साफ कर दिया कि भारत को ईरान किसी विरोधी खेमे में नहीं, बल्कि एक सम्मानित और भरोसेमंद राष्ट्र के रूप में देख रहा है।
Pakistan की ‘मध्यस्थता’ पर ईरान ने फोड़ा सच का बम
जहां भारत को लेकर ईरान का रुख बेहद सकारात्मक दिखा, वहीं पाकिस्तान के दावों पर आगा इलाही ने बिना लाग-लपेट के सख्त प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने साफ किया कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव को लेकर पाकिस्तान की किसी भी तरह की “मध्यस्थता”, “बैक-चैनल बातचीत” या “शांति वार्ता” की खबरें पूरी तरह अफवाह और झूठ हैं।
यह बयान ऐसे समय आया है जब कुछ हलकों में यह प्रचारित किया जा रहा था कि पाकिस्तान पर्दे के पीछे कोई भूमिका निभा रहा है।
लेकिन ईरान ने अब इस पूरे दावे की हवा निकाल दी है।
सीधा मतलब यह है कि:
Pakistan सिर्फ सुर्खियों में है…
लेकिन India भरोसे की मेज पर है।
यह पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसकी उस छवि पर भी चोट है जिसे वह क्षेत्रीय “मध्यस्थ” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा था।
भारत पर ईरान का भरोसा, नई दिल्ली के लिए बड़ा संकेत
आगा अब्दुल माजिद हकीम इलाही के बयान का सबसे अहम पहलू यह है कि उन्होंने भारत को सिर्फ एक तटस्थ देश नहीं, बल्कि संभावित शांति-सेतु के रूप में देखा।
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत इस संघर्ष को खत्म करने में कोई भूमिका निभा सकता है, तो उन्होंने बेहद सकारात्मक जवाब दिया और कहा कि:
“India निभा सकता है शांति की अहम भूमिका।”
यह एक साधारण कूटनीतिक वाक्य नहीं है।
यह भारत की उस विदेश नीति की स्वीकृति है, जो सालों से संवाद, संतुलन और जिम्मेदारी की राह पर चलती रही है।
आज जब दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई है, भारत एक ऐसा नाम बनकर उभर रहा है जो:
- किसी युद्ध मशीन का हिस्सा नहीं
- किसी सैन्य खेमे का मुखपत्र नहीं
- और न ही संकटों को भड़काकर फायदा उठाने वाला खिलाड़ी है
बल्कि एक ऐसा देश है, जिससे शांति की उम्मीद की जा रही है।
और यही वह बात है जो भारत-ईरान रिश्तों को इस वक्त और भी खास बनाती है।
जंग के बीच भी मजबूत क्यों दिख रहा है भारत-ईरान रिश्ता?
भारत और ईरान का रिश्ता आज का नहीं है।
यह रिश्ता सिर्फ राजनीति या तेल व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, आस्था और आपसी सम्मान की लंबी बुनियाद पर खड़ा है।
- चाबहार पोर्ट में सहयोग
- ऊर्जा साझेदारी
- पश्चिमी एशिया में रणनीतिक संतुलन
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नजदीकियां
इन सबने दोनों देशों के रिश्तों को हमेशा एक अलग गहराई दी है।
इसीलिए जब जंग के बीच कई रास्ते बंद हो रहे हैं, तब भारत और ईरान के बीच भरोसे का रास्ता अभी भी खुला दिख रहा है।
तेल बाजार, व्यापार और दुनिया की बेचैनी
इस पूरे बयान का असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा।
अगर होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव बढ़ता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा:
- कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
- शिपिंग लागत में बढ़ोतरी
- महंगाई का दबाव
- सप्लाई चेन में संकट
- ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा
ऐसे में ईरान का यह संकेत कि भारतीय जहाज़ गुजरते रहे हैं और आगे भी गुजर सकते हैं, भारत के लिए एक बहुत बड़ी राहत है।
यह राहत सिर्फ सरकारों के लिए नहीं, बल्कि हर उस आम भारतीय के लिए मायने रखती है जो पेट्रोल, डीजल, गैस और रोजमर्रा की महंगाई से प्रभावित होता है।
जंग के अंधेरे में भारत-ईरान भरोसे की रोशनी
पटना से आया यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पश्चिमी एशिया की आग के बीच भारत-ईरान रिश्तों की गहराई का खुला प्रमाण है।
एक तरफ ईरान ने भारत के लिए होर्मुज का रास्ता खुला बताया,
दूसरी तरफ पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता को झूठा और खोखला साबित कर दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है—
जब दुनिया जंग में उलझी हो, तब असली पहचान उसी की होती है जिस पर भरोसा किया जाए।
और इस वक्त, ईरान की नजर में वह नाम है — भारत।




