तहलका टुडे इंटरनेशनल डेस्क
आज की दुनिया एक अजीब मोड़ पर खड़ी है।मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और अमेरिका-इज़राइल की नीतियों पर उठते सवालों के बीच ईरान को लेकर दुनिया में नई बहस शुरू हो गई है। एक वर्ग ईरान को सिर्फ़ राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि इंसानियत, गैरत, मज़लूमों की हिमायत और वैश्विक शांति के लिए कुर्बानी देने वाली आवाज़ के रूप में देख रहा है।
एक तरफ़ वो ताक़तें हैं जिन्होंने शराब, हराम खोरी, अय्याशी, बेहूदगी, बदतमीज़ी, झूठ, धोखे और इंसानी क़द्रों की तबाही को “आधुनिकता” और “आजादी” का नाम दे दिया है।
और दूसरी तरफ़ एक मुल्क है—ईरान—जो तमाम दबाव, प्रतिबंध, साज़िश, मीडिया प्रोपेगैंडा, आर्थिक हमलों और फौजी धमकियों के बावजूद इंसानियत, गैरत, इज़्ज़त, मज़लूमों की हिमायत और दुनिया में शांति के लिए अपनी कुर्बानियाँ देता चला आ रहा है।
ईरान का मसला सिर्फ़ एक देश का मसला नहीं है।
यह दो सोचों की जंग है।
एक सोच वो है जो इंसान को सिर्फ़ बाजार का ग्राहक, सत्ता का गुलाम और हवस का खिलौना बनाना चाहती है।
और दूसरी सोच वो है जो इंसान को इंसान बनाए रखना चाहती है—जिसके दिल में हया हो, आंखों में गैरत हो, ज़ुबान पर सच हो, और ज़ुल्म के खिलाफ़ खड़े होने का हौसला हो।
ईरान की असल लड़ाई—सरहद की नहीं, तहज़ीब और इंसानियत की है
आज जो लोग ईरान को सिर्फ़ एक “जियो-पॉलिटिकल प्लेयर” के तौर पर देखते हैं, वे दरअसल उसके रूहानी और नैतिक पहलू को समझ ही नहीं पाते।
ईरान के शांति के रहनुमा सैयद अली खमेनेई ने समाज को जिस तरह परिवार, तहज़ीब, इल्म, हया, इबादत, कुर्बानी और मज़लूमों की हिमायत से जोड़े रखा, वही बात दुनिया की बड़ी ताक़तों को सबसे ज़्यादा खटकती है।
क्योंकि जो ताक़तें दुनिया पर राज करना चाहती हैं, उन्हें ऐसे समाज से सबसे ज़्यादा डर लगता है
जो न बिके,
जो न झुके,
जो न डरकर चुप बैठे,
और जो अपनी नस्लों को शराब, फहाशी और बेगैरती के हवाले करने से इंकार कर दे।
आज अमेरिका और इज़राइल की नीतियों को अगर गौर से देखा जाए, तो साफ़ नज़र आता है कि उनकी सबसे बड़ी कोशिश सिर्फ़ फौजी वर्चस्व नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक कब्ज़ा भी है।
वे ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ इंसान अपनी पहचान, अपने दीन, अपने परिवार और अपने ज़मीर से कट जाए।
जहाँ सच को “कट्टरता” और बेहयाई को “प्रोग्रेस” कहा जाए।
जहाँ मज़लूम की चीख़ दबा दी जाए और ज़ालिम को “डेमोक्रेसी” का रक्षक बताकर पेश किया जाए।
अमेरिका-इज़राइल की नीतियाँ: इंसानियत के नाम पर सबसे बड़ा धोखा
दुनिया ने देखा है कि कैसे “मानवाधिकार” का सबसे ज़्यादा शोर वही ताक़तें मचाती हैं
जो सबसे ज़्यादा जंग, कब्ज़ा, प्रतिबंध, तबाही, भूख, खून-खराबा और मीडिया झूठ फैलाती हैं।
जब किसी मज़लूम मुल्क पर बम गिरते हैं,
जब बच्चों की लाशें मलबे से निकलती हैं,
जब अस्पताल, स्कूल, इबादतगाह और बस्तियाँ तबाह की जाती हैं,
तो दुनिया के सबसे बड़े “सभ्य” देशों की ज़ुबान पर अक्सर या तो खामोशी होती है
या फिर ज़ालिम के लिए सफाई।
यही अमेरिका और इज़राइल की नीतियों का सबसे खतरनाक चेहरा है
वे ज़ुल्म को सुरक्षा कहते हैं,
कब्ज़े को अधिकार कहते हैं,
और प्रतिरोध को आतंकवाद कह देते हैं।
ऐसी दुनिया में अगर कोई मुल्क यह कहता है कि
“हम मज़लूम के साथ खड़े होंगे”
तो वह सिर्फ़ एक राजनीतिक बयान नहीं देता—
वह पूरी इंसानियत के ज़मीर को जगा देता है।
ईरान ने बार-बार यही किया है।
ईरान की कुर्बानी: सिर्फ़ अपने लिए नहीं, पूरी उम्मत और इंसानियत के लिए
ईरान ने जो कुछ सहा है, वह मामूली नहीं।
आर्थिक पाबंदियाँ, राजनीतिक अलगाव, फौजी धमकियाँ, साइबर हमले, जासूसी, आतंकी साज़िशें, मीडिया बदनामियाँ—यह सब सिर्फ़ इसलिए कि वह घुटने टेकने से इंकार करता है।
लेकिन सवाल यह है कि ईरान झुक क्यों नहीं जाता?
क्यों नहीं वह भी दुनिया की ताक़तों के सामने समझौता कर ले?
क्यों नहीं वह भी “अमन” के नाम पर अपनी गैरत बेच दे?
जवाब बहुत साफ़ है:
क्योंकि ईरान की बुनियाद सिर्फ़ मुफाद पर नहीं, बल्कि अकीदे, उसूल और इज़्ज़त पर है।
जिस मुल्क के नौजवान यह सीखकर बड़े हों कि
ज़िल्लत की ज़िंदगी से इज़्ज़त की कुर्बानी बेहतर है,
जिस समाज में शहीदों को सिर्फ़ याद नहीं किया जाता बल्कि उनकी राह को ज़िंदा रखा जाता हो,
जहाँ मज़हब सिर्फ़ मस्जिद तक सीमित न होकर समाज की रूह बन जाए
वहाँ समझौता आसान नहीं होता।
ईरान की यही सबसे बड़ी ताक़त है।
उसकी मिसाइलें नहीं,
उसकी फौज नहीं,
उसकी राजनीति नहीं—
बल्कि उसका ईमान, सब्र, हया, गैरत और कुर्बानी का जज़्बा।
जब दुनिया बेपरवाही में सो रही है, ईरान जाग रहा है
आज दुनिया का एक बड़ा हिस्सा मनोरंजन, बाजार, फैशन, शोहरत और हवस की चमक में ऐसा डूबा हुआ है कि उसे न मज़लूम की आह सुनाई देती है, न शहीद की पुकार।
लोगों के लिए “ट्रेंड” ज्यादा अहम हो गया है, “ट्रुथ” नहीं।
“वायरल” होना ज्यादा मायने रखता है, “वफा” नहीं।
“लाइक्स” ज्यादा ज़रूरी हो गए हैं, “लहू” नहीं।
ऐसे दौर में अगर कोई मुल्क अब भी अस्ल मुद्दों की बात करता है—
फिलिस्तीन की, मज़लूमों की, इंसाफ़ की, ज़ुल्म के खिलाफ़ खड़े होने की,
तो वह दुनिया की सोई हुई इंसानियत के लिए आख़िरी घंटी है।
ईरान की आवाज़ दरअसल यह कहती है कि
“दुनिया अभी पूरी तरह मरी नहीं है।”
यह आवाज़ कहती है कि
अब भी ऐसे लोग मौजूद हैं
जो पेट्रोल, डॉलर, व्यापार और सत्ता से ऊपर उठकर
हक़, गैरत और इंसानियत की बात करते हैं।
ईरान के खिलाफ़ प्रोपेगैंडा क्यों?
क्योंकि जो मुल्क बिकता नहीं,
उसके खिलाफ़ सबसे पहले कहानी बनाई जाती है।
उसकी छवि खराब करो।
उसे “खतरा” बताओ।
उसकी नीयत पर शक पैदा करो।
उसकी कुर्बानी को “राजनीति” कहो।
उसकी मजबूती को “आक्रामकता” बताओ।
और फिर दुनिया को यह यक़ीन दिलाओ कि असल समस्या वही है।
ईरान के साथ बरसों से यही किया गया।
लेकिन सच यह है कि
दुनिया का बड़ा हिस्सा अब समझ चुका है कि
हर बार मीडिया की सुर्खियाँ सच नहीं होतीं,
हर बार पश्चिमी बयान इंसाफ़ नहीं होते,
और हर बार अमेरिका-इज़राइल की रणनीति “शांति” के लिए नहीं होती।
कई बार “शांति” के नाम पर सबसे बड़ी तबाही की जाती है।
कई बार “लोकतंत्र” के नाम पर सबसे बड़ी गुलामी थोपी जाती है।
और कई बार “सुरक्षा” के नाम पर पूरी इंसानियत को डर और खून में धकेल दिया जाता है।
ईरान एक मुल्क से बढ़कर—एक पैग़ाम है
ईरान की असल अहमियत उसकी सरहदों से कहीं बड़ी है।
वह एक पैग़ाम है कि
अगर इरादा साफ़ हो,
अगर नस्लों को गैरत के साथ पाला जाए,
अगर समाज को हया और इंसाफ़ से जोड़ा जाए,
अगर ज़ुल्म के खिलाफ़ खड़े होने की कीमत चुकाने का हौसला हो—
तो दुनिया की सबसे बड़ी ताक़तें भी किसी क़ौम की रूह को नहीं तोड़ सकतीं।
आज ईरान दुनिया को यह याद दिला रहा है कि
इंसानियत सिर्फ़ भाषणों से नहीं बचती—
उसके लिए कुर्बानी देनी पड़ती है।
शांति सिर्फ़ सम्मेलनों और फोटो-ऑप से नहीं आती—
उसके लिए ज़ुल्म के सामने “ना” कहना पड़ता है।
और इज़्ज़त सिर्फ़ नारों से नहीं मिलती—
उसके लिए कीमत अदा करनी पड़ती है।
हमारे लिए सबक क्या है?
सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि ईरान क्या कर रहा है।
सवाल यह भी है कि हम क्या कर रहे हैं?
क्या हम अपनी नस्लों को हया, तहज़ीब, सच्चाई और गैरत दे रहे हैं?
या हम भी उसी दुनिया का हिस्सा बनते जा रहे हैं
जहाँ शराब “स्टेटस” है,
अय्याशी “आज़ादी” है,
बेहूदगी “फन” है,
झूठ “रणनीति” है,
और धोखा “स्मार्टनेस” कहलाता है?
अगर हम सच में इंसानियत को बचाना चाहते हैं,
तो हमें सिर्फ़ ईरान की तारीफ़ नहीं करनी होगी—
हमें अपने घरों, अपने समाज, अपनी सोच और अपनी नस्लों को भी
हया, इल्म, गैरत, इंसाफ़ और हक़ के रास्ते पर लाना होगा।
क्योंकि लड़ाई सिर्फ़ मिसाइलों की नहीं है।
लड़ाई अख़लाक़ की भी है।
लड़ाई किरदार की भी है।
लड़ाई रूह की भी है।
आज जब दुनिया का बड़ा हिस्सा
शराब, हराम, अय्याशी, बेहूदगी, झूठ और मक्कारी के अंधे कुएँ में गिरता जा रहा है,
तब ईरान अपने लहू, अपने सब्र, अपने ईमान और अपने उसूलों से
यह साबित कर रहा है कि
इंसानियत अब भी ज़िंदा है।
और यही वजह है कि
जो लोग गैरत, हक़, मज़लूमों की हिमायत और अमन की असली कीमत समझते हैं,
वे ईरान को सिर्फ़ एक मुल्क नहीं—
बल्कि ज़मीर की आख़िरी आवाज़ मानते हैं।
अमेरिका और इज़राइल की नीतियाँ चाहे जितना दबाव बना लें,
सच यह है कि हथियारों से शहर तबाह किए जा सकते हैं,
लेकिन उस क़ौम को नहीं हराया जा सकता
जो अपने मक़सद को इबादत और अपनी कुर्बानी को इंसानियत की हिफाज़त समझती हो।




