रिपोर्ट: सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ/नई दिल्ली।
पश्चिम एशिया में जारी जंग, धमाकों, बमबारी और समुद्री तनाव के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। जिस समय खाड़ी क्षेत्र में हजारों जहाज़ और हजारों नाविक भय, अनिश्चितता और युद्ध के दबाव में फंसे हुए हैं, उसी दौर में भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी, आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब की कोशिशों, दुआओं और असरदार संपर्कों के बीच ईरान की ओर से यह भरोसा दिया गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले भारतीय जहाज़ और भारतीय नाविक सुरक्षित रहेंगे।
यह खबर सिर्फ एक औपचारिक आश्वासन नहीं, बल्कि उन सैकड़ों भारतीय परिवारों के लिए राहत का पैगाम है, जिनकी निगाहें कई दिनों से हर अपडेट, हर कॉल और हर समुद्री सूचना पर टिकी हुई थीं। ऐसे तनावपूर्ण हालात में यह भरोसा भारत-ईरान संबंधों, इंसानी हमदर्दी और आपसी विश्वास की एक मजबूत मिसाल बनकर उभरा है।
होर्मुज के तनाव में भारतीय नाविकों के लिए राहत
सूत्रों के मुताबिक, करीब 27 भारतीय जहाज़ होर्मुज और गल्फ ऑफ ओमान के आसपास प्रभावित क्षेत्र में मौजूद थे, जिन पर 753 भारतीय नाविक सवार थे। यह स्थिति भारत में उन परिवारों के लिए बेहद चिंता का विषय बन गई थी, जिनके अपने इस समुद्री मार्ग पर फंसे हुए थे।
इसी बीच भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहाली ने नई दिल्ली में स्पष्ट शब्दों में भरोसा दिलाया कि भारतीय जहाज़ों को सुरक्षित रास्ता दिया जाएगा, क्योंकि भारत और ईरान के संबंध केवल रणनीतिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय जुड़ाव पर आधारित हैं।
ईरानी पक्ष की ओर से यह संदेश भी सामने आया:
“Our Indian friends are in safe hands, no worries.”
युद्ध के तनाव के बीच यह एक ऐसा बयान था जिसने भारत में बैठे नाविकों के परिजनों और आम लोगों के दिलों में उम्मीद की लौ फिर से जला दी।
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ईरानी आश्वासन के बाद बढ़ी राहत
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी भरोसे के कुछ ही घंटों बाद भारतीय झंडे वाले दो जहाज़ सुरक्षित रूप से होर्मुज पार करने में सफल रहे, जिससे भारत में राहत की भावना और मजबूत हुई।
यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि तमाम तनाव और अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय जहाज़ों की सुरक्षा को लेकर गंभीर स्तर पर कोशिशें जारी हैं। इसमें कूटनीतिक संपर्कों के साथ-साथ सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व की चिंता भी बराबर दिखाई दे रही है।
भारत सरकार भी लगातार सक्रिय
इस पूरे संकट के दौरान भारत सरकार ने भी तेजी से कूटनीतिक सक्रियता दिखाई।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति से सीधी बातचीत की
- विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से लगातार संपर्क बनाए रखा
- भारत ने BRICS देशों के साथ मिलकर भी इस संकट पर साझा रुख तैयार करने की कोशिश की
यह स्पष्ट करता है कि भारत इस मुद्दे को केवल अंतरराष्ट्रीय तनाव नहीं, बल्कि अपने नागरिकों, समुद्री हितों और मानवीय जिम्मेदारियों से जुड़ा एक गंभीर विषय मान रहा है।
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की भूमिका बनी उम्मीद का सहारा
इस मुश्किल दौर में सबसे सुकून देने वाली बात यह रही कि आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब लगातार इस पूरे मसले को लेकर फिक्रमंद रहे और उन्होंने अपने स्तर पर गंभीर पहल की।
उनकी भूमिका सिर्फ एक धार्मिक शख्सियत तक सीमित नहीं दिखी, बल्कि वह भारतीयों की सुरक्षा, अमन और इंसानियत के पक्ष में उठी एक जिम्मेदार और असरदार आवाज़ के रूप में सामने आई।
आज जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा युद्ध की भाषा में उलझा हुआ है, ऐसे समय में मौलाना कल्बे जवाद नकवी का यह रुख यह संदेश देता है कि मजहबी और सामाजिक नेतृत्व भी राष्ट्रीय हित, मानवीय सुरक्षा और अमन के सवाल पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
लखनऊ में 6 अप्रैल को होगा ‘याद-ए-शोहदा’ का बड़ा कार्यक्रम

इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ के ऐतिहासिक बड़ा इमामबाड़ा में 6 अप्रैल 2026, रात 7:30 बजे एक अहम और रूहानी कार्यक्रम ‘याद-ए-शोहदा’ आयोजित किया जाएगा।
यह इज्तिमा पश्चिम एशिया में हालिया हालात, शहीदों की याद, मज़लूमों के साथ एकजुटता और अमन के संदेश के साथ जुड़ा हुआ है। इसमें शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश की जाएगी और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात पर रौशनी डाली जाएगी।
मोमिनीन-ए-लखनऊ, अंजुमन-हाए मातमी व ओलमा-ए-किराम के इस प्रोग्राम में कई धर्मों और समुदायों की शख्सियतें होंगी शामिल
यह अपने आप में इस बात का संकेत है कि यह आयोजन केवल एक मजहबी कार्यक्रम नहीं, बल्कि शहीदों की याद, मज़लूमों के समर्थन और अमन-ओ-इंसाफ के साझा पैगाम का एक बड़ा मंच बनने जा रहा है।
लखनऊ से उठेगी अमन और इंसाफ की आवाज़
जब दुनिया का एक हिस्सा बारूद, धमाकों और युद्ध के साये में हो, तब लखनऊ जैसे तहज़ीबी शहर से शहीदों की याद में अमन, इंसाफ और इंसानियत की आवाज़ उठना अपने आप में एक बड़ा संदेश है।
‘याद-ए-शोहदा’ जैसा कार्यक्रम यह याद दिलाता है कि शहादत सिर्फ इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होने की जिंदा परंपरा है।
आज जब समुद्र में जहाज़ फंसे हैं, आसमान में तनाव है और ज़मीन पर मातम, तब भारत के लिए ईरान से आया यह भरोसा और लखनऊ में होने वाला यह कार्यक्रम — दोनों मिलकर यह पैगाम देते हैं कि:
“अमन की उम्मीद अभी जिंदा है।”
जंग के अंधेरे में उम्मीद की रोशनी
भारत के लिए यह खबर कई मायनों में बेहद अहम है।
एक तरफ भारतीय नाविकों और जहाज़ों की सुरक्षा का भरोसा,
दूसरी तरफ मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब की कोशिशें,
और तीसरी तरफ लखनऊ में शहीदों की याद में आयोजित होने वाला यह बड़ा इज्तिमा —
ये सभी बातें मिलकर यह साबित करती हैं कि
भारत सिर्फ तमाशबीन नहीं, बल्कि इंसानियत, अमन और अपने लोगों की सुरक्षा के लिए सजग, संजीदा और प्रतिबद्ध है।
आज जब दुनिया जंग के शोर में उलझी हुई है, तब भारत के लिए यह खबर सचमुच




