
✍️ सैयद शमीम अब्बास नकवी
लखनऊ,अक्टूबर 2023 में मैंने लिखा था कि ईरान तेज़ी से एक बड़ी ताक़त बन रहा है। उस वक़्त कुछ लोगों को ये बात ज़रा ज़्यादा लगी, लेकिन आज हालात खुद गवाही दे रहे हैं कि पश्चिम एशिया की सियासत में ईरान का क़द पहले से कहीं ऊँचा हो चुका है।
बदलता हुआ मिडिल ईस्ट
मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) का नक्शा बहुत तेज़ी से बदल रहा है। जो इलाक़ा हमेशा जंग, साज़िश और बाहरी दख़ल के लिए जाना जाता था, वही अब नई तर्ज़ की सियासत की तरफ़ बढ़ रहा है।
ईरान ने पिछले कुछ सालों में अपनी डिफेंस ताक़त को काफ़ी मज़बूत किया है। खासकर उसकी मिसाइल टेक्नोलॉजी और बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम पर दुनिया की नज़र है।
Council on Foreign Relations जैसे बड़े थिंक टैंक भी कहते हैं कि ईरान की मिसाइलें पूरे मिडिल ईस्ट तक पहुंच सकती हैं। इसी वजह से अमेरिका और इज़रायल इसे अपने लिए खतरा मानते हैं।
लेकिन ईरान का कहना साफ है—
“हम जंग शुरू नहीं करते, लेकिन अगर कोई हमला करे तो जवाब ज़रूर देंगे।”
यानी उसकी पॉलिसी डिटरेंस (रोकथाम) की है, न कि पहले हमला करने की।
परमाणु प्रोग्राम पर बहस
ईरान बार-बार कहता है कि उसका परमाणु प्रोग्राम सिर्फ़ बिजली बनाने, मेडिकल रिसर्च और साइंटिफिक तरक़्क़ी के लिए है। मगर अमेरिका और इज़रायल इस पर लगातार नज़र रखे हुए हैं।
असल मसला सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, भरोसे का है। इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में एतबार सबसे बड़ी चीज़ होती है—और वही सबसे कम मिलती है।
दुनिया एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय
अब दुनिया भी बदल रही है।
Atlantic Council जैसे ग्लोबल थिंक टैंक खुलकर कह रहे हैं कि अमेरिका-केंद्रित एकध्रुवीय दुनिया धीरे-धीरे खत्म हो रही है। अब बहुध्रुवीय (Multipolar) सिस्टम आ रहा है, जहाँ कई ताक़तें बराबरी से उभरेंगी।
इस नए दौर में एशिया और खास तौर पर मिडिल ईस्ट की अहमियत और बढ़ेगी। तेल, गैस, ट्रेड रूट्स और स्ट्रैटेजिक लोकेशन—ये सब चीज़ें इस इलाके को दुनिया की सियासत का मरकज़ बना रही हैं।
ईरान ने पाबंदियों के बावजूद अपनी इंडस्ट्री, डिफेंस प्रोडक्शन और रीजनल रिश्तों को मज़बूत किया है। यही वजह है कि उसे अब सिर्फ एक मुल्क नहीं, बल्कि एक असरदार प्लेयर के तौर पर देखा जा रहा है।
2030 के बाद क्या?
2030 का साल करीब आता जा रहा है और इसके साथ ही ताक़त का बंटवारा भी बदलता दिख रहा है।
अब कई मिडिल ईस्ट देश अपनी फॉरेन पॉलिसी में बैलेंस ला रहे हैं। वे किसी एक सुपरपावर पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते।
पुरानी हुकूमतों का दबदबा कम हो रहा है और नए समीकरण बन रहे हैं। कूटनीति, इकॉनमी और सिक्योरिटी—तीनों मिलकर आने वाले दौर की शक्ल तय करेंगे।
ईरान को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल
आज हक़ीक़त ये है कि ईरान को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
उसकी जियोग्राफिक लोकेशन, उसकी मिलिट्री ताक़त, उसके रीजनल रिश्ते—सब मिलकर उसे एक अहम किरदार बनाते हैं।
जंग कोई नहीं चाहता, लेकिन मज़बूती के बिना अमन भी कायम नहीं रहता। ईरान खुद को उसी नज़र से पेश करता है—एक ऐसी ताक़त जो हमले का जवाब देने की क़ाबिलियत रखती है, मगर पहल जंग की नहीं करती।
दुनिया एक नए दौर में दाख़िल हो रही है।
एकध्रुवीय सिस्टम से निकलकर बहुध्रुवीय दुनिया की तरफ़।
इस सफ़र में मिडिल ईस्ट की चमक बढ़ेगी—और उस चमक के बीच ईरान का नाम जरूर होगा।
अब सवाल ये नहीं कि ईरान उभर रहा है या नहीं—
सवाल ये है कि बदलती दुनिया में उसका किरदार कितना बड़ा होगा।





