तहलका टुडे इंटरनेशनल डेस्क
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-अमेरिका तनातनी और गाज़ा संघर्ष के बीच ईरान के दोस्त भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi का इज़रायल दौरा अचानक एक सामान्य राजकीय यात्रा से कहीं अधिक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम बन गया है।
तेल अवीव के Ben Gurion International Airport पर जब उनका स्वागत इज़रायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu और उनकी पत्नी सारा नेतन्याहू ने किया, तो सिर्फ हाथ मिलाना ही चर्चा में नहीं रहा—बल्कि सारा का भगवा रंग का कोट भी प्रतीकात्मक संदेश के तौर पर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
राजनीतिक विश्लेषक इसे “कूटनीतिक संकेतों की भाषा” बता रहे हैं, वहीं कुछ इसे महज़ संयोग मान रहे हैं। लेकिन इतना तय है कि यह दृश्य चर्चा के केंद्र में आ गया।
नेसेट में सम्मान, भारत की बढ़ती ताकत का संकेत
इज़रायल की संसद Knesset में प्रधानमंत्री मोदी को “स्पीकर ऑफ द नेसेट मेडल” से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल कुछ चुनिंदा वैश्विक नेताओं को ही मिला है।
अपने संबोधन में मोदी ने आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख दोहराया, 7 अक्टूबर के हमलों की निंदा की और भारत की “ज़ीरो टॉलरेंस” नीति पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने गाज़ा पीस पहल और फ़िलिस्तीन मुद्दे के न्यायपूर्ण समाधान की भी बात की—यानी संतुलित और बहुपक्षीय दृष्टिकोण।
ईरान पर रणनीतिक संयम, दोस्ती को नई दिशा?
भारत और ईरान के ऐतिहासिक रिश्ते—ऊर्जा सहयोग, चाबहार पोर्ट और सांस्कृतिक संबंध—पहले से मजबूत रहे हैं। ऐसे समय में जब अमेरिका और ईरान के बीच बयानबाज़ी तेज है, भारत का इज़रायल के साथ खुला संवाद और ईरान पर सार्वजनिक मंच से संयमित रुख एक नई कूटनीतिक रणनीति का संकेत देता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा ईरान और इज़रायल के बीच संतुलन साधने की भारत की कोशिश है—जहाँ भारत दोनों से संबंध बनाए रखते हुए क्षेत्रीय युद्ध की आशंकाओं को कम करने में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
क्या यह यात्रा ईरान-अमेरिका जंग की संभावनाओं को कम करने की दिशा में एक कदम है? कूटनीतिक हलकों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है।
अमेरिका और टैरिफ विवाद के बीच भारत की स्वतंत्र राह
अमेरिका के साथ व्यापारिक टैरिफ और आर्थिक दबावों के बीच भारत ने बहुध्रुवीय कूटनीति को प्राथमिकता दी है। इज़रायल में रक्षा, टेक्नोलॉजी और कृषि सहयोग को मजबूत करना, ईरान के साथ कनेक्टिविटी परियोजनाएँ जारी रखना—यह संकेत है कि भारत किसी एक धुरी में बंधने को तैयार नहीं।
भारत अब “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चल रहा है—जहाँ वाशिंगटन, तेहरान और तेल अवीव तीनों से संवाद जारी है।
विश्व शांति का सेतु बनता भारत?
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि शांति का रास्ता आसान नहीं, पर संवाद ही समाधान है। उनका यह दौरा सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की उभरती भूमिका का संकेत है।
- आतंकवाद पर स्पष्ट रुख
- गाज़ा पर मानवीय समाधान की बात
- ईरान पर संयम
- अमेरिका के साथ आर्थिक मतभेदों के बावजूद संवाद
यह संतुलन ही भारत की ताकत बन सकता है।
मोदी का यह इज़रायल दौरा केवल एक राजकीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलते विश्व समीकरणों के बीच भारत की नई भूमिका का संकेत है।
यह दौरा ईरान-भारत दोस्ती को परवान चढ़ाने वाला भी दिखता है और साथ ही इज़रायल के साथ रणनीतिक साझेदारी को नई ऊँचाई देता है।
अगर भारत इस संतुलन को बनाए रखता है, तो वह पश्चिम एशिया में शांति का सेतु बन सकता है—जहाँ युद्ध की आशंकाएँ संवाद में बदलें।





