अलविदा मोहसिना किदवई … सियासत की वह नरम आवाज़, जो अब कभी सुनाई नहीं देगी

It is not just a name that is gone… politics has lost its entire grace.

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नई दिल्ली / लखनऊ / बाराबंकी | तहलका टुडे डेस्क/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा 

आज भारतीय सियासत ने सिर्फ एक नेता को नहीं खोया…
आज उसने अपनी तहज़ीब का एक पन्ना, अपनी शराफ़त की एक निशानी, अपनी सादगी की एक आख़िरी मिसाल खो दी है।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय राजनीति में मुस्लिम महिलाओं की एक बुलंद, पाक और संजीदा पहचान मोहसिना किदवई अब इस दुनिया में नहीं रहीं।
दिल्ली में उनका इंतिक़ाल हो गया, और उन्हें दिल्ली के निज़ामुद्दीन में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा।

यह खबर सिर्फ एक इंतिक़ाल की खबर नहीं है…
यह एक पूरी रिवायत के टूट जाने की खबर है।
यह उस सियासत के ख़ामोश हो जाने की खबर है, जिसमें कभी आवाज़ें ऊँची नहीं, बल्कि इरादे ऊँचे हुआ करते थे।

आज जैसे ही यह खबर फैली,
दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर अवध की हवाओं तक,
पुराने कांग्रेसियों के दिलों से लेकर उन तमाम लोगों की आंखों तक,
जो मोहसिना किदवई को एक साफ़ दिल, पाक दामन और नफ़ीस रूह की तरह जानते थे—
एक गहरी चुप्पी, एक भारी उदासी, और एक टूटन उतर आई।

ऐसा लगा जैसे
किसी ने सियासत के माथे से आख़िरी उजला दुपट्टा उतार लिया हो…

कुछ लोग जाते नहीं… पूरा दौर अपने साथ ले जाते हैं

सीनियर एडवोकेट पुनीत चंद्रा बताते है

मोहसिना किदवई जी उन्हीं लोगों में से थीं।

वे सिर्फ संसद की एक सदस्य नहीं थीं,
वे सिर्फ कांग्रेस की एक नेता नहीं थीं,
वे सिर्फ एक मुस्लिम महिला चेहरा नहीं थीं—

वे एक एहसास थीं।
वे एक सलीका थीं।
वे एक तहज़ीब थीं।
वे एक ऐसा भरोसा थीं, जिसे देखकर लगता था कि
अब भी राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं
जिन्हें देखकर इंसान अपने बच्चों से कह सके—
“देखो, ऐसे भी लोग सियासत में होते हैं…”

उनके चेहरे पर कभी गुरूर नहीं देखा गया,
उनकी आवाज़ में कभी ज़हर नहीं सुना गया,
उनकी सियासत में कभी बदले की बू नहीं आई।

वे उस दौर की थीं
जब नेता पहले इंसान होते थे,
फिर सियासतदान

जब कांग्रेस बिखर रही थी… तब वह उम्मीद बनकर उठीं

साल 1978
कांग्रेस की शिकस्त,
बिखरे हुए कार्यकर्ता,
टूटा हुआ मनोबल,
और हर तरफ़ मायूसी।

ऐसे वक़्त में
पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज़मीन से
एक संभ्रांत, शालीन, मज़बूत इरादों वाली मुस्लिम महिला
मोहसिना किदवई
जीतकर संसद पहुंचती हैं।

यह जीत सिर्फ एक सीट नहीं थी।
यह हारे हुए हौसलों की वापसी थी।
यह टूटती हुई पार्टी के सीने में फिर से जान पड़ने का लम्हा था।

जब बड़े-बड़े नाम डगमगा रहे थे,
तब एक नरम लहजे वाली औरत ने
अपने यक़ीन, अपने किरदार और अपने सलीके से
इतिहास लिख दिया।

आज उनके जाने पर
उस जीत की याद और भी ज्यादा रुलाती है…
क्योंकि अब समझ आता है कि
वह सिर्फ चुनाव नहीं जीत रही थीं—
वह लोगों का भरोसा बचा रही थीं।

वह उन औरतों में थीं, जिन्होंने रास्ते नहीं पूछे… रास्ते बनाए

भारतीय संसद के इतिहास में
मुस्लिम महिलाओं की तादाद कितनी कम रही है—
यह एक तल्ख़ सच है।
लेकिन इस तल्ख़ी के बीच
मोहसिना किदवई एक रोशन मिसाल बनकर उभरीं।

उन्होंने सिर्फ यह साबित नहीं किया कि
एक मुस्लिम महिला संसद तक पहुंच सकती है,
बल्कि यह भी साबित किया कि
वह नेतृत्व कर सकती है, फैसले ले सकती है, संकट में खड़ी रह सकती है, और इतिहास में अपना नाम दर्ज करा सकती है।

आज बहुत सी लड़कियां,
बहुत सी बेटियां,
बहुत सी पर्दानशीं और हौसलेमंद औरतें
शायद उन्हें याद करके यह सोचेंगी कि
“हमारे लिए रास्ता बनाने वालों में एक नाम मोहसिना किदवई का भी था…”

और यही एहसास
उनके इंतिक़ाल को और भी भारी बना देता है।

उनकी सियासत में कुर्सी नहीं… ज़मीर बैठा करता था

सीनियर कांग्रेसी नेता चचा अमीर हैदर एडवोकेट बताते है

मोहसिना किदवई को
इंदिरा गांधी का भरोसा मिला,
राजीव गांधी की नज़दीकी मिली,
बड़े ओहदे मिले,
बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं।

वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी अहम रहीं,
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी बनीं,
केंद्रीय मंत्री भी रहीं,
और पार्टी संगठन में भी मजबूत स्तंभ बनीं।

लेकिन इन सबके बावजूद
उन्होंने कभी अपने दामन पर
हवस-ए-सत्ता की गर्द नहीं बैठने दी।

आज जब राजनीति का हर पन्ना
किसी न किसी इल्ज़ाम, किसी न किसी दाग़, किसी न किसी स्वार्थ से सना दिखाई देता है,
वहाँ मोहसिना किदवई का नाम
एक साफ़ सफ़ेद चादर की तरह सामने आता है।

कितना बड़ा दुख है कि
ऐसी बेदाग़ सियासत अब किस्सों में बचती जा रही है…
और आज उन किस्सों का एक सबसे खूबसूरत किरदार भी चला गया।

वह बोलती थीं… तो लगता था राजनीति अभी पूरी तरह मरी नहीं है

समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप बताते है

उनकी आवाज़ में कभी बाज़ार की सस्ती गर्मी नहीं थी।
उनके लहजे में कभी अपमान की खुरदुराहट नहीं थी।
उनकी भाषा में कभी नफ़रत का धुआँ नहीं था।

वे बोलती थीं
तो लगता था
अवध की तहज़ीब अभी ज़िंदा है।
वे चलती थीं
तो लगता था
सियासत अभी पूरी तरह बेशर्म नहीं हुई।
वे मुस्कुराती थीं
तो लगता था
नेतृत्व में अब भी इंसानियत बाकी है।

आज जब वे नहीं रहीं,
तो सच कहें—
सिर्फ एक इंसान नहीं गया,
सियासत की आवाज़ का एक मुलायम हिस्सा चला गया।

उनकी किताब में राजनीति थी… मगर दिल भी धड़कता था

उन्होंने अपने लंबे सियासी सफर को
“My Life in Indian Politics” में दर्ज कराया।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राशिद किदवई द्वारा दस्तावेजित यह किताब
सिर्फ घटनाओं का सिलसिला नहीं,
बल्कि एक ऐसी औरत की कहानी है
जिसने सत्ता की धूल में भी अपने दिल की नमी बचाकर रखी।

उस किताब में
इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी,
मनमोहन सिंह से लेकर अहमद पटेल,
राजीव गांधी से लेकर कई बड़े सियासी चेहरों तक का ज़िक्र है—
लेकिन सबसे गहरी बात यह है कि
उसमें एक पत्नी, एक माँ, एक बहन, एक रूहानी इंसान भी सांस लेता हुआ महसूस होता है।

उन्होंने अपनी किताब
अपने दिवंगत पति खलीलुर रहमान किदवई को समर्पित की थी।

और आज…
जब वह खुद इस दुनिया से रुख़्सत हो गईं,
तो उनकी वही मोहब्बत भरी पंक्तियां
और ज्यादा नम कर देती हैं।

ऐसा लगता है जैसे
अब वह अपने उस हमसफ़र के पास चली गईं
जिसे उन्होंने उम्र भर अपने दिल में बसाए रखा।

आज बहुत लोग रोएंगे… मगर कुछ आंसू इतिहास के होंगे

आज रोने वाले सिर्फ उनके घर वाले नहीं होंगे।
आज रोने वाले सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ता नहीं होंगे।
आज रोने वाले सिर्फ उनके साथी, चाहने वाले और जानने वाले नहीं होंगे।

आज रोएगी
वह लड़की, जो राजनीति में अपने लिए जगह ढूंढ रही है।
आज रोएगा
वह बुज़ुर्ग कांग्रेसी, जो पुराने दिनों की शराफ़त याद करता है।
आज रोएगा
वह पत्रकार, जिसने उनमें बयान नहीं, व्यक्तित्व देखा था।
आज रोएगा
वह हिंदुस्तान, जो अब भी कुछ बेदाग़ नामों को अपनी उम्मीद समझता है।

क्योंकि मोहसिना किदवई के जाने का दुख
सिर्फ निजी नहीं है—
यह तारीखी है।
यह कौमी है।
यह रूहानी है।

निज़ामुद्दीन की मिट्टी आज सिर्फ एक जिस्म नहीं, एक दौर को अपने सीने में उतारेगी

दिल्ली के निज़ामुद्दीन में
जब उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाएगा,
तो बहुत से लोग सिर्फ फातिहा नहीं पढ़ेंगे—
वे अपने दिल के अंदर
एक पूरे दौर को दफ्न होते महसूस करेंगे।

मिट्टी की हर मुट्ठी शायद यही कहेगी—

“यह सिर्फ एक औरत नहीं थी…
यह एक जमाने की शराफ़त थी…”

कब्र की खामोशी में शायद यह भी सुनाई देगा—

“कुछ लोग चले जाते हैं,
मगर उनके जाने के बाद दुनिया थोड़ी और बेरंग हो जाती है…”

और सच यही है—
आज भारतीय राजनीति
थोड़ी और बेरंग हो गई है।
थोड़ी और खाली हो गई है।
थोड़ी और अनाथ हो गई है।

अलविदा मोहसिना किदवई…

अलविदा उस आवाज़ को
जो कभी चीखी नहीं, मगर हमेशा सुनी गई।

अलविदा उस चेहरे को
जिस पर सत्ता का घमंड कभी नहीं आया।

अलविदा उस औरत को
जिसने मुस्लिम महिलाओं के लिए सिर्फ बातें नहीं,
बल्कि रास्ता छोड़ा।

अलविदा उस सियासत को
जिसमें अदब था, एहतराम था, इंसानियत थी।

अलविदा मोहसिना किदवई…
आप चली गईं,
लेकिन अपने पीछे
एक मिसाल, एक तहज़ीब, एक सलीका, एक पाक नाम छोड़ गईं।

और कुछ लोग
इसी तरह अमर होते हैं।

तहलका टुडे की तरफ़ से अश्कबार खिराज-ए-अक़ीदत

तहलका टुडे
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री,
शराफ़त, सियासी वकार और मुस्लिम महिलाओं की बुलंद मिसाल
मोहसिना किदवई के इंतिक़ाल पर
बेहद गहरे रंज, सदमे और अश्कबार खिराज-ए-अक़ीदत का इज़हार करता है।

रब्बे करीम मरहूमा की मग़फिरत फरमाए,
उनकी क़ब्र को नूर से भर दे,
उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुकाम अता फरमाए,
और उनके अहल-ए-ख़ाना, चाहने वालों और तमाम ग़मज़दा दिलों को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।
आमीन।

 

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