तहलका टुडे टीम/मनोज शुक्ला
लखनऊ, 11 अगस्त।
वक्फ संपत्तियों की निगरानी और प्रबंधन के लिए गठित उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की 7 अगस्त 2026 को हुई बैठक अब एक साधारण प्रशासनिक बैठक नहीं रह गई है। बैठक खत्म हो चुकी है, लेकिन उसके बाद उठे सवालों ने पूरी कार्यवाही की पारदर्शिता, सदस्यों की वास्तविक उपस्थिति, कथित वर्चुअल/हाइब्रिड सहभागिता, कोरम, मतदान और मिनट्स की प्रमाणिकता को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
सेव वक्फ इंडिया ने मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ विभाग, केंद्रीय वक्फ परिषद तथा संबंधित सतर्कता प्राधिकारियों से स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग की है।
सेव वक्फ इंडिया के प्रवक्ता मौलाना सैयद इफ्तिखार हुसैन इंकलाबी की ओर से दिए गए शिकायत-ज्ञापन में एक बेहद सीधा सवाल रखा गया है—बैठक हुई, लेकिन क्या वह पूरी वैधानिक प्रक्रिया के साथ हुई?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय वक्फ कानून की धारा 17 बोर्ड की बैठकों और उनमें निर्णय लेने की व्यवस्था से संबंधित है। कानून के अनुसार बोर्ड की बैठक निर्धारित नियमों के अनुसार होती है और बैठक में आने वाले प्रश्न उपस्थित सदस्यों के बहुमत से तय किए जाते हैं। वहीं धारा 110 बोर्ड को बैठक के समय, स्थान और कार्यवाही की प्रक्रिया के संबंध में विनियम बनाने की शक्ति देती है।
मामला वर्चुअल बैठक का नहीं, वैधानिकता का है
शिकायत में एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बरती गई है। सेव वक्फ इंडिया ने यह दावा नहीं किया है कि वर्चुअल बैठक अपने आप गैरकानूनी है।
असल सवाल यह है कि 7 अगस्त की बैठक को वर्चुअल अथवा हाइब्रिड माध्यम से आयोजित करने का आधार क्या था? क्या इसकी अनुमति लागू नियमों अथवा बोर्ड के विनियमों में थी? क्या मूल बैठक नोटिस में ऑनलाइन भागीदारी का प्रावधान था? क्या सभी सदस्यों को इसकी विधिवत सूचना दी गई थी?
यानी जांच का केंद्र माध्यम नहीं बल्कि प्रक्रिया है।
और यहीं से मामला गंभीर हो जाता है।
“जब महत्वपूर्ण फैसले हैं तो वर्चुअल बैठक क्यों?”
शिकायत में संसद, विधानसभा और कैबिनेट की बैठकों का उदाहरण देते हुए यह सवाल उठाया गया है कि जब शासन-प्रशासन सामान्य रूप से चल रहा है और इतने महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लिए जाने हैं, तो बोर्ड ने वर्चुअल/हाइब्रिड व्यवस्था क्यों अपनाई?
शिकायतकर्ता यह भी जानना चाहते हैं—
क्या कोई आपात परिस्थिति थी?
क्या सदस्यों के लखनऊ आने में कोई वास्तविक बाधा थी?
क्या फिजिकल बैठक संभव नहीं थी?
क्या वर्चुअल बैठक की आवश्यकता का कारण सरकारी फाइल पर दर्ज किया गया था?
हालांकि, केवल संसद या विधानसभा के भौतिक रूप से मिलने से वक्फ बोर्ड की ऑनलाइन बैठक स्वतः अवैध सिद्ध नहीं होती। लेकिन यदि बैठक के माध्यम को लेकर कोई विशेष वैधानिक या प्रशासनिक प्रक्रिया निर्धारित है, तो उसका पालन हुआ या नहीं—यह जांच का विषय अवश्य बन सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल—कौन सदस्य कितनी देर बैठक में रहा?
सेव वक्फ इंडिया ने केवल उपस्थिति दर्ज करने को पर्याप्त मानने के बजाय डिजिटल सत्यापन की मांग की है।
मांग है कि प्रत्येक सदस्य के संबंध में पता लगाया जाए—
- Login कब हुआ?
- Logout कब हुआ?
- कुल कितनी देर ऑनलाइन रहा?
- किन एजेंडा पर उपस्थित था?
- महत्वपूर्ण प्रस्तावों के समय ऑनलाइन था या नहीं?
- चर्चा में हिस्सा लिया या नहीं?
- मतदान के समय मौजूद था या नहीं?
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन ऑनलाइन दिखाई दिया, बल्कि यह है कि कौन वास्तविक रूप से निर्णय प्रक्रिया में शामिल था?
अनुपस्थिति पत्र देने वाले सदस्यों का मामला भी जांच में
शिकायत में एक बेहद महत्वपूर्ण बिंदु उठाया गया है।
यदि किसी सदस्य ने बैठक में शारीरिक रूप से शामिल न हो पाने के संबंध में अपनी मजबूरी बताते हुए पत्र दिया था, तो यह भी जांचा जाए कि क्या उसी सदस्य ने वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल होने की अलग अनुमति अथवा अनुरोध किया था?
यदि ऐसा कोई अनुरोध नहीं था, तो बाद में उस सदस्य को ऑनलाइन उपस्थित दिखाए जाने का आधार क्या था—यह सवाल भी रिकॉर्ड से साफ होना चाहिए।
रिकॉर्डिंग सुरक्षित करो—फिर सच सामने आएगा
सेव वक्फ इंडिया ने 7 अगस्त की बैठक की संपूर्ण डिजिटल सामग्री तत्काल सुरक्षित कराने की मांग की है।
इसमें शामिल हैं—
ऑडियो रिकॉर्डिंग, वीडियो रिकॉर्डिंग, स्क्रीन रिकॉर्डिंग, Login/Logout डेटा, Digital Attendance, Meeting ID, Meeting Link, Chat Record, Screen Sharing Record, Voting Record, बैठक शुरू और समाप्त होने का समय तथा संबंधित आधिकारिक ई-मेल और डिजिटल पत्राचार।
शिकायत में कहा गया है कि जांच पूरी होने तक इन रिकॉर्ड को Delete, Edit, Replace अथवा Overwrite न किया जाए।
यही रिकॉर्ड यह बताने में निर्णायक हो सकते हैं कि बैठक में वास्तव में क्या हुआ।
हस्ताक्षर बनाम डिजिटल रिकॉर्ड—किस पर भरोसा?
बैठक की Attendance Sheet को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है।
प्रत्येक सदस्य के हस्ताक्षर का मिलान—
Attendance Sheet + Digital Login + Video Recording + Login/Logout + Voting Record
से कराने की मांग है।
यदि किसी सदस्य का हस्ताक्षर मौजूद है, लेकिन उसके डिजिटल लॉग का रिकॉर्ड अलग कहानी बताता है, तो विसंगति की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
कोरम की असली परीक्षा हर प्रस्ताव पर
शिकायत में कहा गया है कि सिर्फ बैठक शुरू होने के समय उपस्थित सदस्यों की संख्या देखकर कोरम की जांच पूरी नहीं हो सकती।
जांच होनी चाहिए कि—
कुल वैधानिक सदस्य कितने थे?
कितने पद रिक्त थे?
कितने फिजिकल मौजूद थे?
कितने ऑनलाइन जुड़े?
कौन बीच में चला गया?
प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर कितने सदस्य मौजूद थे?
और उस समय लागू नियमों के अनुसार आवश्यक कोरम क्या था?
क्योंकि किसी बैठक की शुरुआत में उपस्थिति पूरी होने के बावजूद यदि महत्वपूर्ण मतदान के समय सदस्य कम हो जाएं, तो उस समय की वास्तविक स्थिति अलग महत्व रख सकती है।
ऑनलाइन दिखना और निर्णय में भाग लेना अलग-अलग बातें
शिकायत का एक महत्वपूर्ण तर्क है कि किसी सदस्य का स्क्रीन पर दिखाई देना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उसने प्रत्येक प्रस्ताव पर चर्चा या मतदान में हिस्सा लिया।
इसलिए प्रस्ताववार जांच की मांग की गई है—
प्रस्ताव किसने रखा?
किसने समर्थन किया?
किसने चर्चा की?
किसने विरोध किया?
किसने मतदान किया?
किसने आपत्ति दर्ज की?
यही विवरण बैठक की वास्तविक लोकतांत्रिक और वैधानिक प्रक्रिया को स्पष्ट कर सकता है।
“सर्वसम्मति से पारित” लिखा है तो रिकॉर्डिंग भी यही कहती है?
अब सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक—Minutes of Meeting—भी जांच के घेरे में है।
सेव वक्फ इंडिया ने मांग की है कि मिनट्स को पूरी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग से मिलाया जाए।
यदि मिनट्स में लिखा है—
“सर्वसम्मति से पारित”
“सभी सदस्यों की सहमति”
“कोई आपत्ति नहीं”
तो रिकॉर्डिंग से यह सत्यापित किया जाए कि वास्तव में ऐसा ही हुआ था या नहीं।
यदि मिनट्स और रिकॉर्डिंग में अंतर मिलता है तो उसकी जिम्मेदारी भी निर्धारित की जानी चाहिए।
CEO की भूमिका पर भी सवाल
शिकायत में CEO की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति को भी जांच का हिस्सा बनाने की मांग की गई है।
यदि CEO बैठक में मौजूद नहीं थे तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि—
बैठक किसने संचालित की?
मिनट्स किसने तैयार की?
किसने प्रमाणित की?
प्रस्तावों को आधिकारिक रिकॉर्ड में किसने दर्ज किया?
CEO को निर्णयों की जानकारी कब दी गई?
क्या CEO ने किसी निर्णय पर आपत्ति की?
वक्फ अधिनियम में CEO से संबंधित अलग वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं, जिनमें उनकी नियुक्ति और कर्तव्यों/शक्तियों से संबंधित धाराएं शामिल हैं।
UMEED Portal ने बढ़ा दी रिकॉर्ड की अहमियत
2025 के संशोधन के बाद वक्फ से संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड की भूमिका और महत्वपूर्ण हो गई है।
धारा 3B के तहत पोर्टल एवं डेटाबेस पर वक्फ संपत्ति की पहचान एवं सीमाएं, उपयोग/कब्जा, वर्तमान मुतवल्ली एवं प्रबंधन, आय-व्यय और संबंधित मुकदमों जैसी सूचनाएं दाखिल की जानी हैं।
वहीं धारा 36 में वक्फ के पंजीकरण और पोर्टल/डेटाबेस के माध्यम से आवेदन से संबंधित व्यवस्था दी गई है।
इसलिए शिकायत में मांग की गई है कि यदि 7 अगस्त की बैठक में UMEED Portal से संबंधित कोई निर्णय हुआ है तो—
पुरानी वक्फ फाइल → मूल रिकॉर्ड → राजस्व रिकॉर्ड → UMEED Entry → Modification History → Board Resolution → Minutes
का मिलान कराया जाए।
मुतवल्ली नियुक्ति हुई तो चयन प्रक्रिया भी जांची जाए
यदि बैठक में किसी मुतवल्ली या समिति की नियुक्ति हुई है तो शिकायत में उसकी पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।
कितने आवेदन आए?
पात्रता कैसे जांची गई?
विज्ञापन हुआ या नहीं?
सत्यापन कैसे हुआ?
चयन का आधार क्या था?
किसी मुकदमे अथवा विवाद की जानकारी थी या नहीं?
इन सवालों के जवाब भी रिकॉर्ड में होने चाहिए।
वित्तीय फैसलों पर भी नजर
यदि बैठक में बैंक खाते, हस्ताक्षरकर्ता, वक्फ फंड, किराया, पट्टा, भुगतान या वित्तीय अधिकारों से संबंधित निर्णय लिए गए हैं तो स्वतंत्र वित्तीय ऑडिट की मांग की गई है।
शिकायत में जांच का सीधा फार्मूला दिया गया है—
Bank Account + Signatory + Resolution + Minutes + Attendance + Voting
यानी कागज पर दर्ज निर्णय से लेकर बैंक में हुए वास्तविक लेन-देन तक पूरी श्रृंखला की जांच।
चार स्तर की स्वतंत्र जांच का प्रस्ताव
सेव वक्फ इंडिया ने जांच को चार स्तरों पर कराने का सुझाव दिया है—
**Legal Audit
- Digital Forensic Audit
- Document Verification
- Financial Audit**
साथ ही मांग की गई है कि जांच ऐसे अधिकारियों/विशेषज्ञों से कराई जाए जो बैठक की विवादित प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से शामिल न रहे हों।
वक्फ बोर्ड की वेबसाइट पर पारदर्शिता की मांग
शिकायत में बोर्ड की वेबसाइट को सक्रिय कर जनता के सामने महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग भी की गई है।
इनमें—
सदस्य सूची, नियुक्ति अधिसूचनाएं, कार्यकाल, रिक्त पद, बैठक नोटिस, एजेंडा, Minutes, शासनादेश, नियम-विनियम तथा उपलब्ध वित्तीय/ऑडिट रिपोर्ट
शामिल हैं।
मांग का मूल संदेश साफ है—जिस संस्था की संपत्तियां सार्वजनिक धार्मिक-धर्मार्थ हित से जुड़ी हैं, उसकी कार्यवाही भी पारदर्शी होनी चाहिए।
अब असली परीक्षा शासन की
7 अगस्त की बैठक को लेकर उठे सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड से मिल सकता है।
अगर रिकॉर्डिंग सुरक्षित है, तो उसे जांचिए।
अगर Login/Logout डेटा है, तो उसे सामने लाइए।
अगर मतदान हुआ है, तो उसका रिकॉर्ड दिखाइए।
अगर कोरम पूरा था, तो प्रमाणित कीजिए।
अगर मिनट्स सही हैं, तो उन्हें रिकॉर्डिंग से मिलाइए।
अगर UMEED Portal पर कोई निर्णय हुआ है, तो उसका Audit Trail जांचिए।
यही वह रास्ता है जिससे विवाद की धुंध साफ हो सकती है।
सेव वक्फ इंडिया का कहना है कि वक्फ बोर्ड की बैठक किसी व्यक्ति अथवा पदाधिकारी की निजी कार्यवाही नहीं, बल्कि एक वैधानिक संस्था की आधिकारिक कार्यवाही है। इसलिए जनता और वक्फ हितधारकों का यह जानना स्वाभाविक है कि—
कौन उपस्थित था? कितनी देर उपस्थित था? किसने चर्चा की? किसने मतदान किया? प्रत्येक निर्णय के समय कोरम कितना था? निर्णय किस आधार पर हुआ? और क्या मिनट्स में वही दर्ज हुआ जो वास्तव में बैठक में हुआ?
अब नजर शासन और संबंधित प्राधिकारियों की कार्रवाई पर है। शिकायत पर स्वतंत्र जांच होती है तो 7 अगस्त की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, डिजिटल उपस्थिति, हस्ताक्षर, मतदान, मिनट्स और UMEED रिकॉर्ड इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां साबित हो सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—सिर्फ बैठक हुई थी, या बैठक की हर वैधानिक प्रक्रिया भी पूरी हुई थी?




