तहलका टुडे डेस्क/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
उत्तर प्रदेश शासन के कार्मिक अनुभाग द्वारा 28 मई 1997 को जारी शासनादेश सं० 13/21/89-का-1-1997 स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करता है कि जिन अधिकारियों के विरुद्ध न्यायालय में अभियोजन लंबित हो और आरोप-पत्र दाखिल हो चुका हो, उनके मामलों में प्रोन्नति/चयन की संस्तुति “मुहरबंद लिफाफे” में रखी जाएगी।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जब दो अलग-अलग आपराधिक मामलों में आरोप विरचित (Charges Framed) हो चुके हैं, तो सेवानिवृत्ति के बाद सेवा-विस्तार किस आधार पर दिया गया?
🔥 बड़ा सवाल: शासनादेश की भावना का पालन हुआ या नहीं?
शासनादेश 28.05.1997 के अनुसार:
- लंबित अभियोजन की स्थिति में निर्णय सावधानीपूर्वक और कारण-सहित होना चाहिए।
- लोकहित सर्वोपरि होना चाहिए।
- प्रक्रिया पारदर्शी और नियमसम्मत होनी चाहिए।
अब चर्चा यह है कि:
- क्या सेवा-विस्तार से पहले लंबित मामलों की विधिवत समीक्षा हुई?
- क्या बोर्ड की बैठक में प्रस्ताव पारित हुआ?
- क्या शासन स्तर से स्पष्ट अनुमोदन प्राप्त किया गया?
- क्या कारण-सहित आदेश अभिलेखों में दर्ज है?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट नहीं है, तो मामला प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ जाता है।
⚖ दो न्यायालयीय मामले
सार्वजनिक न्यायालयीय अभिलेखों के अनुसार संबंधित अधिकारी के विरुद्ध:
- सत्र वाद सं० 1322/2020 (थाना सआदतगंज)
- दाण्डिक याद सं० 5088/12 (थाना हजरतगंज)
दोनों में आरोप फ्रेम हो चुके हैं और मामले विचाराधीन हैं।
❓ कौन जिम्मेदार?
अब विभागीय हलकों में तीन स्तर पर प्रश्न उठ रहे हैं:
- क्या बोर्ड स्तर पर निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह नियमसम्मत थी?
- क्या शासन की “जीरो टॉलरेंस” नीति के अनुरूप परीक्षण हुआ?
- क्या सेवा-विस्तार विशुद्ध लोकहित में था?
यदि नियमों का पूर्ण पालन हुआ है, तो संबंधित अभिलेख सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
यदि प्रक्रिया में त्रुटि है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
🕸 क्या “मकड़जाल” की आशंका?
कुछ सामाजिक संगठनों और समुदाय के प्रतिनिधियों ने आशंका जताई है कि वक्फ संपत्तियों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर पारदर्शिता की कमी है।
हालाँकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
परंतु यह प्रश्न अवश्य उठ रहा है कि:
क्या बोर्ड किसी दबाव या प्रभाव में निर्णय ले रहा है?
या यह पूरी तरह विधिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय है?
📌 संवैधानिक कसौटी
अनुच्छेद 14 के तहत प्रशासनिक निर्णय:
✔ गैर-मनमाने
✔ कारणबद्ध
✔ पारदर्शी
✔ लोकहित आधारित
होने चाहिए।
सेवा-विस्तार जैसे निर्णय स्वाभाविक रूप से अधिक कठोर परीक्षण की मांग करते हैं।
🚨 विभागों में हड़कंप क्यों?
जैसे ही 1997 के शासनादेश का हवाला सामने आया, विभागीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई।
यदि “बंद लिफाफा नियम” लागू होता है, तो सेवा-विस्तार का आधार क्या था?
यही प्रश्न अब प्रशासनिक हलकों में गूंज रहा है
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष की दोषसिद्धि का नहीं, बल्कि नियमों की अनुपालना और प्रशासनिक पारदर्शिता का है।
जब तक:
- सेवा-विस्तार से जुड़ी फाइल नोटिंग,
- शासन अनुमोदन,
- बोर्ड प्रस्ताव,
सार्वजनिक नहीं होते — सवाल बने रहेंगे।





