करबला की ख़ामोश मिट्टी में सो गया एक शाइस्ता इंसान,मरहूम ज़िया अब्बास ज़ैदी की याद में

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Tahalka Today Team 

कुछ लोग ज़िंदगी में बहुत लंबे अरसे तक नहीं रहते, मगर उनकी मौजूदगी इतनी सलीक़ेमंद होती है कि उनके चले जाने के बाद भी उनकी आवाज़, उनका अंदाज़-ए-गुफ़्तगू और उनकी मुस्कान देर तक हमारे आसपास ठहरी रहती है।

ज़िया अब्बास ज़ैदी भी उन्हीं लोगों में से एक थे।

उनसे अक्सर मुलाक़ात होती थी। बातचीत लंबी हो या छोटी, उसमें एक ख़ास शाइस्तगी होती थी। न आवाज़ में तल्ख़ी, न बात में बनावट। जैसे हर जुमला पहले दिल की चौखट पर दस्तक देता हो और फिर ज़बान तक आता हो।

वह नेक, शाइस्ता, सादा और क़द्र-मोहब्बत करने वाले इंसान थे।

आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं तो महसूस होता है कि कुछ इंसान चले नहीं जाते—वे अपनी तहज़ीब, अपनी यादों और अपने किरदार में यहीं रह जाते हैं।

एक घर, जिसकी रगों में मोहब्बत और मजलिस की रवायत थी

ज़िया अब्बास ज़ैदी, इंजीनियर जर्रार हुसैन ज़ैदी के बेटे थे।

इंजीनियर जर्रार हुसैन ज़ैदी, भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथारिटी आफ़ताबे शरीयत मौलाना डॉ. सैयद कल्बे जवाद नक़वी के अहम फ़ॉलोअर थे। ज़िया अब्बास ज़ैदी ने भी अपने वालिद की इसी अकीदत और मोहब्बत को आगे बढ़ाया।

नमाज़-ए-जुमा में आफ़ताबे शरीयत की इमामत के पीछे नमाज़ पढ़ने को वह अपने लिए शरफ़ समझते थे।

यह सिर्फ़ किसी शख़्सियत से लगाव नहीं था।

यह एक रवायत थी।

एक ऐसी रवायत जिसमें इल्म, मज़हब, मजलिस और अहले-बैत से मोहब्बत एक-दूसरे में इस तरह घुली हुई थी जैसे पुराने लखनऊ की किसी गली में इत्र की ख़ुशबू।

और इस घर की एक और पहचान थी—उनकी वालिदा।

एक बेहतरीन ज़ाकिरा।

मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी साहब के मुताबिक, जब उनके घर में ताज़िया उठता, तो ज़िया अब्बास ज़ैदी की वालिदा जनानी मजलिस में मर्सिया पढ़ती है।
एक नेक इंसान हम लोगों से रुखसत हो गया बेहद अफसोस है।

सोचिए…

जिस घर में मां की आवाज़ में मजलिस और मर्सिया गूंजता हो, जहां बच्चे बचपन से कर्बला की दास्तान सुनते हुए बड़े हुए हों, जहां ताज़िए के साये में आंसुओं और सलाम की रवायत पीढ़ियों से चली आ रही हो—उस घर का बेटा जब दुनिया से रुख़सत होता है तो उसके जनाज़े के साथ सिर्फ़ रिश्तेदार नहीं चलते, पूरी एक याद चलती है।

वह 5 अगस्त की शाम

5 अगस्त की शाम थी।

शहर अपनी रोज़मर्रा की रफ़्तार में था।

मगर एक घर में वक़्त अचानक रुक गया था।

ज़िया अब्बास ज़ैदी की डायलिसिस जेनिथ हॉस्पिटल में हो चुकी थी , तभी अचानक तबीयत बिगड़ी। ब्रेन हैमरेज के बाद जिंदगी और मौत के बीच की वह महीन लकीर सामने थी, जिसके आगे इंसान की सारी कोशिशें बेबस हो जाती हैं।

अम्बर ग्रुप के चेयरमैन वफ़ा अब्बास को जैसे यह ख़बर भीतर तक हिला गई। फौरन हमे फोन किया ,और ऑफिस के स्टाफ को डॉ आदिल अपनी पूरी टीम के साथ लग गए।

अम्बर ग्रुप के चेयरमैन वफ़ा अब्बास ने जिया भाई की जिंदगी बचाने के लिए एक पैर पर खड़े होकर ज़िया भाई की ज़िंदगी बचाने की हर मुमकिन कोशिश की।

डायरेक्टर फ़िदा अब्बास और शुजा अब्बास ने भी रात-दिन एक कर दिया।

किसी ने दुआ की।

किसी ने डॉक्टरों से बात की।

किसी ने उम्मीद का दामन थामे रखा।

लेकिन कुछ फ़ैसले ऐसे होते हैं जिनके सामने इंसान की तमाम कोशिशें ख़ामोश हो जाती हैं। हालत दिन पर दिन गिरती जा रही थी,

अजीज दार रिश्तेदारों के मशविरे से एरा मेडिकल कॉलेज में एडमिट किया गया, यहां भी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स और स्टाफ ने पूरी जान लगा दी

जो अल्लाह को मंज़ूर था, वही हुआ।

इरा मेडिकल कॉलेज से सादिक अपार्टमेंट तक

14 अगस्त को जुमे की सुबह वह सफ़र शुरू हुआ जिसे कोई अपना नहीं चाहता।

इरा मेडिकल कॉलेज से ज़िया अब्बास ज़ैदी का पार्थिव शरीर सादिक अपार्टमेंट, नबीउल्लाह रोड, लखनऊ लाया गया।

वह घर, जहां कभी उनकी आवाज़ सुनाई देती थी…

जहां शायद किसी को यह अंदाज़ा भी न रहा होगा कि आज दरवाज़े से अंदर आने वाला यह सफ़र उन्हें आख़िरी बार घर तक ला रहा है।

कभी जिस इंसान के आने से घर आबाद होता था, आज उसी के चारों तरफ़ ख़ामोशी जमा थी।

फिर ग़ुस्ल के लिए उन्हें ले जाया गया।

और उसके बाद…

नमाज़-ए-जुमा में लाया गया।

जब बड़े मजमे के बीच नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई गई

नमाज़-ए-जुमा के बाद एक बड़ा मजमा जमा था।

आंखें नम थीं।

चेहरों पर सन्नाटा था।

और उस भीड़ के बीच आफ़ताबे शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई।

कितनी अजीब बात है…

जिस शख़्स के पीछे ज़िया अब्बास ज़ैदी ज़िंदगी में नमाज़ पढ़ने को शरफ़ समझते थे, उसी शख़्स ने उनके दुनिया से आख़िरी सफ़र पर नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई।

ज़िंदगी का एक पूरा चक्र जैसे एक ही पल में सामने आ गया।

या हुसैन… या अब्बास…

फिर जनाज़ा उठा।

रिश्तेदार साथ थे।

दोस्त साथ थे।

अज़ीज़ साथ थे।

मगर सबसे आगे चल रहे थे आंसू।

किसी मां की आंखों के।

किसी बेवा की आंखों के।

किसी छोटे बच्चे की उन आंखों के, जिन्हें अभी यह समझना बाकी था कि अब अब्बा दरवाज़ा खोलकर वापस क्यों नहीं आएंगे।

और फिर…

“या हुसैन…”

“या अब्बास…”

की सदाएं बुलंद होने लगीं।

करबला तालकटोरा की मिट्टी ने अपनी आग़ोश खोल दी।

वह मिट्टी, जिसने सदियों से उन लोगों को अपने सीने में जगह दी है जिनकी ज़िंदगी में कर्बला सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि एक किरदार रही है।

ज़िया अब्बास ज़ैदी भी उसी मिट्टी के सुपुर्द कर दिए गए।

एक मां और बेवा की सिसकी और दो बच्चों की ख़ामोशी और बेबसी से रोना

कर्बला की उस मिट्टी के पास खड़े होकर मुझे बार-बार उनकी बुजुर्ग वालिदा का ख़याल आता रहा।

वही मां…

जिसकी आवाज़ कभी मजलिस में मर्सिये,मजलिस के खिताब की शक्ल में बुलंद होती है।

जिसके घर मे अजादारी की आवाज उठती थी।

जिसने अपने बेटे को अकीदत और अदब की फिज़ा में पाला था।

आज उसी मां के सामने उसका बेटा मिट्टी के नीचे था।

और दो छोटे बच्चे…शायद उन्हें अभी मौत का मतलब पूरी तरह मालूम नहीं।

उन्हें बस इतना मालूम है कि घर में अब एक आवाज़ कम हो गई है।

एक कुर्सी खाली है।

एक दरवाज़ा बेआवाज़ खुलता-बंद होता है।

और एक चेहरा, जिसे देखने की आदत थी, अब तस्वीर में रह गया है।

उनकी सिसकियां और “या हुसैन, या अब्बास” की सदाएं जैसे आसमान तक जा रही थीं।

अम्बर ग्रुप के लिए सिर्फ़ एक साथी नहीं, अपना था

ज़िया अब्बास ज़ैदी के इस सानेहे ने अम्बर ग्रुप को भी गहरे सदमे में डाल दिया।

चेयरमैन वफ़ा अब्बास, डायरेक्टर फ़िदा अब्बास और शुजा अब्बास ने उनकी ज़िंदगी बचाने के लिए जो कोशिशें कीं, वे इस बात की गवाही देती हैं कि किसी रिश्ते का नाम हर बार खून का रिश्ता नहीं होता।

कुछ रिश्ते काम की मेज़ पर बनते हैं।

कुछ दोस्ती में।

कुछ मोहब्बत में।

और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें कोई नाम देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

ज़िया भाई उन्हीं रिश्तों में से एक थे।

लखनऊ की तहज़ीब का एक छोटा-सा किरदार

आज जब लखनऊ की तहज़ीब की बात होती है तो हम यहां की गलियों, इमामबाड़ों, अदब, शायरी और पुरानी इमारतों का ज़िक्र करते हैं।

मगर तहज़ीब सिर्फ़ इमारतों में नहीं रहती।

वह इंसानों में रहती है।

किसी के सलाम करने के अंदाज़ में।

किसी के बैठने के सलीक़े में।

किसी बड़े से बात करने की आवाज़ में।

किसी छोटे को इज़्ज़त देने के ढंग में।

और ज़िया अब्बास ज़ैदी में वह तहज़ीब दिखाई देती थी।

उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यही थी कि वे शरीफ़ थे और शराफ़त का प्रदर्शन नहीं करते थे।

वह शाइस्ता थे और अपनी शाइस्तगी का ऐलान नहीं करते थे।

उनसे अक्सर मुलाक़ात होती थी।

बातचीत होती थी।

कभी किसी मसले पर, कभी किसी काम पर, कभी यूं ही।

लेकिन आज याद आता है कि उन छोटी-छोटी मुलाक़ातों में भी एक बड़ी चीज़ मौजूद थी—इंसानियत।

अब मजलिस होगी… मगर एक आवाज़ कम होगी

16 अगस्त 2026 को रविवार के दिन दरिया वाली मस्जिद, लखनऊ में ज़िया अब्बास ज़ैदी के ईसाले-सवाब के लिए मजलिस-ए-सय्यूम होगी।

मंच पर मजलिस होगी।

मातम होगा।

ज़िक्र-ए-हुसैन होगा।

मर्सिया और फ़ज़ाइल होंगे।

मगर उस मजलिस में एक ऐसी ख़ामोशी भी होगी जिसे कोई लफ़्ज़ बयान नहीं कर सकेगा।

वह जगह जहां ज़िया भाई बैठते थे, शायद कोई और बैठा होगा।

लोग आएंगे।

सलाम करेंगे।

मजलिस सुनेंगे।

और फिर किसी को अचानक याद आएगा—

“ज़िया भाई नहीं हैं…”

यही तो मौत का सबसे बड़ा एहसास है।

इंसान के जाने के बाद उसकी कमी किसी एक जगह नहीं मिलती।

वह हर जगह मिलती है।

मजलिस-ए-सय्यूम की तफ़सील

मरहूम ज़िया अब्बास ज़ैदी इब्ने इंजीनियर जर्रार हुसैन ज़ैदी

तारीख़: 16 अगस्त 2026, रविवार वक़्त: सुबह 10:00 बजे मक़ाम: दरिया वाली मस्जिद, लखनऊ

ख़िताबत: हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आलिजनाब मौलाना सैयद हसन एजाज़ तूसी साहब क़िबला

ज़नाना मजलिस: इसी वक़्त मरहूम के मकान “सादिक अपार्टमेंट”, नबीउल्लाह रोड, लखनऊ पर होगी। मोमिनीन व मोमिनात से शिरकत की गुज़ारिश है।

सोगवार: ख़ानदान-ए-मरहूम

राब्ता: 9897851020 7906629185 7052331786

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खुदा हाफिज ज़िया भाई!

आपसे आख़िरी मुलाक़ात कब हुई थी, यह शायद अब तारीख़ के किसी पन्ने में दर्ज हो।

लेकिन आपकी शाइस्तगी याद रहेगी।

आपका नरम अंदाज़ याद रहेगा।

आपकी बातचीत का सलीक़ा याद रहेगा।

आपके वालिद इंजीनियर जर्रार हुसैन ज़ैदी की शराफत, अकीदत याद रहेगी।

आपकी वालिदा की मर्सिया-ख़्वानी आपके इसाले सवाब का जरिया बनेगी।

और वह घर याद रहेगा जहां कर्बला की मोहब्बत सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, एक रवायत थी।

आज आप करबला तालकटोरा की मिट्टी में आराम कर रहे हैं।

शायद वहां भी किसी ख़ामोश रात में हवा गुजरती हो और दूर से किसी मजलिस की आवाज़ आती हो—

या हुसैन…

और कोई दिल जवाब देता हो—

या अब्बास…

इंसान चला जाता है।

मगर उसकी शराफ़त नहीं जाती।

उसकी मोहब्बत नहीं जाती।

उसकी याद नहीं जाती।

और कुछ लोग तो ऐसे होते हैं कि उनकी मौत के बाद हमें पहली बार पता चलता है कि उन्होंने हमारी ज़िंदगी में कितनी ख़ामोश जगह घेर रखी थी।

अल्लाह मरहूम ज़िया अब्बास ज़ैदी की मग़फ़िरत फ़रमाए, उनके दर्जात बुलंद फ़रमाए, उन्हें मोहम्मद व आले-मोहम्मद के सदक़े में जवार-ए-अहले-बैत में जगह अता फ़रमाए।

उनकी वालिदा, बेवा, बच्चों, तमाम अज़ीज़ों और दोस्तों को सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए।

मौला इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.) के सदक़े में इस सदमे को सहने की ताक़त अता फ़रमाए।

या हुसैन।

✍️सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा

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