शहनाई का वो सुर जो मोहर्रम के ग़म में भी रोता था – उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की पुण्यतिथि पर खिराजे अकीदत

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तहलका टुडे टीम

वाराणसी की गलियों में गूंजने वाली शहनाई आज भी हिंदुस्तान की रूह है। जब भी गंगा के घाटों की ओर नजर जाती है, ऐसा लगता है जैसे कहीं से उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की धुन उठ रही है। भारत रत्न से सम्मानित इस महान कलाकार ने न सिर्फ़ संगीत की दुनिया को नया आयाम दिया बल्कि इंसानियत और मोहब्बत का वो पैग़ाम दिया, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है।

लाल क़िले से अज़ादारी तक

उस्ताद को यह अनोखा सौभाग्य मिला कि उन्हें भारत के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली के लाल किले पर लाइव प्रस्तुति देने का मौका मिला। यही नहीं, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तय किया कि हर साल 15 अगस्त को दूरदर्शन पर उनकी शहनाई का प्रसारण हो। इस तरह उनकी शहनाई स्वतंत्र भारत की आवाज़ बन गई।

लेकिन बिस्मिल्लाह खान की ज़िंदगी का एक और गहरा पहलू था – उनका कर्बला और अज़ादारी से जुड़ाव। इमामी होने के नाते, उनका कर्बला के शहीदों के प्रति प्रेम बयान से परे था। अपने घर पर वे मजलिसों का आयोजन करते, मोहर्रम के जुलूसों में शामिल होते और पाँचवीं मोहर्रम को अपनी शहनाई से नौहा पढ़ते –
“हर सोज़ सज़ ग़मे हुसैन में रो रहा है…”
उस वक़्त उनकी शहनाई से निकलती मातमी तान सुनने वाले की रूह को कंपा देती थी।

अंजुमन-ए-हैदरी और हुसैनी मिशन

उस्ताद खान साहब ने अंजुमन-ए-हैदरी वाराणसी और कई अन्य संस्थाओं को अज़ादारी और हुसैनी मिशन के प्रचार-प्रसार में भरपूर समर्थन दिया।
उनकी मौजूदगी और सहयोग से ये अंजुमन मोहर्रम की रातों में बड़े-बड़े जुलूस निकालती –

  • 18 रमज़ान को जुलूस-ए-हैदरी
  • 5वीं मोहर्रम को जुलूस-ए-आलम
  • 8वीं मोहर्रम को इमामबाड़ा ख्वाजा नब्बू साहब से जुलूस-ए-आलम व ताबूत
  • शबे आशूर पर जुलूस-ए-आलम
  • और 10वीं मोहर्रम को बेनियाबाग से जुलूस-ए-जुलजनाह

ये सारे जुलूस गंगा-जमुनी तहज़ीब और हुसैनी मिशन के जिंदा रहने की गवाही देते हैं, और इनमें खान साहब का योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

अज़ादारी और फ़न का संतुलन

अपने शुरुआती दिनों में बिस्मिल्लाह खान ने आशूरा और अय्याम-ए-अज़ा के दौरान किसी भी संगीत कार्यक्रम से परहेज़ किया। बाद में, अपने चाहने वालों को निराश न करने के लिए उन्होंने यह नियम बनाया कि आशूरा तक किसी बड़े मंच पर प्रस्तुति नहीं देंगे। यह उनकी आस्था और फ़न दोनों का अनोखा संगम था।

फातमान में आख़िरी आरामगाह

अपने जीवनकाल में ही उन्होंने फ़ैसला किया था कि उनकी कब्र फातमान में होगी – एक ऐसी दरगाह जो बीबी फ़ातिमा को समर्पित है और जिसे स्थानीय कर्बला माना जाता है। वसीयत के मुताबिक़ उनके इंतक़ाल के बाद वहीं उन्हें दफ़न किया गया। बाद में उनके बेटे उस्ताद नैयर हुसैन ने भी मुहर्रम में शहनाई बजाने की परंपरा जारी रखी। उनके इंतक़ाल के बाद अब यह रिवायत उनके वंशज निभा रहे हैं और पाँचवीं मोहर्रम को शहनाई की वह मातमी धुन आज भी गूंजती है।

सम्मान और विरासत

उनकी कला को सलाम करते हुए भारत सरकार ने उन्हें एक-एक कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किए –

  • पद्मश्री – 1961
  • पद्मभूषण – 1968
  • पद्मविभूषण – 1980
  • भारत रत्न – 1991

लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वही था, जब उनकी शहनाई सुनकर इंसानियत झूम उठती और दिल मोहब्बत से भर जाते।

 

मोहब्बत की धुन, इंसानियत का पैग़ाम

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई आज भी गवाही देती है कि कला की कोई सरहद नहीं, मज़हब की कोई दीवार नहीं। उनकी तान कभी लाल क़िले की प्राचीर पर हिंदुस्तान की आज़ादी का जश्न मनाती थी, तो कभी मोहर्रम के मातमी माहौल में कर्बला के ग़म को बयान करती थी।

उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना दरअसल उस गंगा-जमुनी तहज़ीब और हुसैनी मिशन को सलाम करना है, जो उनकी शहनाई की हर धुन में बसा हुआ था।
आज भी जब पाँचवीं मोहर्रम आती है और कहीं से शहनाई की धीमी आवाज़ सुनाई देती है, तो लगता है कि खान साहब कह रहे हैं –

“हर सोज़ सज़ ग़मे हुसैन में रो रहा है…”

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