तहलका टुडे इंटरनेशनल डेस्क
ईरान के इस्फहान प्रांत के ऊपर अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराए जाने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय हलकों में सनसनी फैला दी है। यह कोई साधारण ड्रोन नहीं, बल्कि अमेरिका की सबसे आधुनिक और खतरनाक सैन्य तकनीकों में शामिल माना जाता है। जिस ड्रोन को दुश्मनों की निगरानी, जासूसी और सटीक हमलों के लिए तैयार किया गया था, वही अब ईरान की जवाबी क्षमता के सामने ढेर होता दिखाई दिया। यह घटना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि अमेरिका की तकनीकी ताकत को खुली चुनौती के रूप में देखी जा रही है।
MQ-9 रीपर अपनी लंबी उड़ान क्षमता, हाई-टेक कैमरों, इंफ्रारेड सेंसर, लेज़र टार्गेटिंग सिस्टम और अत्याधुनिक संचार तकनीक के कारण बेहद खास माना जाता है। यह ड्रोन दिन हो या रात, हर मौसम में दुश्मन की हलचल पर नज़र रखने की क्षमता रखता है। इतना ही नहीं, यह मिसाइल और बम ले जाने में भी सक्षम होता है, जिसके चलते इसे सिर्फ निगरानी उपकरण नहीं बल्कि एक उड़ता हुआ हथियार भी कहा जाता है। कई घंटों तक हवा में रहकर दुश्मन के ठिकानों की पहचान करना और फिर उन पर हमला करना इसकी बड़ी ताकत मानी जाती है।
अगर इसकी कीमत की बात करें, तो एक MQ-9 रीपर ड्रोन की अनुमानित लागत करीब 3 से 4 करोड़ अमेरिकी डॉलर बताई जाती है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 250 से 330 करोड़ रुपये के बीच बैठती है। हथियारों, नियंत्रण प्रणाली और ऑपरेशन खर्च को जोड़ दिया जाए तो इसकी कुल लागत और भी ज्यादा हो सकती है। ऐसे में इसका मार गिराया जाना अमेरिका के लिए सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक झटका भी माना जा रहा है।
इस घटना ने साफ कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और अरबों की सैन्य ताकत के बावजूद युद्ध के मैदान में कोई भी अजेय नहीं है। इस्फहान के आसमान में गिरे इस ड्रोन ने दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि अब जंग सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि जवाबी ताकत, हौसले और तकनीकी मुकाबले की भी है।




