तहलका टुडे डेस्क/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
मध्य-पूर्व की तपती हुई फिज़ा में, जहां कई दिनों से जंग, धमकियों, बमबारी और दहशत का साया मंडरा रहा था, वहीं अब एक ऐसा मोड़ सामने आया है जिसने ईरान समेत दुनिया भर के ईमानदार दिलों को राहत, यक़ीन और शुक्र से भर दिया है। 14 दिनों तक हमले रुकने की खबर सिर्फ एक कूटनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि सब्र, इस्तिकामत, इबादत और अल्लाह पर यक़ीन की ऐसी मिसाल बनकर उभरी है जिसने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब बंदा अपने रब पर भरोसा करता है, तो दुनिया की सबसे बड़ी शैतानी ताक़तें भी थक जाती हैं।
ईरान की ओर से आए आधिकारिक बयान और उसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति के दावे ने दुनिया को यह साफ पैगाम दिया कि ईरान को डराकर, झुकाकर या मिटाकर खत्म करने का सपना देखने वाली ताक़तें अपने इरादों में नाकाम रहीं। ईरान ने न सिर्फ अपने सब्र, होश, हिम्मत और हिकमत से हालात को संभाला, बल्कि यह भी दिखा दिया कि हक़ पर डटी हुई कौमें मिसाइलों से नहीं, ईमान से जिंदा रहती हैं।
यह सिर्फ जंग रुकने की खबर नहीं, यह अल्लाह की मदद का एहसास है
जब दुनिया भर में अमेरिका, इज़राइल और उनके साथ खड़ी जुल्म की सियासत ईरान को घेरने की कोशिश कर रही थी, उसी वक्त मस्जिदों, इमामबाड़ों, हुसैनियों, सज्दागाहों और घरों में हाथ उठे हुए थे।
कहीं दुआ-ए-तवस्सुल पढ़ी जा रही थी,
कहीं जियारत-ए-आशूरा,
कहीं आम्न युजीबुल मुज़्तर्र की सदा बुलंद हो रही थी,
और कहीं बूढ़ी आंखों से लेकर नौजवान दिलों तक एक ही पुकार थी:
“ऐ अल्लाह! हक़ की हिफाजत फरमा, मजलूमों को सरफ़राज़ कर, और जालिमों की चालों को नाकाम कर।”
आज जब 14 दिनों के विराम की खबर सामने आई है, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं लगता — बल्कि यह उस दुआ, उस यक़ीन, उस सज्दे और उस सब्र की कबूलियत जैसा महसूस हो रहा है, जिसने मुश्किल हालात के बीच भी दिलों को टूटने नहीं दिया।
ईरान ने दुनिया को बता दिया: सब्र कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी ताक़त है
दुनिया ने देख लिया कि ईरान ने घुटने नहीं टेके।
उसने अपनी इज़्ज़त, अपनी सरज़मीन, अपने उसूल और अपनी गैरत का सौदा नहीं किया।
उसने जुल्म के सामने झुकने के बजाय सब्र और इस्तिकामत का रास्ता चुना।
आज यह साफ नज़र आ रहा है कि शैतान की ताक़तें जितनी तेज़ी से आई थीं, उतनी ही थकावट के साथ पीछे हटती दिखाई दे रही हैं।
क्योंकि शोर, हथियार, मीडिया और सियासी दबाव बहुत दूर तक नहीं चलते —
लेकिन हक़, दुआ, सज्दा और सब्र आख़िरकार अपना असर दिखाते हैं।
ईरान की यह कामयाबी सिर्फ एक देश की कामयाबी नहीं, बल्कि हर उस दिल की जीत है जो जुल्म के खिलाफ धड़कता है, हर उस आंख की जीत है जो मजलूमों के लिए नम होती है, और हर उस सज्दे की जीत है जो सिर्फ अल्लाह के सामने झुकता है।
इमाम-ए-ज़माना के ज़ुहूर की राह: जब ज़मीन जुल्म से भरती है, तो उम्मीद और मजबूत होती है
ईमान रखने वालों के लिए आज के हालात सिर्फ खबरें नहीं हैं — ये निशानियां भी हैं।
जब दुनिया में जुल्म अपने चरम पर पहुंचता है, जब झूठ को ताक़त और सच को सज़ा मिलने लगती है, जब इंसाफ का गला घोंटने वाले खुद को मालिक समझने लगते हैं — तब अहले ईमान के दिलों में इमाम-ए-ज़माना (अज्जलल्लाहु तआला फरजाहुश्शरीफ) के ज़ुहूर की उम्मीद और भी ज्यादा रौशन हो जाती है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि ईरान का सब्र, उसका डटकर खड़ा रहना, उसका हक़ के साथ खड़ा रहना, और उसका जुल्म के सामने न झुकना, उस रूहानी सफर का हिस्सा है जो ज़ुहूर की राहों को खुला हुआ महसूस कराता है।
क्योंकि ज़ुहूर की राह तलवारों से नहीं, सब्र, सफाई-ए-नीयत, सज्दे, इंतिजार और हक़ पर इस्तिकामत से तैयार होती है।
आज बहुत से मोमिनीन यह महसूस कर रहे हैं कि यह सिर्फ जंग का रुकना नहीं, बल्कि एक रूहानी पैगाम है —
कि हक़ अब भी ज़िंदा है,
कि जुल्म का निज़ाम हमेशा के लिए नहीं,
और कि इमाम-ए-वक़्त की नज़र से दुनिया का कोई दर्द ओझल नहीं।
अमेरिका, इज़राइल और जुल्म के साथ खड़ी ताक़तों का रवैया इंसानियत के खिलाफ
इस पूरे संकट ने एक बार फिर दुनिया के सामने यह हकीकत खोल दी है कि अमेरिका और इज़राइल की नीति अमन नहीं, दबदबा और तबाही पर टिकी रही है।
जब ताक़तवर मुल्क अपनी सैन्य हैसियत के घमंड में कमजोरों को डराने, घेरने और कुचलने की सियासत करते हैं, तो यह सिर्फ राजनीति नहीं रहती — यह जालिमाना रवैया बन जाती है।
और अफसोस यह भी है कि कुछ ऐसे मुल्क, जो अपने आपको उम्मत का हमदर्द बताते हैं, वे भी कई बार हक़ की आवाज़ के साथ खड़े होने में साफ़ और बहादुर रुख नहीं अपना पाते।
ऐसे में सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का रवैया भी दुनिया भर के इंसाफपसंद लोगों के बीच सवालों में रहा है।
जो लोग जुल्म के सामने खामोशी, मसलहत या रणनीतिक नज़दीकियां चुनते हैं, वे कम से कम मजलूमों के दिलों में इज़्ज़त नहीं बना पाते।
इतिहास ने हमेशा यह साबित किया है कि जालिम के साथ खड़ा होना, जुल्म का हिस्सा बन जाना है — चाहे वह खुलकर हो या खामोशी से।
शुक्र के सज्दे: ईरान से लेकर दुनिया भर के मोमिनीन तक राहत की लहर
जैसे ही 14 दिनों के विराम की खबर फैली, कई जगहों पर लोगों ने सज्दे-ए-शुक्र अदा किए।
कहीं मस्जिदों में दुआएं हुईं,
कहीं इमामबाड़ों में मातमी और रूहानी फिज़ा के बीच अल्लाह का शुक्र अदा किया गया,
कहीं मांओं ने अपने बच्चों के सिर पर हाथ रखकर दुआ की,
और कहीं बुजुर्गों ने आंसुओं के साथ कहा:
“मौला, तूने अपनी रहमत से हालात बदल दिए।”
यह राहत स्थायी है या अस्थायी — यह आने वाला वक्त बताएगा।
लेकिन फिलहाल जो बात सबसे ज्यादा दिलों को छू रही है, वह यह है कि अल्लाह ने अपने बंदों को यह एहसास फिर दे दिया कि उसके खजाने कभी खाली नहीं होते।
ईरान की जीत सिर्फ मैदान की नहीं, मिज़ाज की भी है
ईरान ने यह साबित कर दिया कि कामयाबी सिर्फ मिसाइलों से नहीं मिलती, बल्कि नीयत, सब्र, इबादत, गैरत और यक़ीन से मिलती है।
आज की यह राहत, यह रुकावट, यह 14 दिनों की मोहलत —
दरअसल जुल्म की थकान और हक़ की स्थिरता का एलान है।
और यही वजह है कि आज बहुत से लोग यह कह रहे हैं:
“ईरान जीता नहीं, बल्कि साबित हुआ है।”
“शैतान थक गया, लेकिन सज्दे वाले नहीं थके।”
“अल्लाह पर यक़ीन रखने वाले हारते नहीं, आज़माए जाते हैं।”
आज का दिन सिर्फ राहत का नहीं, शुक्र, सबक और यक़ीन का दिन है।
यह दिन बता रहा है कि:
- सब्र कभी बेकार नहीं जाता
- दुआ कभी खोती नहीं
- सज्दा कभी खाली नहीं लौटता
- और हक़ कभी मिटता नहीं
आज हर ईमान वाले दिल से यही आवाज़ उठ रही है:
“ऐ अल्लाह! हमें हक़ पर क़ायम रख, जुल्म से बचा, मजलूमों की हिफाजत फरमा, और हमें इमाम-ए-ज़माना के सच्चे इंतिजार करने वालों में शामिल फरमा।”
और शायद यही वह लम्हा है, जहां से इतिहास धीरे-धीरे करवट लेता है।




