मुख्यमंत्री कार्यालय से जांच के आदेश के बाद यूपी शिया वक्फ बोर्ड में हड़कंप, प्रमुख सचिव कार्यालय ने तलब की पत्रावलियां
रिटायरमेंट के बाद प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा को दिए गए सेवा-विस्तार की होगी हाईलेवल जांच, फाइल दबाने और जांच में रोड़ा अटकाने के आरोपों से बढ़ी हलचल
तहलका टुडे टीम
लखनऊ। यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा को रिटायरमेंट के बाद दिए गए सेवा-विस्तार का मामला अब बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने तथा प्रमुख सचिव कार्यालय से संबंधित पत्रावलियां तलब किए जाने के बाद वक्फ बोर्ड में हड़कंप की स्थिति बताई जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजे गए विस्तृत विधिक अभ्यावेदन में आरोप लगाया गया था कि गंभीर आपराधिक मुकदमों में न्यायालय द्वारा Charges Framed होने के बावजूद हसन रज़ा को दिनांक 28 जनवरी 2026 को सेवा-विस्तार प्रदान किया गया। अभ्यावेदन में यह भी सवाल उठाया गया था कि क्या यह निर्णय उत्तर प्रदेश शासन के कार्मिक अनुभाग के शासनादेश दिनांक 28.05.1997 के अनुरूप लिया गया था या नहीं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब प्रमुख सचिव स्तर से संबंधित फाइलें, अनुमोदन, नोटिंग, बोर्ड प्रस्ताव और अन्य प्रशासनिक पत्रावलियां तलब किए जाने की चर्चा तेज हो गई है। इसी के साथ बोर्ड के भीतर जांच को लेकर बेचैनी और असहजता बढ़ने की खबरें भी सामने आ रही हैं।
फाइल दबाने और जांच प्रभावित करने के आरोप
मामले ने नया मोड़ तब लिया जब यह आरोप सामने आए कि वक्फ बोर्ड के भीतर कुछ स्तरों पर जांच को धीमा करने, संबंधित फाइलों को आगे बढ़ाने में देरी करने तथा आवश्यक पत्रावलियों को उपलब्ध कराने में टालमटोल की कोशिशें की जा रही हैं।
हालांकि इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि जांच प्रक्रिया को “रूटीन प्रशासनिक प्रक्रिया” बताकर हल्का दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष रूप से हुई तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
जांच के दायरे में कई अहम सवाल
सूत्रों के मुताबिक, जांच में निम्न प्रमुख बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है—
- सेवा-विस्तार आदेश की वैधानिकता
- शासनादेशों का पालन हुआ या नहीं
- क्या बोर्ड स्तर पर विधिवत प्रस्ताव पारित किया गया
- क्या शासन से अनुमति ली गई
- क्या लंबित मुकदमों और Charges Framed की स्थिति सक्षम प्राधिकारी को बताई गई
- क्या 31 जनवरी 2026 के बाद की गई नोटिंग और प्रशासनिक कार्यवाहियां वैध हैं
- क्या किसी स्तर पर तथ्य छिपाने या फाइल प्रभावित करने की कोशिश हुई
गंभीर मुकदमों का भी उठ रहा मुद्दा
हसन रज़ा के विरुद्ध लंबित आपराधिक मुकदमों का मुद्दा भी चर्चा के केंद्र में है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार उनके खिलाफ—
- सत्र वाद सं० 1322/2020
- तथा दाण्डिक याद सं० 5088/12
जैसे प्रकरण विचाराधीन बताए जा रहे हैं, जिनमें न्यायालय द्वारा आरोप विरचित (Charges Framed) किए जाने की बात कही जा रही है।
इसी आधार पर सवाल उठ रहे हैं कि ऐसे अधिकारी को सेवा-विस्तार देने का आधार क्या था और क्या यह निर्णय “लोकहित” की कसौटी पर उचित था।
वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी उठे सवाल
पूरा मामला अब केवल एक अधिकारी के सेवा-विस्तार तक सीमित नहीं रह गया है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यह विवाद वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया की व्यापक समीक्षा का कारण बन सकता है।
कई लोगों का मानना है कि यदि जांच निष्पक्ष और गहराई से हुई तो बोर्ड की आंतरिक प्रक्रिया, फाइल संचालन और प्रशासनिक अनुमोदनों से जुड़े कई पहलुओं पर भी सवाल उठ सकते हैं।
“नियम सबके लिए समान” का संदेश देने की तैयारी?
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि इस मामले में कठोर कार्रवाई होती है तो इसे सरकार की “Zero Tolerance” नीति के बड़े उदाहरण के रूप में देखा जाएगा। वहीं यदि जांच लंबी खिंचती है या फाइल स्तर पर अड़चनें जारी रहती हैं, तो विपक्ष और सामाजिक संगठनों को सरकार पर सवाल उठाने का मौका मिल सकता है।
फिलहाल निगाहें मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रमुख सचिव स्तर पर चल रही प्रक्रिया पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह मामला और अधिक तूल पकड़ सकता है।




