लखनऊ/बरेली | तहलका टुडे टीम
उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड एक बार फिर गंभीर आरोपों और विवादों के केंद्र में आ गया है। बरेली स्थित वक्फ नवाब मोहम्मद हुसैन खां की बैंक में वर्षों से जमा करोड़ों रुपये की रकम के कथित बंदरबांट का मामला अब बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन चुका है। आरोप है कि बोर्ड के चार्जशीटेड प्रशासनिक अधिकारी सैयद हसन रज़ा रिजवी, चेयरमैन अली जैदी और विवादित मुतवल्ली जमीर रज़ा ने मिलकर शासनादेशों और वक्फ कानून को ताक पर रखकर करीब 2 करोड़ रुपये से अधिक की रकम के संचालन और निकासी में गंभीर अनियमितताएं कीं।
मामले की शिकायत मुख्यमंत्री, डीजीपी, वक्फ मंत्री, प्रमुख सचिव अल्पसंख्यक कल्याण, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर समेत कई उच्च अधिकारियों को भेजी गई है। शिकायत के बाद वक्फ बोर्ड और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है।
पूरा मामला वक्फ नवाब मोहम्मद हुसैन खां, पंजीयन संख्या 1-1111, 1112, 1115, बरेली से जुड़ा है। आरोप है कि इस वक्फ के खाते में वर्षों से अमानत के तौर पर जमा करोड़ों रुपये की रकम को सुनियोजित तरीके से नियंत्रण में लेकर बाद में कथित रूप से उसका बंदरबांट कर लिया गया।
शासनादेश में साफ था आदेश, फिर कैसे जारी हुआ विवादित पत्र?
इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू उत्तर प्रदेश शासन का वह स्पष्ट शासनादेश है, जिसे अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ अनुभाग-2 द्वारा जारी किया गया था। शासनादेश में वक्फ अधिनियम 1995 की धारा-26 का हवाला देते हुए साफ कहा गया था कि वक्फ बोर्ड के आदेशों और संकल्पों को लागू कराने तथा उनसे संबंधित आदेशों पर हस्ताक्षर करने का अधिकार केवल मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) को होगा।
शासन ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि अध्यक्ष, सदस्य, सहायक सचिव, प्रशासनिक अधिकारी या अन्य कोई पदाधिकारी बोर्ड के आदेशों से संबंधित निर्देश जारी नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, शासनादेश में ऐसे अनधिकृत आदेश जारी करने वालों के खिलाफ एफआईआर और विभागीय कार्रवाई तक सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बावजूद 29 दिसंबर 2023 को शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी सैयद हसन रज़ा रिजवी द्वारा भारतीय स्टेट बैंक, मुख्य शाखा बरेली को एक विवादित पत्र जारी किया गया।
विवादित पत्र बना पूरे खेल की जड़
पत्र में वक्फ नवाब मोहम्मद हुसैन खां के बैंक खाते संख्या 10897677690 के संचालन का अधिकार मुतवल्ली जमीर रज़ा को दिए जाने की बात कही गई। पत्र में उल्लेख किया गया कि बोर्ड के विधि सलाहकार के अनुसार उक्त वक्फ मामले में किसी न्यायालय का कोई स्थगन आदेश प्रभावी नहीं है, इसलिए खाते का संचालन पुनः जमीर रज़ा द्वारा कराया जाए।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी को ऐसा पत्र जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था और यह शासनादेश की खुली अवहेलना थी।

“सुनियोजित तरीके से करोड़ों की रकम पर कब्जे का खेल”
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यह पूरा मामला एक सुनियोजित वित्तीय खेल का हिस्सा था, जिसके तहत वर्षों से जमा करोड़ों रुपये की रकम पर नियंत्रण स्थापित किया गया। आरोप है कि खाते के संचालन का रास्ता साफ कराने के बाद करीब 2 करोड़ रुपये से अधिक की रकम कथित रूप से निकाल ली गई और बाद में उसका बंदरबांट किया गया।
इस पूरे मामले में चेयरमैन अली जैदी, प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा रिजवी और मुतवल्ली जमीर रज़ा की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
चार्जशीटेड अधिकारी को मिला “विवादित सेवा विस्तार”?
मामला उस समय और ज्यादा गंभीर हो गया जब शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा पहले से चार्जशीटेड थे और उनका कार्यकाल समाप्त हो चुका था, लेकिन शासन, बोर्ड और सक्षम प्राधिकारी की विधिक अनुमति के बिना ही उनका कार्यकाल एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
इस कथित अवैध सेवा विस्तार की शिकायत मुख्यमंत्री, वक्फ मंत्री और प्रमुख सचिव तक पहुंच चुकी है, जिस पर जांच चलने की बात कही जा रही है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब किसी अधिकारी पर पहले से गंभीर आरोप और चार्जशीट लंबित थी, तब उसे सेवा विस्तार देना अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करता है। आरोप यह भी है कि इसी विवादित कार्यकाल के दौरान कई संवेदनशील वित्तीय फैसले लिए गए और नियमों की अनदेखी हुई।
जांच हुई तो खुल सकते हैं कई बड़े राज
वक्फ मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हुई तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें पद के दुरुपयोग, शासनादेश की अवहेलना, सरकारी व्यवस्था को गुमराह करने, आपराधिक षड्यंत्र और वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग जैसी गंभीर बातें भी सामने आ सकती हैं।
अब निगाहें शासन और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या करोड़ों रुपये के इस कथित खेल की निष्पक्ष जांच होगी या मामला प्रभावशाली लोगों के दबाव में दबा दिया जाएगा। वक्फ संपत्तियों की पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर उठे इस विवाद ने उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।




