Tahalka Today/Syed Rizwan Mustafa
लखनऊ सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि तहज़ीब, अदब, इल्म और रूहानियत का एक ऐसा कारवां है, जिसने सदियों से बड़ी-बड़ी शख़्सियतों को अपने दामन में जगह दी है। इसी तहज़ीबी राजधानी के दिल में मौजूद शाह-ए-नजफ़ इमामबाड़ा की एक पुरसुकून शाम उस वक़्त यादगार बन गई, जब एक तस्वीर में मुल्क की प्रशासनिक, इल्मी और दीनी दुनिया की अहम शख़्सियतें एक साथ नज़र आईं।
एक तरफ़ मुल्क की प्रशासनिक दुनिया का रोशन सितारा, अपनी इमानदारी और शानदार ख़िदमात के लिए मशहूर बुज़ुर्ग आईएएस एस. ए. टी. रिज़वी साहब मौजूद थे। दूसरी तरफ़ भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी आफ़ताब-ए-शरीअत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी साहब, साथ में इल्मी दुनिया का बड़ा नाम प्रोफ़ेसर कामिल रिज़वी साहब, और समाजी ख़िदमात में हमेशा आगे रहने वाले अम्बर फ़ाउंडेशन के चेयरमैन वफ़ा अब्बास भी मौजूद थे।
वह तस्वीर महज़ एक तस्वीर नहीं थी, बल्कि इल्म, अख़लाक़, ईमानदारी, समाजी ख़िदमत और रूहानियत की एक मुकम्मल तस्वीर थी।
लेकिन उस तस्वीर के बीच मौजूद एक चेहरा ऐसा था, जिसकी पूरी ज़िंदगी अपने आप में एक किताब है — एस. ए. टी. रिज़वी साहब।
इल्म की दुनिया से प्रशासनिक इतिहास तक का सफ़र
30 दिसंबर 1940 को पैदा हुए श्री एस. ए. टी. रिज़वी शुरू से ही ज़ेहानत के मालिक रहे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी और बीएससी (ऑनर्स) प्रथम श्रेणी में हासिल की। इसके बाद गणितीय विज्ञान (Mathematical Sciences) में मास्टर्स की डिग्री हासिल करते हुए फ़र्स्ट क्लास फ़र्स्ट आए।
इल्म से उनकी मोहब्बत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें अपनी शानदार अकादमिक कामयाबी पर तीन गोल्ड मेडल हासिल हुए।
उन्होंने पढ़ाई के बाद अध्यापन और रिसर्च को चुना। लखनऊ विश्वविद्यालय में लेक्चरर के तौर पर सेवाएं दीं। मैग्नेटो-हाइड्रोडायनामिक्स जैसे मुश्किल विषय पर उनके दो रिसर्च पेपर दुनिया की प्रतिष्ठित इंटरनेशनल जर्नल्स में प्रकाशित हुए — एक अमेरिका में और दूसरा हॉलैंड में। उस दौर में यह किसी भारतीय नौजवान शोधकर्ता के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी।
वह मुक़ाम जहां इतिहास बना
साल 1964।
देश की सबसे कठिन परीक्षा मानी जाने वाली UPSC की परीक्षा में एस. ए. टी. रिज़वी साहब ने इतिहास रच दिया।
वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में ऑल इंडिया प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पहले मुस्लिम अधिकारी बने।
इससे पहले वह उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (PCS) परीक्षा में भी प्रथम स्थान हासिल कर चुके थे और वहां भी यह मुक़ाम हासिल करने वाले पहले मुस्लिम बने।
यह केवल व्यक्तिगत कामयाबी नहीं थी, बल्कि देश की नई पीढ़ी के लिए एक संदेश था कि मेहनत, इल्म और लगन किसी भी दीवार को गिरा सकती है।
सबसे कठिन ज़िलों में शानदार प्रशासन
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और संवेदनशील राज्य में उन्हें सबसे चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारियां मिलीं।
उन्होंने इलाहाबाद (प्रयागराज), गोरखपुर और बांदा जैसे कठिन ज़िलों में जिलाधिकारी (DM) के तौर पर काम किया।
इलाहाबाद उस दौर में देश का सबसे संवेदनशील और प्रतिष्ठित ज़िला माना जाता था।
एस. ए. टी. रिज़वी साहब आज भी इतिहास में इलाहाबाद के इकलौते मुस्लिम जिलाधिकारी के तौर पर याद किए जाते हैं।
गोरखपुर जैसे बड़े और सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील ज़िले में भी उन्होंने शानदार प्रशासनिक क्षमता दिखाई।
बांदा जैसे अपराध और सामंती प्रभाव वाले क्षेत्र में उन्होंने कानून व्यवस्था को मज़बूत किया।
1980 के दंगे और एक इमानदार अफ़सर की परीक्षा
1980 में मुरादाबाद दंगों के बाद पूरे प्रदेश में तनाव का माहौल था।
इलाहाबाद में भी सांप्रदायिक तनाव बढ़ा।
ऐसे मुश्किल वक़्त में एस. ए. टी. रिज़वी साहब ने जिस तेज़ी, इन्साफ़ और बहादुरी के साथ हालात को संभाला, वह आज भी प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थानों में मिसाल की तरह देखा जाता है।
उन्होंने एक घंटे के भीतर हालात पर नियंत्रण पाया।
जान-माल का नुकसान न्यूनतम रहा।
हर तबक़े ने उनकी निष्पक्षता की सराहना की।
मुरादाबाद में शांति की मिसाल
उनकी प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए सरकार ने उन्हें मुरादाबाद मंडल का आयुक्त बनाया।
ख़ुफ़िया रिपोर्टें बड़े पैमाने पर हिंसा की आशंका जता रही थीं।
लेकिन एस. ए. टी. रिज़वी साहब की रणनीति, मज़बूत प्रशासनिक पकड़ और निष्पक्ष रवैये ने हालात बदल दिए।
होली का त्योहार पूरी अमन-ओ-अमान के साथ सम्पन्न हुआ।
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी तक उनकी कार्यशैली की चर्चा पहुंची।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व
उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (UPSIDC) में शानदार सेवाओं के बाद भारत सरकार ने उन्हें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भारतीय निवेश केंद्र का पहला क्षेत्रीय निदेशक बनाया।
उन्हें राजनयिक पासपोर्ट मिला।
दूतावास में मंत्री स्तर का दर्जा दिया गया।
अबू धाबी मुख्यालय से उन्होंने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र में भारत के आर्थिक संबंधों को मज़बूत किया।
केंद्र और राज्य सरकार में ऊंचे ओहदों पर शानदार भूमिका
उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में —
- प्रमुख सचिव (वित्त)
- संस्थागत वित्त विभाग
- जल संसाधन विभाग
- वाणिज्यिक कर विभाग
- नागरिक उड्डयन
- सतर्कता विभाग
जैसे महत्वपूर्ण विभागों का नेतृत्व किया।
उन्होंने तीन मुख्यमंत्रियों के सचिव के रूप में भी सेवाएं दीं।
भारत सरकार में अहम जिम्मेदारियां
उन्होंने केंद्र सरकार में —
- कृषि मंत्रालय
- उद्योग मंत्रालय
- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग
- संसदीय कार्य मंत्रालय
जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में सचिव स्तर तक कार्य किया।
संसदीय मामलों की गहरी समझ के कारण उन्हें संवेदनशील मामलों की समीक्षा समितियों का नेतृत्व भी दिया गया।
सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रही सेवा
रिटायरमेंट के बाद उन्हें केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) में सदस्य बनाया गया।
उन्होंने एक हज़ार से अधिक फैसले लिखे।
बताया जाता है कि उनके किसी भी फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने पलटा नहीं।
उत्तर प्रदेश राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष
उन्हें उत्तर प्रदेश के तृतीय राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।
उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों के लिए व्यापक सुधारों की सिफ़ारिश की।
इमानदारी — उनकी पहचान
आज जब समाज में भ्रष्टाचार, समझौते और व्यक्तिगत लाभ की चर्चा आम है, एस. ए. टी. रिज़वी साहब एक ऐसे नाम हैं जिन्हें लोग ईमानदारी, सादगी, इंसाफ़ और ख़ुलूस की मिसाल मानते हैं।
उनकी शख़्सियत बताती है —
“ओहदे इंसान को बड़ा नहीं बनाते, इंसान अपने किरदार से ओहदों को बड़ा बना देता है।”
शाह-ए-नजफ़ की वह तस्वीर क्यों खास थी?
क्योंकि उस तस्वीर में सिर्फ़ लोग नहीं थे।
वहां एक तरफ़ दीन था।
एक तरफ़ इल्म था।
एक तरफ़ समाजी ख़िदमत थी।
और बीच में खड़ा था — ईमानदारी का एक ऐसा चेहरा, जिसे वक़्त भी झुका नहीं पाया।
एस. ए. टी. रिज़वी साहब केवल एक रिटायर्ड IAS अफ़सर नहीं।
वह एक दौर हैं।
एक सोच हैं।
एक उसूल हैं।
और आने वाली नस्लों के लिए यह पैग़ाम हैं —
“इल्म हासिल करो, मेहनत करो, ईमानदारी बचाए रखो — कामयाबी खुद रास्ता तलाश लेगी।”




