भाजपा का मुस्लिम मिशन: बासित अली और तारिक मंसूर पर बड़ा दांव, 2027 में क्या निकलेगा नतीजा? ‘कुंवर–प्रोफेसर’ की जोड़ी से पसमांदा समाज तक पहुंच बनाने की कोशिश? असली सवाल—क्या भाजपा के ये दो चेहरे वोट से पहले भरोसा जीत पाएंगे?

भाजपा के बासित अली और प्रो. डॉ. तारिक मंसूर को मिली महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के बीच बड़ा सवाल—क्या पसमांदा मुस्लिम समाज तक पहुंच की रणनीति 2027 यूपी चुनाव में भाजपा के लिए असरदार साबित होगी?

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सैयद रिज़वान मुस्तफा /तहलका टुडे टीम 

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क्या भाजपा पसमांदा मुसलमानों के बीच अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहती है?क्या बासित अली और तारिक मंसूर उस जमीन पर भरोसे की फसल उगा पाएंगे?भाजपा ने दो अलग रास्तों को एक जगह क्यों ला दिया?बासित अली के सामने पहला सवाल: ‘कुंवर’ से आगे कितनी जमीन?सवाल सीधा है—बुनकर पूछेगा—मेरे करघे का क्या होगा?पसमांदा की राजनीति है या पसमांदा के नाम की राजनीति?तारिक मंसूर: एएमयू का कद, अब राजनीति की कसौटीपसमांदा पहचान और पसमांदा नेतृत्व—दो अलग बातेंक्या वे इन दोनों नेताओं को अपना स्वतंत्र प्रतिनिधि मानते हैं या भाजपा के मुस्लिम चेहरे के रूप में देखते हैं?कुरैशी समाज: चमड़े के कारोबार से जुड़े परिवार क्या चाहते हैं?पसमांदा को नारा नहीं, आर्थिक रास्ता चाहिए।शिक्षा का सवाल: मदरसा हो या आधुनिक स्कूल, भविष्य बच्चे का हैपसमांदा बच्चे के भविष्य के लिए जमीन पर बदला क्या?वक्फ: यहां चुप्पी भी सवाल बन जाती हैबासित अली से सवाल:तारिक मंसूर से सवाल:मुस्लिम धार्मिक संस्थानों में कितनी स्वीकार्यता?क्या बासित अली और तारिक मंसूर भाजपा और मुस्लिम समाज के बीच वास्तविक संवाद का पुल बन पाएंगे?भाजपा के पुराने मुस्लिम कार्यकर्ताओं की बेचैनी भी समझनी होगी“राष्ट्रीय राजनीति में हमारी बारी कब आएगी?”2027: फैसला सिर्फ वोट का नहीं, भरोसे का होगाक्या भाजपा के प्रति मुस्लिम समाज में भरोसा बढ़ा?अब ‘फोटो’ नहीं, ‘परफॉर्मेंस’ का समय“हमारे लिए किया क्या?”क्या वे भाजपा के मुस्लिम चेहरे बनेंगे या मुस्लिम समाज की आवाज भी बनेंगे?क्या पसमांदा समाज उन्हें अपना प्रतिनिधि मानेगा या सिर्फ भाजपा का प्रतिनिधि?क्या 2027 तक यह प्रयोग जमीन पर दिखाई देगा या सिर्फ राजनीतिक रणनीति के दस्तावेजों में?भाजपा ने दांव चल दिया है—अब देखना यह है कि यह दांव पसमांदा समाज के दिल तक पहुंचता है या सिर्फ चुनावी गणित तक।

नई दिल्ली/लखनऊ।उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी सामने है, लेकिन उसकी बिसात पर मोहरे सजने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने मुस्लिम समाज में अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की रणनीति के तहत कुंवर बासित अली और प्रो. डॉ. तारिक मंसूर जैसे दो अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले मुस्लिम चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर एक बड़ा राजनीतिक संकेत दिया है।

एक तरफ संगठन और अल्पसंख्यक राजनीति से निकले बासित अली हैं, तो दूसरी तरफ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और शिक्षाविद प्रो. डॉ. तारिक मंसूर

भाजपा के लिए यह महज दो नेताओं को पद देने का मामला नहीं है।

इसके पीछे बड़ा सवाल है—

क्या भाजपा पसमांदा मुसलमानों के बीच अपनी नई राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहती है?

और उससे भी बड़ा सवाल—

क्या बासित अली और तारिक मंसूर उस जमीन पर भरोसे की फसल उगा पाएंगे?

क्योंकि चुनाव में चेहरा दिखाना आसान है, लेकिन समाज को यह विश्वास दिलाना कठिन है कि “आपकी आवाज अब सत्ता तक पहुंचेगी।”

भाजपा ने दो अलग रास्तों को एक जगह क्यों ला दिया?

भाजपा की मुस्लिम राजनीति को लंबे समय से लेकर यह बहस चलती रही है कि पार्टी का मुस्लिम समाज में आधार सीमित है, जबकि पार्टी पसमांदा मुसलमानों को अलग सामाजिक समूह के रूप में राजनीतिक संवाद में लाने की कोशिश करती रही है।

ऐसे समय में बासित अली और तारिक मंसूर की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

बासित अली संगठनात्मक राजनीति का चेहरा हैं।

तारिक मंसूर शिक्षा, चिकित्सा और एएमयू जैसी प्रतिष्ठित संस्था से निकली पहचान रखते हैं।

यानी एक तरफ संगठन, दूसरी तरफ शिक्षा और संस्थागत प्रतिष्ठा

भाजपा के लिए यह संयोजन कितना कारगर होगा, इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा।

लेकिन सवाल अभी से उठ रहा है—

क्या राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल पद से तय होगा या समाज की स्वीकार्यता से?

बासित अली के सामने पहला सवाल: ‘कुंवर’ से आगे कितनी जमीन?

बासित अली की पहचान भाजपा की अल्पसंख्यक राजनीति में नई नहीं है। वे लंबे समय से पार्टी के मुस्लिम संपर्क अभियानों और संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।

लेकिन उनके नाम के साथ इस्तेमाल होने वाला ‘कुंवर’ संबोधन राजनीतिक चर्चा को एक अलग दिशा देता है।

यह किसी व्यक्ति की योग्यता पर सवाल नहीं है।

मुद्दा राजनीतिक संदेश का है।

जब भाजपा पसमांदा समाज के गरीब, पिछड़े, दस्तकार, बुनकर, छोटे कारोबारी और वंचित तबकों को राजनीतिक भागीदारी देने की बात करती है, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि पार्टी जिन चेहरों को आगे करती है, उनकी पहचान समाज के सामने किस तरह का संदेश छोड़ती है।

लोकतंत्र में न राजा है, न प्रजा।

इसलिए बासित अली की असली पहचान अब उनके नाम के आगे लगे संबोधन से नहीं, बल्कि जमीनी काम से तय होगी।

सवाल सीधा है—

क्या बासित अली पसमांदा समाज के सवालों को भाजपा तक ले जाएंगे या भाजपा की बात पसमांदा समाज तक पहुंचाएंगे?

दोनों भूमिकाओं में जमीन-आसमान का फर्क है।

बुनकर पूछेगा—मेरे करघे का क्या होगा?

पसमांदा राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बुनकर समाज के बीच हो सकती है।

अंसारी और दूसरे बुनकर परिवारों के लिए राजनीति का मतलब केवल सम्मेलन और भाषण नहीं है।

उनके लिए राजनीति का मतलब है—

बिजली कितनी महंगी है?

करघा कितना चल रहा है?

कच्चा माल कहां से आएगा?

माल बिकेगा कहां?

बैंक ऋण मिलेगा या नहीं?

सरकारी खरीद में जगह मिलेगी या नहीं?

बच्चों को इस पेशे के अलावा कोई बेहतर भविष्य मिलेगा या नहीं?

अगर बासित अली और तारिक मंसूर इन सवालों को राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे तक पहुंचा पाते हैं, तभी पसमांदा राजनीति का नारा जमीन पर दिखाई देगा।

वरना सवाल उठता रहेगा—

पसमांदा की राजनीति है या पसमांदा के नाम की राजनीति?

तारिक मंसूर: एएमयू का कद, अब राजनीति की कसौटी

प्रो. डॉ. तारिक मंसूर की पहचान बासित अली से बिल्कुल अलग है।

चिकित्सा क्षेत्र, शिक्षा, प्रशासन और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ी उनकी लंबी पृष्ठभूमि उन्हें मुस्लिम समाज के शिक्षित वर्ग में एक अलग पहचान देती है।

एएमयू के कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

लेकिन राजनीति का मैदान विश्वविद्यालय के परिसर से अलग होता है।

यहां आंकड़े नहीं, आम आदमी का अनुभव ज्यादा मायने रखता है।

एक गरीब परिवार पूछेगा—

मेरे बच्चे को शिक्षा मिली?

उसे नौकरी मिली?

उसे छात्रवृत्ति मिली?

उसे इलाज मिला?

उसके कारोबार को मदद मिली?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या उसकी सामाजिक स्थिति बदली?

यहीं तारिक मंसूर की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा शुरू होती है।

पसमांदा पहचान और पसमांदा नेतृत्व—दो अलग बातें

किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि उसे पसमांदा समाज से जोड़ सकती है।

लेकिन क्या वही पहचान उसे पूरे पसमांदा समाज का नेता बना देती है?

जरूरी नहीं।

नेतृत्व केवल पहचान से नहीं बनता।

नेतृत्व बनता है—

संघर्ष से।

लगातार संवाद से।

समाज के बीच मौजूदगी से।

समस्या उठाने से।

और समाधान कराने से।

अंसारी, कुरैशी, धोबी, नाई, मनिहार, दर्जी, लोहार, बुनकर और दूसरे पिछड़े मुस्लिम समुदायों के सामने यही सवाल है—

क्या वे इन दोनों नेताओं को अपना स्वतंत्र प्रतिनिधि मानते हैं या भाजपा के मुस्लिम चेहरे के रूप में देखते हैं?

इसका फैसला किसी पार्टी कार्यालय में नहीं होगा।

इसका फैसला समाज करेगा।

कुरैशी समाज: चमड़े के कारोबार से जुड़े परिवार क्या चाहते हैं?

कुरैशी समाज की बड़ी आबादी का एक हिस्सा चमड़ा कारोबार और उससे जुड़े रोजगार से जुड़ा रहा है।

आज सवाल सिर्फ कारोबार का नहीं है।

सवाल है—

क्या आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक के साथ चमड़ा उद्योग को फिर मजबूत किया जा सकता है?

क्या छोटे कारोबारियों को पूंजी मिलेगी?

क्या आधुनिक टेनरी और प्रोसेसिंग यूनिट विकसित होंगी?

क्या रोजगार बचाते हुए पर्यावरणीय नियमों का पालन कराया जा सकता है?

अगर इसका जवाब नीति के रूप में सामने आता है, तो पसमांदा राजनीति को ठोस आर्थिक आधार मिल सकता है।

सिर्फ मंच से यह कहना कि “हम पसमांदा के साथ हैं”—पर्याप्त नहीं होगा।

पसमांदा को नारा नहीं, आर्थिक रास्ता चाहिए।

शिक्षा का सवाल: मदरसा हो या आधुनिक स्कूल, भविष्य बच्चे का है

मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी चिंताओं में शिक्षा आज भी शामिल है।

मदरसा हो या आधुनिक विद्यालय, गरीब बच्चे के सामने सवाल एक ही है—

क्या मुझे ऐसा ज्ञान मिलेगा जिससे मैं सम्मानजनक रोजगार हासिल कर सकूं?

छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, कौशल विकास और रोजगार—इन मुद्दों पर यदि भाजपा के मुस्लिम नेता ठोस पहल करते हैं तो उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है।

लेकिन अगर शिक्षा केवल भाषण का विषय रही तो सवाल वहीं रहेगा—

पसमांदा बच्चे के भविष्य के लिए जमीन पर बदला क्या?

वक्फ: यहां चुप्पी भी सवाल बन जाती है

उत्तर प्रदेश में वक्फ संपत्तियों को लेकर विवाद, मुकदमे, अतिक्रमण और प्रबंधन से जुड़े सवाल लंबे समय से उठते रहे हैं।

वक्फ का मुद्दा मुस्लिम समाज के लिए भावनात्मक होने के साथ-साथ आर्थिक और संस्थागत महत्व भी रखता है।

यही कारण है कि बासित अली और तारिक मंसूर से इस मुद्दे पर भी सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है।

बासित अली से सवाल:

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चे की जिम्मेदारी संभालते हुए वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, पारदर्शिता और बेहतर प्रबंधन को लेकर उनका क्या दृष्टिकोण होगा?

तारिक मंसूर से सवाल:

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य के रूप में वे वक्फ से जुड़े जनहित के सवालों को कितनी मजबूती से उठाएंगे?

हर आरोप को सच मान लेना उचित नहीं।

हर विवाद को राजनीतिक नारा बना देना भी उचित नहीं।

लेकिन जहां गंभीर सवाल हैं, वहां पारदर्शी जांच और जवाबदेही की मांग जरूर होनी चाहिए।

मुस्लिम धार्मिक संस्थानों में कितनी स्वीकार्यता?

भाजपा के भीतर राष्ट्रीय पद मिलना निश्चित रूप से राजनीतिक उपलब्धि है।

लेकिन क्या इससे मुस्लिम समाज के सभी वर्गों में स्वीकार्यता भी मिल जाती है?

नहीं।

मुस्लिम समाज में उलेमा हैं, धार्मिक संस्थाएं हैं, मदरसे हैं, सामाजिक संगठन हैं, कारोबारी वर्ग है, युवा हैं और अलग-अलग बिरादरियां हैं।

हर वर्ग की अपनी सोच और अपनी प्राथमिकताएं हैं।

इसलिए असली चुनौती है—

क्या बासित अली और तारिक मंसूर भाजपा और मुस्लिम समाज के बीच वास्तविक संवाद का पुल बन पाएंगे?

अगर हां, तो यह भाजपा के लिए भी बड़ा राजनीतिक बदलाव होगा।

अगर नहीं, तो दोनों नेता पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण पदों तक सीमित रह सकते हैं।

भाजपा के पुराने मुस्लिम कार्यकर्ताओं की बेचैनी भी समझनी होगी

इस कहानी का एक और पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भाजपा में ऐसे मुस्लिम कार्यकर्ता भी हैं जिन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए बूथ स्तर पर काम किया है।

चुनाव लड़े।

प्रचार किया।

संगठन खड़ा किया।

मुश्किल समय में पार्टी के साथ खड़े रहे।

उनका सवाल भी जायज है—

“राष्ट्रीय राजनीति में हमारी बारी कब आएगी?”

अगर भाजपा मुस्लिम समाज में स्थायी राजनीतिक आधार बनाना चाहती है तो उसे सिर्फ बड़े चेहरों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी मुस्लिम कार्यकर्ताओं को भी आगे लाना होगा।

चेहरा ऊपर से बनाया जा सकता है, लेकिन संगठन नीचे से बनता है।

2027: फैसला सिर्फ वोट का नहीं, भरोसे का होगा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 इस पूरी रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है।

लेकिन परीक्षा केवल वोट प्रतिशत की नहीं होगी।

इससे पहले समाज पूछेगा—

क्या रोजगार बढ़ा?

क्या शिक्षा के अवसर बढ़े?

क्या छोटे कारोबार को राहत मिली?

क्या बुनकरों की हालत सुधरी?

क्या युवाओं के लिए अवसर बढ़े?

क्या वक्फ के सवालों पर पारदर्शिता आई?

क्या पुराने मुस्लिम कार्यकर्ताओं को प्रतिनिधित्व मिला?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या भाजपा के प्रति मुस्लिम समाज में भरोसा बढ़ा?

यही सवाल 2027 के राजनीतिक समीकरण को प्रभावित कर सकता है।

अब ‘फोटो’ नहीं, ‘परफॉर्मेंस’ का समय

बासित अली और तारिक मंसूर दोनों को भाजपा ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है।

अब तस्वीरें होंगी।

बैठकें होंगी।

सम्मेलन होंगे।

मुस्लिम समाज से संवाद होगा।

लेकिन इन सबके बाद जनता एक ही सवाल पूछेगी—

“हमारे लिए किया क्या?”

यही वह सवाल है जिससे कोई भी राजनीतिक चेहरा बच नहीं सकता।

बासित अली के लिए चुनौती है कि वे भाजपा के मुस्लिम संपर्क अभियान को जमीनी सामाजिक मुद्दों से जोड़ें।

तारिक मंसूर के लिए चुनौती है कि वे अपनी शैक्षणिक और संस्थागत पहचान को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास के ठोस एजेंडे में बदलें।

 

भाजपा ने दो मुस्लिम चेहरों को बड़ी जिम्मेदारी देकर अपना संदेश दे दिया है।

अब बारी समाज की है।

और उससे भी पहले बारी बासित अली और तारिक मंसूर की है।

क्या वे भाजपा के मुस्लिम चेहरे बनेंगे या मुस्लिम समाज की आवाज भी बनेंगे?

क्या पसमांदा समाज उन्हें अपना प्रतिनिधि मानेगा या सिर्फ भाजपा का प्रतिनिधि?

क्या 2027 तक यह प्रयोग जमीन पर दिखाई देगा या सिर्फ राजनीतिक रणनीति के दस्तावेजों में?

इन सवालों का जवाब भाषणों से नहीं मिलेगा।

जवाब काम देगा।

जवाब जमीन देगी।

जवाब पसमांदा समाज देगा।

क्योंकि अब मुस्लिम समाज को केवल चेहरे नहीं चाहिए।

उसे चाहिए—

शिक्षा।

रोजगार।

कारोबार।

स्वास्थ्य।

न्याय।

सम्मान।

और वास्तविक राजनीतिक भागीदारी।

भाजपा ने दांव चल दिया है—अब देखना यह है कि यह दांव पसमांदा समाज के दिल तक पहुंचता है या सिर्फ चुनावी गणित तक।

 

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