Tahalka Today Team
लखनऊ, 2 अक्टूबर। शाही आसफ़ी मस्जिद, लखनऊ में शुक्रवार को नमाज़-ए-जुमा हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी, प्रिंसिपल हौज़ा-ए-इल्मिया ग़ुफ़रान मआब, की इमामत में अदा की गई। जुमा के ख़ुतबे में उन्होंने तौहीद और मारफ़त-ए-इलाही से लेकर पारिवारिक व्यवस्था, बढ़ती तलाक़ की घटनाओं, शादी-ब्याह की फ़िज़ूल रस्मों, गांधी जयंती और मध्य-पूर्व के हालात तक विभिन्न सामाजिक और धार्मिक विषयों पर विस्तार से विचार रखे।
कायनात में छिपी निशानियों पर ग़ौर करने की दावत
पहले ख़ुतबे में मौलाना रज़ा हैदर ज़ैदी ने “तौहीद-ए-मुफ़ज़्ज़ल : ग़फ़लत-ए-फ़िक्री से मारफ़त-ए-इलाही तक” के विषय पर तक़रीर की। उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) और मुफ़ज़्ज़ल बिन उमर के मशहूर वाक़ए का ज़िक्र करते हुए कहा कि इंसान को महज़ बहस और तर्क में उलझने के बजाय कायनात और अपने वजूद में मौजूद अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर करना चाहिए।
उन्होंने क़ुरआन की उन आयतों की ओर भी तवज्जो दिलाई जिनमें इंसान को ऊँट, आसमान, पहाड़ और ज़मीन की पैदाइश में विचार करने की दावत दी गई है।
मौलाना ने कहा कि क़ुरआन-ए-मजीद अल्लाह की तशरीई किताब है, जबकि कायनात उसकी तकवीनी किताब है। क़ुरआन इंसान को हिदायत का रास्ता दिखाता है और कायनात की निशानियां अल्लाह की क़ुदरत, हिकमत और तदबीर की तरफ़ मुतवज्जो करती हैं।
उन्होंने तौहीद-ए-मुफ़ज़्ज़ल को मारफ़त और इल्मी तरबियत का अहम ज़रिया बताते हुए कहा कि इस विषय के दूसरे पहलुओं पर आने वाले ख़ुतबों में भी विस्तार से चर्चा की जाएगी।
तलाक़ के बढ़ते मामलों पर परिवारों को सोचने की ज़रूरत
दूसरे ख़ुतबे में मौलाना ने पारिवारिक व्यवस्था और समाज में बढ़ती तलाक़ की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शादी जैसे महत्वपूर्ण रिश्ते के फ़ैसले में केवल ज़ाहिरी ख़ूबसूरती, माल-दौलत या सामाजिक हैसियत को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
उनके अनुसार रिश्ते के चयन में ईमान, दीनी मिज़ाज, किरदार और अच्छे अख़लाक़ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पति-पत्नी के बीच सम्मान, समझदारी और अच्छे व्यवहार को वैवाहिक जीवन की मजबूती के लिए आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा कि माता-पिता के आपसी व्यवहार का गहरा असर बच्चों की परवरिश और उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है।
निकाह आसान है, रस्मों ने उसे मुश्किल बनाया
शादी-ब्याह में बढ़ती गैर-ज़रूरी रस्मों और फ़िज़ूलख़र्ची पर भी मौलाना ने ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि इस्लाम ने निकाह को आसान रखा है, लेकिन समाज ने अनेक रस्मों और दिखावे के कारण इसे मुश्किल बना दिया है।
उन्होंने कहा कि निकाह की असली बरकत नेक अमल, तक़वा और शरीअत की पैरवी में है। ऐसी कोई रस्म जो शरीअत के उसूलों से टकराती हो, उसे प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए। मौलाना ने निकाह में लड़का-लड़की की रज़ामंदी और मेहर की अहमियत पर ज़ोर देते हुए फ़िज़ूलख़र्ची से बचने की नसीहत की।
गांधी जयंती पर अमन और भाईचारे का संदेश
2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौक़े पर मौलाना ने महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान का उल्लेख करते हुए अमन, अहिंसा और आपसी सम्मान की अहमियत पर ज़ोर दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की खूबसूरती उसकी विविधता में है और सभी धर्मों एवं वर्गों के लोगों को एक-दूसरे के सम्मान के साथ रहना चाहिए। उनके मुताबिक़ अमन और भाईचारा देश की तरक़्क़ी और सामाजिक स्थिरता की बुनियाद हैं।
मध्य-पूर्व के हालात पर इंसाफ़ के नज़रिये से विचार की अपील
ख़ुतबे में यमन, ईरान और मध्य-पूर्व की स्थिति का भी उल्लेख हुआ। मौलाना ने कहा कि क्षेत्रीय घटनाओं को केवल शिया-सुन्नी के चश्मे से देखने के बजाय ज़ुल्म और इंसाफ़ के उसूलों की रोशनी में समझने की ज़रूरत है।
उन्होंने यमन और अंसारुल्लाह से संबंधित हालिया दावों का हवाला देते हुए सांप्रदायिक पक्षपात से ऊपर उठकर परिस्थितियों को समझने की अपील की। उन्होंने अमेरिका और इज़राइल की नीतियों की आलोचना की तथा मध्य-पूर्व में अमन के लिए दुआ की।
इसके साथ ही मक्का और मदीना सहित तमाम मुक़द्दस मुक़ामात की हिफ़ाज़त, सलामती और अमन के लिए भी दुआ की गई।
अहल-ए-बैत (अ.स.) की सीरत को ज़िंदगी में उतारने की नसीहत
ख़ुतबे के अंत में मौलाना रज़ा हैदर ज़ैदी ने अहल-ए-बैत (अ.स.) की शिक्षाओं को केवल सुनने या बयान करने के बजाय उन्हें व्यावहारिक जीवन में अपनाने पर ज़ोर दिया।
उन्होंने कहा कि तक़वा, वाजिबात पर अमल और हराम से परहेज़ ही उन शिक्षाओं का वास्तविक प्रभाव है। “ला इलाहा इल्लल्लाह” का इक़रार इंसान पर व्यावहारिक ज़िम्मेदारियां भी डालता है और तौहीद का तक़ाज़ा है कि इंसान अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की आज्ञा के मुताबिक़ ढालने की कोशिश करे।
अंत में देश में अमन-ओ-अमान, समाज में मोहब्बत और भाईचारे, परिवारों की मज़बूती तथा तमाम मोमिनीन की सेहत, सलामती और बेहतरी के लिए दुआ की गई।




