तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
हाईकोर्ट ने कहा—मामला विचार योग्य, सरकार से मांगा जवाब; 22 दिसंबर 2025 की चार्जशीट और 12/14 जनवरी 2026 की सप्लीमेंट्री चार्जशीट पर अगली सुनवाई तक रोक
प्रयागराज/लखनऊ। उत्तर प्रदेश के वक्फ प्रशासन की व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में ऐसा कानूनी सवाल खड़ा हो गया है, जिसका असर आने वाले समय में वक्फ विभाग की प्रशासनिक और विभागीय कार्रवाई पर पड़ सकता है। मामला है Writ-A No. 11107 of 2026—इर्शाद अहमद बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश एवं अन्य का, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ जारी चार्जशीट, सप्लीमेंट्री चार्जशीट और विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी है।
याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने 7 अगस्त 2026 को कहा कि “Matter requires consideration” यानी मामला विचार किए जाने योग्य है। अदालत ने राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और सबसे अहम अंतरिम आदेश देते हुए 22 दिसंबर 2025 की चार्जशीट, 12/14 जनवरी 2026 की सप्लीमेंट्री चार्जशीट तथा उनके आधार पर चल रही विभागीय कार्यवाही के प्रभाव और संचालन पर अगली तारीख तक रोक लगा दी।
असल विस्फोटक सवाल—2025 के वक्फ संशोधन के बाद ‘Survey Commissioner’ का पद बचा भी है या नहीं?
इस पूरे मुकदमे का केंद्र एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संसद द्वारा पारित Waqf (Amendment) Act, 2025 यानी Act No. 14 of 2025 8 अप्रैल 2025 से प्रभावी हुआ। संशोधन के बाद मूल वक्फ अधिनियम, 1995 की कई धाराओं में बदलाव किया गया और ‘Survey Commissioner’ से संबंधित प्रावधानों को हटाया या बदला गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि मूल धारा 3(p) में ‘Survey Commissioner’ की जो परिभाषा थी, उसे 2025 के संशोधन के जरिए हटा दिया गया। इसी तरह धारा 4 में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।
याचिकाकर्ता का दावा था कि यदि कानून में ‘Survey Commissioner’ की वैधानिक परिभाषा ही समाप्त कर दी गई और संबंधित शक्तियों को Collector से जोड़ दिया गया, तो संशोधन के बाद उत्तर प्रदेश में उस पद पर अधिकारी के रूप में काम करने और उसके आधार पर विभागीय कार्रवाई करने का कानूनी अधिकार किसके पास है—यह गंभीर सवाल है।
हाईकोर्ट के सामने रखी गई कानून की पूरी कहानी
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को मूल वक्फ एक्ट की धारा 3(p) का हवाला देते हुए बताया गया कि ‘Survey Commissioner’ का मतलब धारा 4(1) के तहत नियुक्त Survey Commissioner और धारा 4(2) के तहत नियुक्त Additional या Assistant Survey Commissioners से था।
मूल धारा 4(1) में राज्य सरकार को अधिसूचना जारी करके राज्य के लिए Survey Commissioner और आवश्यकता के अनुसार Additional या Assistant Survey Commissioners नियुक्त करने की शक्ति दी गई थी।
इसके अतिरिक्त Survey Commissioner को वक्फ संपत्तियों के सर्वे से संबंधित शक्तियां प्राप्त थीं और धारा 4 के तहत उसके कार्यों का प्रावधान था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 2025 के संशोधन ने इसी व्यवस्था की बुनियाद बदल दी।
लंबित वक्फ सर्वे भी अब Collector के पास!
अदालत के समक्ष 2025 में बदली गई धारा 4(1) को भी रखा गया।
संशोधित प्रावधान के अनुसार, Waqf (Amendment) Act, 2025 लागू होने के समय Survey Commissioner के समक्ष लंबित कोई भी वक्फ सर्वे संबंधित क्षेत्र के Collector को ट्रांसफर किया जाना है।
इसके बाद Collector को राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार उस सर्वे को आगे बढ़ाकर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को देनी है।
यही बदलाव याचिकाकर्ता की कानूनी चुनौती का एक महत्वपूर्ण आधार बना।
Survey Commissioner शब्द कई जगह से हटाया गया—Collector को किया गया प्रतिस्थापित
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह भी बताया गया कि संशोधन कानून की धारा 6 के जरिए धारा 4 के कई उपबंधों में बदलाव किए गए।
धारा 4 के कुछ पुराने उपबंधों को समाप्त किया गया और जहां पहले “Survey Commissioner” शब्द था, वहां “Collector” शब्द प्रतिस्थापित किया गया।
इसी तरह धारा 6 से संबंधित प्रावधान में भी ‘Survey Commissioner’ की जगह ‘Collector’ किया गया। इतना ही नहीं, संशोधन कानून की धारा 42 के जरिए वक्फ एक्ट की धारा 101 में भी ‘Survey Commissioner’ की जगह ‘Collector’ शब्द किए जाने की बात अदालत के सामने रखी गई।
याचिकाकर्ता की दलील—पुराना पद ही खत्म हो गया
इन तमाम संशोधनों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि 2025 के संशोधन के बाद मूल वक्फ अधिनियम में ‘Survey Commissioner’ का संदर्भ ही हटा दिया गया है।
इसी आधार पर यह दावा किया गया कि राज्य सरकार द्वारा 20 मई 1996 और 23 अप्रैल 2010 को जारी वे अधिसूचनाएं, जिनके आधार पर Secretary/Principal Secretary को Survey Commissioner नियुक्त किया गया था, संशोधित कानून लागू होने के बाद प्रभावहीन हो गईं।
याचिकाकर्ता के अनुसार, जब पद का वैधानिक आधार ही समाप्त हो गया, तो उस पद पर कार्यरत व्यक्ति द्वारा निलंबन अथवा विभागीय कार्रवाई की मंजूरी देना अधिकार-क्षेत्र के अभाव का मामला बन जाता है।
1996 और 2010 की सरकारी अधिसूचनाएं भी कटघरे में
मामले में पुरानी सरकारी अधिसूचनाओं का भी उल्लेख हुआ।
अदालत को बताया गया कि 20 मई 1996 की अधिसूचना के जरिए उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण एवं मुस्लिम वक्फ विभाग के सचिव को Survey Waqf Commissioner, U.P. नियुक्त किया गया था।
बाद में 23 अप्रैल 2010 की अधिसूचना से Secretary की जगह Principal Secretary को प्रतिस्थापित किया गया।
याचिकाकर्ता की दलील है कि ये नियुक्तियां जिस वैधानिक आधार पर हुई थीं, उसी आधार में 2025 के संशोधन के बाद बदलाव हो चुका है।
लेकिन सरकार ने हाईकोर्ट में दलील पलट दी
राज्य सरकार की ओर से इस चुनौती का जोरदार विरोध किया गया।
अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने अदालत में कहा कि 2025 के संशोधन में ‘Survey Commissioner’ शब्द हटने का यह मतलब नहीं है कि Survey Commissioner की शक्तियां स्वतः समाप्त हो गईं।
सरकार की ओर से एक दूसरा महत्वपूर्ण आधार भी रखा गया—U.P. Waqf Department Ministerial Service Rules, 1993।
सरकार ने कहा कि इर्शाद अहमद की नियुक्ति इन्हीं सेवा नियमों के तहत हुई थी और इन नियमों में नियुक्ति प्राधिकारी के रूप में Waqf Commissioner, Uttar Pradesh का उल्लेख है। इसलिए याचिकाकर्ता की सेवा से जुड़ी विभागीय कार्रवाई को मंजूरी देने में संबंधित अधिकारी की शक्ति को केवल 2025 के वक्फ संशोधन के आधार पर समाप्त नहीं माना जा सकता।
1993 के नियमों पर भी आमने-सामने हुआ टकराव
सरकार की दलील के जवाब में याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि 1993 के सेवा नियम उस समय बनाए गए थे जब U.P. Muslim Waqfs Act, 1960 लागू था।
उस पुराने कानून में ‘Commissioner of Waqfs’ की व्यवस्था थी और राज्य सरकार को वक्फ संपत्तियों के सर्वे के लिए Commissioner of Waqfs नियुक्त करने की शक्ति थी।
बाद में 1960 का कानून समाप्त हुआ और Waqf Act, 1995 लागू हुआ, जिसमें ‘Commissioner of Waqfs’ की जगह ‘Survey Commissioner’ शब्द इस्तेमाल किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि जब 2025 के संशोधन के बाद Survey Commissioner/Waqf Commissioner से संबंधित व्यवस्था को ही बदल दिया गया और विभिन्न स्थानों पर Collector को अधिकार दिया गया, तो पुराने सेवा नियमों के आधार पर उसी पदाधिकारी द्वारा विभागीय कार्रवाई शुरू करने या उसे मंजूरी देने का सवाल भी गंभीर हो जाता है।
मामला अभी अंतिम फैसला नहीं—लेकिन हाईकोर्ट ने कार्रवाई रोक दी
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी जरूरी है।
हाईकोर्ट ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि उत्तर प्रदेश में Survey Commissioner का पद निश्चित रूप से समाप्त हो चुका है अथवा संबंधित अधिकारी के पास विभागीय कार्रवाई की कोई शक्ति नहीं है।
अदालत ने फिलहाल इतना कहा है कि मामला विचार किए जाने योग्य है और राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
लेकिन अंतरिम आदेश बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने अगली सुनवाई तक मूल चार्जशीट, सप्लीमेंट्री चार्जशीट और उनके आधार पर चल रही विभागीय कार्यवाही पर रोक लगा दी है।
अब सरकार को देना होगा जवाब
हाईकोर्ट ने राज्य के अधिवक्ता को तीन सप्ताह के भीतर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
इसके बाद याचिकाकर्ता को दो सप्ताह में रीजॉइंडर एफिडेविट दाखिल करने का समय दिया गया है।
इसके बाद मामले को पांच सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का आदेश दिया गया है।
वक्फ प्रशासन के लिए क्यों अहम है यह आदेश?
इस आदेश का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि विवाद केवल इर्शाद अहमद की व्यक्तिगत विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं है।
याचिका में जिस कानूनी प्रश्न को उठाया गया है, वह सीधे तौर पर 2025 के वक्फ संशोधन के बाद Survey Commissioner से संबंधित वैधानिक ढांचे से जुड़ा है।
यदि आगे की सुनवाई में हाईकोर्ट याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार करता है, तो वक्फ विभाग में पुराने पदनाम, नियुक्तियों, शक्तियों और विभागीय कार्रवाई के अधिकार को लेकर कई नए कानूनी सवाल पैदा हो सकते हैं।
वहीं यदि राज्य सरकार यह साबित करने में सफल रहती है कि 1993 के सेवा नियमों अथवा अन्य वैधानिक व्यवस्था के तहत संबंधित अधिकारी की शक्तियां अभी भी प्रभावी हैं, तो याचिकाकर्ता की मुख्य दलील का प्रभाव सीमित हो सकता है।
अर्थात असली फैसला अभी बाकी है—लेकिन हाईकोर्ट ने फिलहाल उस विभागीय कार्रवाई पर ब्रेक लगा दिया है, जिसके अधिकार को ही याचिका में चुनौती दी गई है।
तहकीकात का अगला पड़ाव अब हाईकोर्ट में—Survey Commissioner की कुर्सी, 2025 के वक्फ कानून और विभागीय अधिकारों पर फैसला कितना दूर?
आदेश दिनांक: 7 अगस्त 2026
मामला: Writ-A No. 11107 of 2026
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम
याचिकाकर्ता: इर्शाद अहमद
प्रतिवादी: स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश एवं 5 अन्य
अगली कार्यवाही: राज्य का काउंटर, याचिकाकर्ता का रीजॉइंडर और पांच सप्ताह बाद सूचीकरण।




