तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
लखनऊ। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्टर ने उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पोस्टर में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शिया थियोलॉजी डिपार्टमेंट के चेयरमैन और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. असगर एजाज़ को यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का चेयरमैन बनाए जाने का दावा किया गया है। पोस्टर में यह भी कहा गया है कि उनकी नियुक्ति सेंट्रल वक्फ काउंसिल ने की है।
लेकिन उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में ऐसी कोई नियुक्ति सामने नहीं आती। उलटे, सेंट्रल वक्फ काउंसिल की अपनी वेबसाइट पर यूपी शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन के रूप में अभी अली जैदी का नाम दर्ज है।
सेंट्रल वक्फ काउंसिल की भूमिका क्या है?
कानून के तहत सेंट्रल वक्फ काउंसिल एक सलाहकार संस्था है। इसका काम केंद्र और राज्य सरकारों तथा वक्फ बोर्डों को वक्फ प्रशासन से जुड़े मामलों में सलाह देना, बोर्डों के कामकाज की जानकारी लेना और वक्फ संपत्तियों, वित्तीय स्थिति, रिकॉर्ड तथा अतिक्रमण जैसे मामलों पर निगरानी और मार्गदर्शन करना है।
इसलिए किसी राज्य वक्फ बोर्ड के चेयरमैन को सीधे नियुक्त करने का दावा सेंट्रल वक्फ काउंसिल की घोषित भूमिका से मेल नहीं खाता।
यानी वायरल पोस्टर में डॉ. असगर अजाज़ को चेयरमैन बनाए जाने का दावा फिलहाल फर्जी और अपुष्ट है।
लेकिन असली सवाल अली जैदी की सदस्यता का है
इस कहानी का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा अहम है।
उत्तर प्रदेश सरकार की 22 अक्टूबर 2021 की अधिसूचना में अली जैदी समेत आठ लोगों को यूपी शिया सेंट्रल बोर्ड ऑफ वक्फ का सदस्य पांच साल की अवधि के लिए नियुक्त किया गया था। अधिसूचना में साफ लिखा है कि यह अवधि गजट में अधिसूचना प्रकाशित होने की तारीख से पांच वर्ष है।
इसके बाद 15 नवंबर 2021 को बोर्ड के सदस्यों की बैठक में अली जैदी को चेयरमैन चुना गया और 18 नवंबर 2021 की सरकारी अधिसूचना में उनके निर्वाचन को दर्ज किया गया।
इसका मतलब यह है कि अली जैदी की मूल सदस्यता की पांच वर्षीय अवधि अक्टूबर 2026 में पूरी होने वाली है। चेयरमैन के रूप में उनका चुनाव नवंबर 2021 में हुआ था, लेकिन चुनाव की तारीख सदस्यता की मूल पांच वर्षीय अवधि को अपने आप आगे नहीं बढ़ाती।
अब असली सवाल है—सरकार अक्टूबर के बाद बोर्ड की अगली तस्वीर क्या तय करती है?
सदस्यता गई तो चेयरमैन की कुर्सी का क्या होगा?
वक्फ कानून में बोर्ड की सदस्यता और चेयरमैन पद आपस में जुड़े हुए हैं। मौजूदा कानून में बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा राजपत्र अधिसूचना के जरिए की जाती है और धारा 15 में सदस्यों के पांच साल के कार्यकाल का प्रावधान है।
इसके अलावा कानून में चेयरमैन या सदस्य को हटाने के लिए भी अलग प्रावधान मौजूद है। इसलिए यदि किसी सदस्य की सदस्यता कानून के मुताबिक समाप्त हो जाती है या सरकार वैधानिक प्रक्रिया के तहत उसे हटाती है, तो चेयरमैन के पद पर बने रहने का सवाल भी सामने आएगा।
शिकायतें और जांच भी बनीं चर्चा का कारण
अली जैदी के खिलाफ वक्फ बोर्ड के कामकाज और कथित अनियमितताओं को लेकर शिकायतों और जांच की बातें सामने आती रही हैं। यदि इन शिकायतों पर सरकारी स्तर पर जांच चल रही है तो उसका निष्कर्ष और संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे।
इसके अलावा इनकम टैक्स विभाग, इडी , मुख्यमंत्री से Sit जांच की मांग सामने आ चुकी है।
भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथारिटी आफताबे शरीयत मौलाना डॉ कल्बे जवाद नकवी साहब की शिया वक्फ बोर्ड की कार्यकर्दगी पर सवाल जुमे की नमाज में उठाकर जांच की मांग कर चुके है।
हालांकि किसी व्यक्ति को केवल शिकायत, आरोप या जांच के आधार पर “भ्रष्ट” घोषित करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। अंतिम निष्कर्ष सक्षम जांच एजेंसी या अदालत की कार्रवाई के बाद ही निकलेगा।
लेकिन अगर जांच में वित्तीय अनियमितता, कदाचार या कानून के उल्लंघन के प्रथमदृष्टया साक्ष्य सामने आते हैं तो सरकार के पास कानून के तहत कार्रवाई के रास्ते मौजूद हैं।
2025 के वक्फ कानून में सरकार के पास क्या विकल्प?
वक्फ कानून की धारा 99 कुछ परिस्थितियों में राज्य सरकार को बोर्ड को सुपरसीड करने की शक्ति देती है। यदि बोर्ड अपने कानूनी कर्तव्यों को पूरा करने में लगातार विफल रहता है, अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता है या उसका जारी रहना औकाफ के हित में नुकसानदेह माना जाता है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत सरकार बोर्ड को सुपरसीड कर सकती है। इसके लिए बोर्ड को अपना पक्ष रखने का उचित मौका देना जरूरी है।
सुपरसीशन की स्थिति में बोर्ड के सदस्य अपने पद खाली करते हैं और बोर्ड के कामकाज के लिए सरकार की ओर से प्रशासकीय व्यवस्था की जा सकती है। न्यायिक रिकॉर्ड में भी धारा 99 के तहत बोर्ड सुपरसीड होने पर प्रशासक नियुक्त किए जाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
यानी प्रशासक नियुक्त करने की संभावना राज्य सरकार की वैधानिक कार्रवाई से जुड़ी है, सेंट्रल वक्फ काउंसिल के किसी वायरल पोस्टर से नहीं।
कौन हैं डॉ. असगर एजाज़?
डॉ. असगर अजाज़ फिलहाल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ शिया थियोलॉजी के चेयरमैन और एसोसिएट प्रोफेसर हैं। AMU के आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका चेयरमैन कार्यकाल 10 नवंबर 2025 से 9 नवंबर 2028 तक दर्ज है।
AMU की प्रोफाइल के मुताबिक उनकी विशेषज्ञता फ़िक़्ह, उसूल-ए-फ़िक़्ह, अरबी साहित्य और इस्लामी फिलॉसफी में है। उन्होंने AMU से पीएचडी की और उनका शोध विषय “सय्यद-उल-उलेमा आयतुल्लाह सैयद अली नक़ी: हालात और कारनामे” रहा। उन्होंने जामिया नाज़िमिया, लखनऊ से शुरुआती दीनी तालीम हासिल की और ईरान में उच्च इस्लामी अध्ययन भी किया। AMU के मुताबिक उनके 30 से ज्यादा रिसर्च पेपर और लेख प्रकाशित हुए हैं।
इसलिए डॉ. अजाज़ का नाम अकादमिक और दीनी-इल्मी क्षेत्र में जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन उन्हें यूपी शिया वक्फ बोर्ड का चेयरमैन बनाए जाने की कोई सरकारी अधिसूचना फिलहाल सामने नहीं है।
अब निगाहें सरकार के अगले फैसले पर
वायरल पोस्टर ने भले ही डॉ. असगर अजाज़ के नाम से गलत खबर फैलाई हो, लेकिन उसने यूपी शिया वक्फ बोर्ड के सामने खड़े एक वास्तविक सवाल को जरूर सामने ला दिया है।
अक्टूबर 2026 में मौजूदा बोर्ड सदस्यों की पांच वर्षीय अवधि पूरी होने के बाद क्या होगा?
क्या सरकार नया बोर्ड बनाएगी? क्या नए सदस्यों का नामांकन होगा? क्या शिकायतों और जांच के आधार पर कोई कार्रवाई होगी? या कानून के तहत अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जाएगी?
इन सवालों का जवाब सोशल मीडिया पोस्टर नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की आधिकारिक अधिसूचना और कानून के मुताबिक होने वाली कार्रवाई देगी।
आखिर मुद्दा किसी एक चेयरमैन की कुर्सी का नहीं है। असली मुद्दा है—वक्फ की जमीन और संपत्तियों की हिफाजत, रिकॉर्ड में पारदर्शिता, आमदनी-खर्च की जवाबदेही, नाजायज कब्जों पर कार्रवाई और औकाफ की अमानत की हिफाजत।
फेक पोस्टर से डॉ. असगर एजाज़ चेयरमैन नहीं बने हैं, लेकिन अली जैदी की सदस्यता की पांच वर्षीय अवधि पूरी होने के बाद यूपी शिया वक्फ बोर्ड में क्या बदलाव होता है—इस पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं।




