तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ। कर्बला की मुकद्दस सरज़मीन पर पहुंचकर मौला इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रोज़े की जाली को छूना, नजफ में मौला अली अलैहिस्सलाम की चौखट पर सिर झुकाना और अपनी आंखों से इन मुकद्दस मकामात का दीदार करना—यह महज़ एक सफर नहीं, बल्कि हर अकीदतमंद के दिल की वह तमन्ना है, जिसे अल्फाज़ में बयान करना मुश्किल है।
लेकिन हर शख्स के लिए इन मुकद्दस शहरों तक पहुंचना मुमकिन नहीं हो पाता। किसी के सामने माली मजबूरियां होती हैं, तो कोई उम्र या दूसरे हालात की वजह से इस रूहानी सफर से महरूम रह जाता है। ऐसे ही अकीदतमंदों के दिल की इस कसक को महसूस करते हुए मोकेब इश्क़-ए-इलाही, लखनऊ ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जो यकीनन कई दिलों को सुकून पहुंचाएगी।
ग्रैंड रिलिजियस अथॉरिटी आयतुल्लाह सैयद अली सिस्तानी साहब के भारत में नुमाइंदे आगा अशरफ अली ग़रवी की सरपरस्ती में चल रहे मोकेब इश्क़-ए-इलाही, लखनऊ के ज़ेरे-एहतमाम कर्बला और नजफ की नायबत-ए-ज़ियारत का मुफ्त इंतज़ाम किया गया है।
इस सिलसिले का ऐलान करते हुए कार्यक्रम के ऑर्गनाइज़र आगा सागर मेहदी एडवोकेट ने कहा कि इस पहल का मकसद उन अकीदतमंदों को भी ज़ियारत की रूहानी सआदत से जोड़ना है, जिनके दिल में कर्बला और नजफ की हाज़िरी की तड़प तो है, लेकिन किसी वजह से वे खुद वहां पहुंचने में असमर्थ हैं।
एक नाम, एक नीयत और कर्बला तक पहुंचती दुआ
मोकेब इश्क़-ए-इलाही की इस रूहानी पहल के तहत अकीदतमंद अपने नाम या अपने किसी अज़ीज़, वालिदैन और मरहूमीन के नाम से नायबत-ए-ज़ियारत करवा सकेंगे।
यानी जिनके कदम खुद कर्बला और नजफ तक नहीं पहुंच सकते, उनके नाम और उनकी नीयत वहां सलाम और ज़ियारत के ज़रिए पहुंचाई जाएगी।
यह रूहानी सिलसिला हर जुमेरात को जारी है।
यह पहल महज़ ज़ियारत कराने का एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि मोहब्बत, अकीदत, दुआ और इंसानी हमदर्दी को जोड़ने वाली एक खूबसूरत रूहानी कोशिश है।
कर्बला की मिट्टी से दूर बैठे किसी मां-बाप के लिए यह खबर उनके बेटे की दुआ जैसी हो सकती है। किसी बुजुर्ग की अधूरी तमन्ना को सुकून दे सकती है और किसी मरहूम अज़ीज़ के नाम पर की गई नायबत-ए-ज़ियारत परिवार के लिए याद और दुआ का एक खूबसूरत ज़रिया बन सकती है।
आगा सागर मेहदी का पैगाम
आगा सागर मेहदी एडवोकेट ने कहा कि कर्बला और नजफ की ज़ियारत की सआदत सिर्फ उन लोगों तक महदूद नहीं होनी चाहिए जो सफर का खर्च उठा सकते हैं। अगर किसी दिल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मोहब्बत और ज़ियारत की तमन्ना है, तो उस दिल को कर्बला से जोड़ने की कोशिश ही इस पहल का असल मकसद है।
उन्होंने कहा कि मोकेब इश्क़-ए-इलाही की कोशिश रहेगी कि हर उस अकीदतमंद तक यह पैगाम पहुंचे, जिसकी आंखों ने कर्बला की ज़ियारत का ख्वाब देखा है, मगर कदम वहां तक नहीं पहुंच सके।
कर्बला दूर ज़रूर है, लेकिन मोहब्बत की कोई दूरी नहीं होती।
जहां कदम नहीं पहुंच सकते, वहां दुआ पहुंच सकती है।
और जहां दुआ पहुंचती है, वहां हुसैन अलैहिस्सलाम की मोहब्बत दिल को छू लेती है।
हर जुमेरात नायबत-ए-ज़ियारत का यह रूहानी सिलसिला जारी है—ताकि कर्बला से दूर रहने वाले दिल भी कर्बला से जुड़े रहें।




