तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ। नवाबी लखनऊ की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों, गलियों और तहज़ीब से नहीं, बल्कि उसकी रूहानी फिज़ा, इत्र की खुशबू और अकीदत से भी रही है। अब इसी ऐतिहासिक हुसैनाबाद की फिज़ा में खुशबू का एक नया अध्याय जुड़ गया है।
ऐतिहासिक घंटाघर के सामने और बड़े व छोटे इमामबाड़े के बीच विकसित किया गया फ्रैग्नेंस पार्क पुराने लखनऊ के हेरिटेज क्षेत्र में एक नया आकर्षण बनकर सामने आया है। करीब 2.3 एकड़ में विकसित इस पार्क पर लगभग 4 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के इस प्रोजेक्ट को उत्तर प्रदेश का अपनी तरह का पहला फ्रैग्नेंस पार्क बताया जा रहा है।
🌹 200 से ज्यादा पौधों से महकेगा हुसैनाबाद
पार्क में रात की रानी, चमेली, बेला, मोगरा, चंपा, गुलाब, रजनीगंधा, गंधराज, चांदनी और तुलसी सहित बड़ी संख्या में सुगंधित एवं सजावटी पौधे लगाए गए हैं। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक यहां 200 से अधिक प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं, जबकि परियोजना की शुरुआती योजना में अलग-अलग मौसम में खिलने वाले सुगंधित पौधों के चयन पर विशेष जोर दिया गया था।
पौधों के चयन में CSIR-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI), लखनऊ के विशेषज्ञों की मदद ली गई है। योजना इस तरह बनाई गई है कि वर्ष के अलग-अलग मौसम में अलग-अलग पौधे खिलें और पार्क में खुशबू का सिलसिला बना रहे।
यानी यह महज एक पार्क नहीं, बल्कि फूलों और खुशबू के जरिए प्रकृति को महसूस करने का एक अनुभव होगा।
🕌 इमामबाड़ों की सरज़मीं पर खुशबू का नया अध्याय
इस पार्क की सबसे खास बात इसका स्थान है।
यह कोई सामान्य शहरी पार्क नहीं है। यह उस हुसैनाबाद में बना है जहां सदियों पुरानी इमारतें लखनऊ की नवाबी, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की कहानी सुनाती हैं।
एक तरफ बड़ा इमामबाड़ा, जिसे नवाब आसफ-उद-दौला ने 1784 के अकाल के दौर में बनवाया था और जिसका संबंध मजलिस तथा मुहर्रम की परंपराओं से रहा; दूसरी ओर छोटा इमामबाड़ा, जिसे अवध के तीसरे बादशाह मोहम्मद अली शाह ने बनवाया। इनके आसपास रूमी दरवाजा और हुसैनाबाद घंटाघर जैसे स्थापत्य चिह्न मौजूद हैं।
इसी ऐतिहासिक गलियारे में खुशबू से भरा नया पार्क बनना अपने आप में पुराने और नए लखनऊ का एक दिलचस्प संगम है।
🕰️ घंटाघर भी इस कहानी का अहम हिस्सा
फ्रैग्नेंस पार्क के सामने खड़ा हुसैनाबाद घंटाघर भी साधारण इमारत नहीं है।
लखनऊ जिला प्रशासन के अनुसार यह 221 फीट ऊंचा ऐतिहासिक घंटाघर है, जिसकी स्थापना हुसैनाबाद एंडोमेंट की निधि से हुई थी। इसके निर्माण की लागत लगभग दो लाख रुपये बताई गई है और इसकी वास्तुकला में ब्रिटिश दौर का प्रभाव दिखाई देता है।
यानी जिस जगह आज खुशबू का नया पार्क दिखाई दे रहा है, वहां आसपास का हर पत्थर लखनऊ के किसी न किसी ऐतिहासिक दौर की कहानी कहता है।
🤲 अकीदत की विरासत भी इसी जमीन से जुड़ी
हुसैनाबाद का इतिहास सिर्फ वास्तुकला तक सीमित नहीं है। यहां की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं की जड़ें भी काफी गहरी हैं।
मोहम्मद अली शाह के शासनकाल में हुसैनाबाद इमामबाड़ा, जामा मस्जिद और सिब्तैनाबाद जैसे निर्माण हुए और हुसैनाबाद एंडोमेंट की स्थापना भी हुई। जिला प्रशासन के इतिहास विवरण के अनुसार मोहम्मद अली शाह ने धार्मिक और जनकल्याणकारी कार्यों के लिए एक बड़ा बंदोबस्ती तंत्र स्थापित किया था।
आज भी बड़े और छोटे इमामबाड़े के बीच का यह इलाका मुहर्रम और अज़ादारी की ऐतिहासिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। 2025 में यहां से निकलने वाला शाही ज़री का जुलूस, जिसकी परंपरा 1837 में मोहम्मद अली शाह के दौर से जुड़ी बताई जाती है, बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक पहुंचा था।
ऐसे में इस इलाके में फूलों की खुशबू से भरा पार्क बनना महज सौंदर्यीकरण का विषय नहीं, बल्कि पुराने लखनऊ की फिज़ा में एक नया रंग जोड़ने जैसा है।
🌿 हर किसी के लिए बनाया गया पार्क
पार्क की योजना में सिर्फ सुंदरता ही नहीं, बल्कि समावेशिता का भी ध्यान रखा गया है।
दृष्टिबाधित लोगों के लिए ब्रेल सूचना-पट्ट और दिव्यांगों के लिए रैंप जैसी सुविधाएं रखी गई हैं। इसके अलावा यहां ओपन-एयर थिएटर, पेर्गोला, गज़ीबो और अन्य सुविधाएं भी विकसित की गई हैं। LDA की वेबसाइट पर पार्क को करीब 1.29 हेक्टेयर क्षेत्र में विकसित बताया गया है।
LDA की योजना में भविष्य में यहां इत्र की दुकान विकसित करने का विचार भी शामिल है। यह कदम इस जगह को लखनऊ की पारंपरिक इत्र संस्कृति से जोड़ सकता है।
🇮🇳 लोकार्पण के साथ देशभक्ति का संदेश भी
अम्बर फाऊंडेशन के चेयरमैन वफ़ा अब्बास के अनुसार 29 अगस्त 2026 को पार्क का लोकार्पण रक्षा मंत्री और लखनऊ के हर दिल अजीज सांसद राजनाथ सिंह द्वारा लोकार्पण कार्यक्रम के साथ लाला लाजपत राय और शहीद भगत सिंह की प्रतिमाओं के अनावरण की भी जानकारी दी गई है।
इस तरह हुसैनाबाद में तैयार यह नया स्थल एक साथ कई संदेश देता दिखाई देता है—विरासत का सम्मान, प्रकृति से जुड़ाव, पर्यटन को बढ़ावा और नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने की कोशिश।
✨ एक नई तस्वीर—पुराने लखनऊ की
लखनऊ की खूबसूरती उसकी पुरानी इमारतों में जरूर है, लेकिन उसकी असली पहचान उन इमारतों के बीच सांस लेती तहज़ीब और अकीदत में है।
बड़े इमामबाड़े की शान, छोटे इमामबाड़े की रोशनियां, घंटाघर की बुलंदी और अब इनके बीच फूलों की खुशबू—फ्रैग्नेंस पार्क पुराने लखनऊ की इसी मिली-जुली पहचान में एक नया पन्ना जोड़ रहा है।
अकीदत के इस शहर में खुशबू का यह नया ठिकाना आने वाले दिनों में सिर्फ पर्यटकों के लिए आकर्षण नहीं, बल्कि लखनऊ की बदलती तस्वीर और उसकी सदियों पुरानी विरासत के बीच एक खूबसूरत संवाद भी बन सकता है।




