तहलका टुडे टीम
लखनऊ।सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में वाक़े मस्जिद को गिराए जाने के वाक़िए पर आफ़्ताब-ए-शरीअत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने सख़्त रद्दे-अमल का इज़हार करते हुए कहा कि हिंदुस्तान की सरज़मीन पर सजदे के मुक़ाम पर बुलडोज़र चलाया जाना सिर्फ़ एक इमारत को गिराना नहीं, ईश्वर की इबादत को रोकने ,क़ानून की हुक्मरानी, दस्तूरी क़दरों और इंतिज़ामिया की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि अगर किसी तामीर को क़ानून के तहत हटाना ज़रूरी था तो हुकूमत को क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई करने का हक़ है, लेकिन क़ानून नाफ़िज़ करने वाला कोई भी अफ़सर ख़ुद क़ानून से बालातर नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि इस पूरे वाक़िए में सबसे अहम सवाल यह है कि मस्जिद को गिराने का बाक़ायदा तहरीरी हुक्म किस अफ़सर ने जारी किया, किसने उसकी मंज़ूरी दी, किस क़ानूनी इख़्तियार के तहत JCB और दूसरी मशीनरी इस्तेमाल की गई और पूरी कार्रवाई की कमान किसके हाथ में थी?
मौलाना ने कहा कि सिर्फ़ यह कह देना काफ़ी नहीं है कि कार्रवाई अदालत के हुक्म की तामील में की गई। अवाम को असल हुक्म दिखाया जाना चाहिए और यह साफ़ होना चाहिए कि अदालत ने क्या हुक्म दिया था और इंतिज़ामिया ने उसके आधार पर क्या कार्रवाई की।
उन्होंने कहा कि सहारनपुर के मुताल्लिक़ा इंतिज़ामी और पुलिस अफ़सरों के किरदार की आज़ाद, बे-लाग और आला-सतही क़ज़ाई तहक़ीक़ात होनी चाहिए। तहक़ीक़ात से पहले किसी अफ़सर को मुजरिम क़रार देना मुनासिब नहीं, लेकिन किसी अफ़सर को सिर्फ़ उसके ओहदे की बिना पर तहक़ीक़ात से बाहर रखना भी क़ानून की हुक्मरानी के ख़िलाफ़ होगा।
मौलाना की मांगें
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने मुतालिबा किया कि:
- मस्जिद गिराने का असल तहरीरी हुक्म अवाम के सामने लाया जाए।
- हुक्म का नंबर, तारीख़ और दस्तख़त करने वाले अफ़सर का नाम साफ़ किया जाए।
- पूरी इंतिज़ामी फ़ाइल और नोटशीट महफ़ूज़ की जाए।
- CCTV फुटेज और कार्रवाई की वीडियोग्राफ़ी को महफ़ूज़ किया जाए।
- JCB, डंपर और दूसरी सरकारी मशीनरी इस्तेमाल करने के हुक्म की तहक़ीक़ात की जाए।
- पुलिस/PAC की तैनाती किस हुक्म पर हुई, इसका रिकॉर्ड सामने लाया जाए।
- कार्रवाई में शामिल हर अफ़सर और मुलाज़िम के किरदार की आज़ादाना तहक़ीक़ात की जाए।
- अगर किसी अफ़सर की जानिब से इख़्तियार का ग़लत इस्तेमाल या क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी साबित हो तो उसके ख़िलाफ़ FIR और क़ानूनी कार्रवाई की जाए।
- अगर तहक़ीक़ात में जुर्म साबित हो तो अदालत के ज़रिए क़ानून के मुताबिक़ सज़ा दिलाई जाए।
- और अगर किसी अफ़सर की इंतिज़ामी बदउनवानी साबित हो तो उसके ख़िलाफ़ सख़्त महक़माती कार्रवाई और क़ानून के मुताबिक़ बर्ख़ास्तगी की कार्रवाई की जाए।
“बुलडोज़र संविधान से बड़ा नहीं हो सकता”
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि हिंदुस्तान किसी इस्तिमारी ज़ेहनियत से नहीं, बल्कि आईन और क़ानून से चलता है। किसी सरकारी कुर्सी पर बैठा हुआ अफ़सर क़ानून से ऊपर नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा:
“हम किसी ग़ैर-क़ानूनी तामीर की हिमायत नहीं कर रहे हैं। हमारा सवाल बिल्कुल साफ़ है—अगर कोई तामीर ग़ैर-क़ानूनी थी तो क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई कीजिए, लेकिन अगर क़ानून लागू करने की प्रक्रिया में ही क़ानून को नज़रअंदाज़ किया गया है तो फिर ज़िम्मेदार अफ़सरों से भी जवाब लिया जाना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि अवाम यह जानना चाहती है कि क्या क़ानून की किताब आम शहरी के लिए अलग और सरकारी अफ़सर के लिए अलग है?
“सजदे के मुक़ाम पर बुलडोज़र नहीं, आईन की रोशनी होनी चाहिए”
मौलाना ने कहा कि किसी भी मज़हबी मुक़ाम की क़ानूनी हैसियत का फ़ैसला अदालत और क़ानून करेगा, लेकिन क़ानून पर अमल कराने की ज़िम्मेदारी रखने वाले अफ़सर भी उसी क़ानून के पाबंद हैं।
उन्होंने कहा:
“हिंदुस्तान की सरज़मीन पर सजदे के मुक़ाम से नफ़रत क्यों?
अगर किसी तामीर को हटाना क़ानून की ज़रूरत है तो क़ानून के रास्ते हटाइए, लेकिन बुलडोज़र को आईन से बड़ा मत बनाइए।”
मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट, वज़ीर-ए-आज़म दफ़्तर, सदर-ए-जम्हूरिया, वज़ीर-ए-आला उत्तर प्रदेश और गवर्नर उत्तर प्रदेश के सामने मामले की आज़ादाना तहक़ीक़ात और ज़िम्मेदार अफ़सरों की जवाबदेही का मुतालिबा रखेंगे।
उन्होंने कहा कि अगर किसी अफ़सर की जानिब से आईनी और क़ानूनी हुदूद से तजावुज़, इख़्तियार का नाजायज़ इस्तेमाल या किसी जुर्म का सबूत मिलता है तो उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज होना चाहिए और अदालत में जुर्म साबित होने पर क़ानून के मुताबिक़ सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी बैरूनी या ग़ैर-मुल्की असर या दबाव के बारे में कोई क़ाबिल-ए-एतबार सबूत सामने आता है तो उसकी भी आज़ादाना तहक़ीक़ात होनी चाहिए। बिना सबूत किसी पर इल्ज़ाम लगाना दुरुस्त नहीं, लेकिन अगर कोई बाहरी दबाव या साज़िश सामने आए तो उसकी तहक़ीक़ात से भी गुरेज़ नहीं किया जाना चाहिए।
आख़िर में मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नक़वी ने कहा:
“ये लड़ाई सिर्फ़ एक इमारत की चारदीवारी की नहीं है; ये सवाल है कि हिंदुस्तान में क़ानून बड़ा है या क़ानून लागू करने वाले की मनमानी। हम आईन के दायरे में इंसाफ़ का मुतालिबा करते हैं और साफ़ कहते हैं कि अगर कोई अफ़सर मुजरिम साबित होता है तो उसकी कुर्सी नहीं, उसका अमल क़ानून के कटघरे में खड़ा होना चाहिए।”




