“मैं हिंदू हूँ, मगर हक़ से मेरी यारी है…”
कर्बला की अमानत पुकार रही है—मातम के साथ अब उसकी हिफाज़त की भी बारी है
“मैं हिंदू हूँ, मगर हक़ से मेरी यारी है,
हुसैन की राह में सर देना भी वफ़ादारी है।
जो अमानत-ए-कर्बला का सौदा करे,
उसके सामने ख़ामोशी भी गद्दारी है।”
सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव पर हमले के बाद उठी यह आवाज़ अब सिर्फ एक शख्स की आवाज़ नहीं रही—यह कर्बला की उस अमानत की पुकार बन गई है, जिसे हर मज़हब का इंसान अपने ज़मीर से महसूस कर सकता है।
कर्बला की ज़मीन पर किसका पहरा?
तारीखें बदलती रहीं, पैरवी सवालों में घिरती रही—अब सवाल है, कर्बला की पैरवी कौन कर रहा है?
31 मई से 8 अक्टूबर तक मुकदमे की तारीखों का सिलसिला, पैरवी को लेकर उठते सवाल, पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र वर्मा का वकालतनामा वापस और दूसरा वकालतनामा दाखिल—इसी बीच पत्रकार उमेश चंद्र पर कचहरी में हमले के आरोपों ने मामले को और गंभीर बना दिया
बाराबंकी।
कर्बला की मिट्टी बहुत कुछ देखती है।
उसने मातम भी देखा है, सजदा भी देखा है, आंसू भी देखे हैं और हक़ के लिए उठती आवाज़ें भी।
26 सफ़र को इसी कर्बला में 72 शहीदों की याद में जब आंखें नम थीं, सीने मातम कर रहे थे और लबों पर हुसैनؑ का नाम था, उसी वक्त दिल में एक सवाल भी उठना चाहिए था—
जिस कर्बला पर हम रोते हैं, उसकी अमानत की हिफाज़त कौन करेगा?
आज यही सवाल अदालत की फाइलों से निकलकर समाज के दरवाज़े पर खड़ा है।
मामला अदालत में है, मगर सवाल ज़मीर का भी है
वाद संख्या 848/2006 में 30 अप्रैल 2026 को कर्बला के खिलाफ आदेश के बाद अपील दाखिल हुई।
31 मई को नोटिस जारी करने का आदेश हुआ।
फिर 17 जुलाई को नोटिस की पैरवी को लेकर सवाल उठे।
10 अगस्त को भी प्रभावी पैरवी को लेकर स्थिति संतोषजनक न होने की बात सामने आई।
और अब 9 सितम्बर की तारीख आगे बढ़कर 8 अक्टूबर हो चुकी है।
एक तारीख से दूसरी तारीख।
एक इंतज़ार से दूसरे इंतज़ार तक।
लेकिन सवाल वही—
“कर्बला के हक़ की आवाज़ अदालत में पूरी ताक़त से कौन उठा रहा है?”
क्योंकि मुकदमा सिर्फ कागज़ का नहीं होता।
कभी-कभी एक मुकदमे के पीछे पीढ़ियों की अमानत, बुज़ुर्गों की निशानी और आने वाली नस्लों का हक़ खड़ा होता है।
वक्फ बोर्ड से सवाल—जवाब भी दस्तावेज़ों में चाहिए
वक्फ हितधारकों की ओर से पैरवी और प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
सवाल यह है कि—
किसे अधिकृत किया गया?
किस आधार पर किया गया?
अधिवक्ता की नियुक्ति किसने की?
अदालत की तारीखों की निगरानी किसने की?
नोटिस की पैरवी समय पर क्यों नहीं हो सकी?
और करबला के हितों की रक्षा के लिए अब तक क्या प्रभावी कदम उठाए गए?
इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, रिकॉर्ड और दस्तावेज़ों से मिलना चाहिए।
अगर सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ है, तो तस्वीर साफ होनी चाहिए।
अगर कहीं लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
और अगर किसी स्तर पर वक्फ के हित प्रभावित हुए हैं, तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
“पैरोकार कौन?”—यही सबसे बड़ा सवाल
मामले से जुड़े लोगों की भूमिकाओं को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
यह आरोप और चर्चाएं जांच का विषय हैं, फैसला नहीं।
लेकिन जब किसी वक्फ संपत्ति का मुकदमा अदालत में हो, तब प्रतिनिधित्व की पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है।
जिसके हाथ में अमानत की पैरवी हो, उसके बारे में सवाल उठें तो उन सवालों को दबाया नहीं जाना चाहिए—बल्कि जांच के उजाले में लाया जाना चाहिए।
क्योंकि—
कर्बला किसी व्यक्ति की जागीर नहीं, अमानत है।
नरेंद्र वर्मा का वकालतनामा वापस फिर नया वकालतनामा
मामले में एक और घटनाक्रम चर्चा में है।
पूर्व अध्यक्ष एवं अधिवक्ता नरेंद्र वर्मा ने अपना वकालतनामा वापस लिया और दूसरा वकालतनामा दाखिल किया गया।
वकालतनामा बदलना अपने आप में किसी अपराध या अनियमितता का प्रमाण नहीं है।
लेकिन जब पहले से ही पैरवी को लेकर सवाल उठ रहे हों, तब स्वाभाविक है कि लोग पूछें—
बदलाव क्यों हुआ?
क्या बदला?
किसके निर्देश पर बदला?
और अब कर्बला की पैरवी किस रणनीति के तहत होगी?
इनका सही जवाब अदालत के रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों से ही मिल सकता है।
फिर कचहरी में पत्रकार की आवाज़ पर हमला?
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब वरिष्ठ पत्रकार उमेश चंद्र को कचहरी बुलाए जाने के बाद उन पर हमले के आरोप सामने आए।
शिकायत के अनुसार, घटना में कुछ ऐसे लोगों की मौजूदगी अथवा भूमिका का आरोप लगाया गया है जिन्हें कर्बला विवाद से जुड़ा बताया गया है। मोहम्मद अब्बास का नाम भी शिकायत/आरोपों में सामने आया है।
इन आरोपों की सच्चाई का निर्धारण जांच और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्ष से ही होगा।
लेकिन एक सवाल फिर भी सामने खड़ा है—
अगर सवाल पूछने की कीमत हमला है, तो फिर कचहरी और पत्रकारिता के बीच बचता क्या है?
जिस जगह इंसाफ की तलाश में लोग जाते हैं, अगर वहीं किसी पत्रकार की आवाज़ दबाने का आरोप लगे, तो मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं रह जाता।
वह कानून के राज और लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा का सवाल बन जाता है।
मैं हिंदू हूँ… मगर हक़ से मेरी यारी है
यही इस पूरी कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष है।
कर्बला किसी एक मज़हब की सीमा में कैद नहीं।
हुसैनؑ का नाम उस ज़मीर का नाम है जो ज़ुल्म के सामने झुकने से इनकार करता है।
इसलिए कोई हिंदू होकर हुसैन का अज़ादार हो सकता है।
कोई मुसलमान होकर हुसैन का मातमदार हो सकता है।
लेकिन हुसैनियत की असली पहचान शायद यही है—
हक़ के साथ खड़ा होना।
उमेश चंद्र श्रीवास्तव कहते है—
“मैं हिंदू हूँ, मगर हक़ से मेरी यारी है,
हुसैन की राह में सर देना भी वफ़ादारी है।
जो अमानत-ए-कर्बला का सौदा करे,
उसके सामने ख़ामोशी भी गद्दारी है।”
क्या अज़ादारी सिर्फ़ आंसुओं का नाम है?
26 सफ़र को हम रोएँ।
मजलिस में बैठें।
मातम करें।
हुसैनؑ का नाम लें।
लेकिन जब उसी कर्बला की जमीन और अमानत पर सवाल उठें तो क्या हम फिर खामोश हो जाएँ?
क्या अज़ादारी सिर्फ़ सीने पर हाथ मारने का नाम है?
या फिर—
अमानत की हिफाज़त भी अज़ादारी है?
हक़ के लिए आवाज़ उठाना भी अज़ादारी है?
ज़ुल्म के सामने खड़ा होना भी अज़ादारी है?
मिलीभगत है या लापरवाही—सच जांच से सामने आए
स्थानीय स्तर पर संभावित मिलीभगत की चर्चाएं भी हैं।
लेकिन चर्चा को फैसला नहीं बनाया जा सकता।
न किसी को बिना जांच दोषी कहा जा सकता है और न सवालों को सिर्फ इसलिए दबाया जा सकता है कि वे असुविधाजनक हैं।
इसलिए मांग सीधी है—
निष्पक्ष जांच हो।
दस्तावेज़ सामने आएं।
पैरवी की जिम्मेदारी स्पष्ट हो।
वक्फ की संपत्ति का रिकॉर्ड सुरक्षित हो।
और यदि किसी की लापरवाही सामने आए तो जवाबदेही तय हो।
बस इतना ही।
अब 8 अक्टूबर—तारीख नहीं, जवाब चाहिए
31 मई से 17 जुलाई।
17 जुलाई से 10 अगस्त।
10 अगस्त से 9 सितम्बर।
और अब—
8 अक्टूबर।
कर्बला के चाहने वालों की अब सिर्फ़ एक फरियाद है—
“अगली तारीख सिर्फ़ तारीख बनकर न आए… कर्बला की मजबूत पैरवी लेकर आए।”
वक्फ बोर्ड अपनी जिम्मेदारी निभाए।
अधिकृत प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
अधिवक्ता अदालत में प्रभावी पैरवी करें।
हर दस्तावेज़ सुरक्षित रहे।
हर निर्णय पारदर्शी हो।
और हर सवाल का जवाब रिकॉर्ड में हो।
क्योंकि कर्बला सिर्फ़ एक जमीन का नाम नहीं… एक ज़मीर का नाम है।
आज अगर हम कर्बला के नाम पर रोते हैं, तो उसकी अमानत के लिए जागना भी होगा।
आज अगर हुसैनؑ का नाम लेते हैं, तो हक़ की आवाज़ को बचाना भी होगा।
आज अगर मातम करते हैं, तो अमानत पर पहरा भी देना होगा।
वरना कल इतिहास हमसे पूछेगा—
“जब कर्बला पुकार रही थी, तब तुम कहाँ थे?”
और शायद उस सवाल का जवाब आंसुओं से नहीं दिया जा सकेगा।
उठो हुसैनियो—कर्बला को अकेला मत छोड़ो!
**मातम अपनी जगह…
मगर अमानत की हिफाज़त भी ज़रूरी है।**
**अज़ादारी अपनी जगह…
मगर हक़ की पैरवी भी ज़रूरी है।**
**तारीख अपनी जगह…
मगर इस बार जवाब ज़रूरी है।**
कर्बला की मिट्टी आज भी खामोश है—
मगर उसका सवाल बहुत साफ़ है:




