रिपोर्ट:सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ। सियासत में कभी-कभी घटनाएं इतनी तेजी से एक-दूसरे से जुड़ती हैं कि सवाल खुद-ब-खुद पैदा होने लगते हैं। उत्तर प्रदेश में मोहसिन रजा को राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है।
कुछ समय पहले तक मोहसिन रजा वक्फ संपत्तियों के कथित गड़बड़झाले और रिकॉर्ड में भारी अंतर को लेकर सरकार के सामने SIT जांच और विशेष ऑडिट की मांग कर रहे थे। अब प्रदेश सरकार ने उन्हें उसी व्यापक अल्पसंख्यक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण वैधानिक आयोग की कमान सौंप दी है।
सरकार के 8 सितंबर 2026 के आदेश के मुताबिक मोहसिन रजा अध्यक्ष होंगे और उनके साथ आठ सदस्यों की भी नियुक्ति की गई है। उन्हें कैबिनेट मंत्री स्तर का दर्जा दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
यहीं से कहानी में एक दिलचस्प मोड़ आता है—
“जिसने वक्फ की जमीनों का हिसाब मांगते हुए सवाल उठाए, अब वही अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े सवालों को सुनने वाली कुर्सी पर है।”
सरकार ने नियुक्ति का कारण वक्फ जांच की मांग को नहीं बताया है। इसलिए दोनों घटनाओं को सीधे जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन सियासी संयोग इतना महत्वपूर्ण जरूर है कि इसकी चर्चा होना स्वाभाविक है।
वक्फ का ‘गायब हिसाब’—सवाल कितना बड़ा?
मोहसिन रजा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के दौरान दावा किया था कि प्रदेश में पहले दो लाख से अधिक वक्फ संपत्तियां दर्ज थीं, जबकि मौजूदा रिकॉर्ड में करीब 1.27 लाख संपत्तियां दिखाई देती हैं।
उनके मुताबिक यह अंतर 70 हजार से अधिक संपत्तियों का है।
रजा ने इसी को लेकर SIT जांच, विशेष ऑडिट, भौतिक सत्यापन और रिकॉर्ड के मिलान की मांग की थी।
लेकिन यहां एक अहम सावधानी जरूरी है—70 हजार से अधिक संपत्तियों के अंतर को ‘गायब संपत्तियां’ कहना फिलहाल रजा का दावा है; अब ये बात अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष की ज़ुबान से होगा।
फिर भी सवाल अपनी जगह बेहद बड़ा है।
अगर रिकॉर्ड में अंतर है तो कारण क्या है?
- कितनी संपत्तियां वास्तव में मौके पर मौजूद हैं?
- कितनी पर कब्जे हैं?
- कितनी संपत्तियों का किराया वसूला जा रहा है?
- कितनी संपत्तियों का किराया बकाया है?
- पुराने और मौजूदा रिकॉर्ड में अंतर क्यों है?
- और अगर कहीं अवैध रूप से रिकॉर्ड बदला गया है तो जिम्मेदार कौन है?
इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच ही दे सकती है।
अब ‘सवाल पूछने’ से आगे ‘जवाब तलाशने’ की बारी
यही मोहसिन रजा की नई भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।
पहले वह सरकार से पूछ रहे थे—
“वक्फ संपत्तियों का हिसाब कहां है?”
अब उनके सामने अल्पसंख्यक आयोग की जिम्मेदारी है।
यानी अब उनसे पूछा जा सकता है—
“साहब, आपने सवाल उठाया था—अब जवाब कब आएगा?”
वक्फ की संपत्ति पर अवैध कब्जे की शिकायत आए तो क्या आयोग सक्रिय होगा?
किराया नहीं देने वाले मामलों में क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा?
अल्पसंख्यक संस्थानों की शिकायतों पर क्या कार्रवाई होगी?
सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या नहीं—क्या इसकी निगरानी होगी?
यही वह बिंदु है जहां मोहसिन रजा की नई राजनीतिक जिम्मेदारी प्रशासनिक जिम्मेदारी में बदलती दिखाई देगी।
मोहसिन रजा की सियासत: क्रिकेट से मंत्री पद और अब आयोग
मोहसिन रजा की कहानी सीधे राजनीतिक गलियारों से शुरू नहीं हुई।
क्रिकेट से उनका जुड़ाव रहा और उन्होंने उत्तर प्रदेश की ओर से रणजी ट्रॉफी में भी प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा मॉडलिंग और अभिनय से भी उनका संबंध रहा।
बाद में उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना।
2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार के गठन के बाद मोहसिन रजा को राज्यमंत्री बनाया गया। वह उस सरकार के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में शामिल रहे और अल्पसंख्यक कल्याण, मुस्लिम वक्फ तथा हज से जुड़े विभागों की जिम्मेदारियां संभालीं।
2022 में उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य हज समिति का अध्यक्ष बनाया गया था,जिसका कार्यकाल भी समाप्त हो चुका था,मंत्री दानिश आजाद ने भी इस कुर्सी पर कब्जा कर लिया था।
और अब—
राज्यमंत्री से हज कमेटी तक… और हज कमेटी से अल्पसंख्यक आयोग तक।
मोहसिन रजा की राजनीतिक पारी एक बार फिर सुर्खियों में है।
धार्मिक पहचान और राजनीतिक भूमिका का अनोखा मेल
मोहसिन रजा की सार्वजनिक छवि का एक पहलू उनका शिया धार्मिक-सामाजिक परिवेश भी है।
अज़ादारी और धार्मिक आयोजनों में उनकी मौजूदगी देखी गई है। नौहाख्वानी की परंपरा से परिचित यह चेहरा भाजपा की राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के तौर पर भी लंबे समय से सक्रिय रहा है।
अली अली हाय अली का नौहा उनका 21 रमजान को पढ़ना हमेशा चर्चा में रहता है,
मां की खिदमत,पैर दबाते उनके वीडियो अक्सर वायरल होते है,सोशल मीडिया पर
यही वजह है कि उनकी नई जिम्मेदारी को केवल सरकारी नियुक्ति मानकर छोड़ देना शायद कहानी का एक हिस्सा ही देखना होगा।
धार्मिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि + भाजपा की राजनीतिक पहचान + अल्पसंख्यक मामलों का अनुभव + अब आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी।
इन चारों पहलुओं ने उनकी नई भूमिका को खास बना दिया है।
आयोग की नई टीम कौन-कौन?
सरकार ने मोहसिन रजा के साथ आठ सदस्यों को भी नियुक्त किया है।
अध्यक्ष
मोहसिन रजा
सदस्य
संदीप जैन
अंशुमान कुमार सिंह मैसी
सरदार हनमीत सिंह बेदी
मोहम्मद असलम
सरदार परविन्दर सिंह
नेहा खान
सैयद मेराज अब्बास रिजवी
रूमाना सिद्दीकी
अध्यक्ष समेत यह नई टीम अब उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े मामलों को देखने की जिम्मेदारी संभालेगी।
2027 से पहले एक नियुक्ति, कई राजनीतिक संदेश
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की ओर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। ऐसे समय में भाजपा के पुराने मुस्लिम चेहरे को कैबिनेट रैंक के साथ अल्पसंख्यक आयोग की कमान मिलना अपने आप में राजनीतिक चर्चा का विषय है।
क्या यह भाजपा की अल्पसंख्यक रणनीति का हिस्सा है?
क्या यह मोहसिन रजा की राजनीतिक उपयोगिता पर सरकार के भरोसे का संकेत है?
या फिर सरकार ने उन्हें अल्पसंख्यक मामलों में उनके पुराने अनुभव के आधार पर जिम्मेदारी दी है?
इन सवालों के निश्चित जवाब फिलहाल सरकार की ओर से नहीं आए हैं।
लेकिन इतना जरूर है कि मोहसिन रजा की नई जिम्मेदारी ने उन्हें फिर से उत्तर प्रदेश की सियासी सुर्खियों में ला दिया है।
अब असली इम्तिहान कुर्सी का नहीं, किरदार का है
अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनना किसी भी नेता के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।
लेकिन मोहसिन रजा के लिए यह जिम्मेदारी इसलिए और बड़ी है क्योंकि उन्होंने खुद वक्फ संपत्तियों को लेकर सवाल उठाए हैं।
अब उन्हें यह साबित करना होगा कि—
सवाल उठाना आसान था, जवाब तलाशना भी उतना ही मजबूत होगा।
अगर वक्फ संपत्तियों की जांच आगे बढ़ती है और रिकॉर्ड का सच सामने आता है, तो यह उनकी नई भूमिका की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा सकता है।
और अगर मामला केवल बयान और कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गया तो सवाल भी उठेंगे—
“जिसने वक्फ का हिसाब मांगा था, उसके हाथ में हिसाब की निगरानी का मौका आया था—फिर नतीजा क्या निकला?”
🔥 तहलका टुडे का सवाल
“मोहसिन रजा ने वक्फ की 70 हजार से ज्यादा संपत्तियों का हिसाब मांगा था… अब उनके पास अल्पसंख्यक आयोग की कमान है।
क्या यह सिर्फ एक नियुक्ति है या ‘गुमशुदा हिसाब’ तलाशने का मौका भी?”
मंत्री रहे।
हज कमेटी संभाली।
वक्फ पर SIT की मांग उठाई।
अब अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बने।
हज कमेटी संभाली।
वक्फ पर SIT की मांग उठाई।
अब अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष बने।




