विशेष खोजी श्रृंखला | भाग–2 | तहलका टुडे
सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ। किसी पुरानी इमारत की कहानी जब अदालतों तक पहुंचती है, तो उसके पीछे सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं होते। वहां जमीन होती है, मालिकाना हक होता है, विरासत होती है और कभी-कभी ऐसे सवाल भी होते हैं जिनका जवाब कई पीढ़ियां तलाशती रहती हैं।
गोलागंज का मलका-ए-जमानी इमामबाड़ा भी ऐसी ही एक कहानी का हिस्सा है।
एक समय था जब इस इमामबाड़े के सामने पांच दरवाजे हुआ करते थे। दाईं ओर मस्जिद थी। लाखौरी ईंटों की मोटी दीवारें और विशाल शहतीर इसकी पहचान थे। आज ऐतिहासिक पुस्तक ‘शहर-ए-लखनऊ’ के विवरण में इस इमारत के खंडहरों, उसके बड़े हिस्से पर बन चुके मकानों और मिट्टी में दबे अवशेषों का जिक्र मिलता है। उसी विवरण के अनुसार, 22 दिसंबर 1843 को मलका-ए-जमानी के इंतकाल के बाद उन्हें इसी इमामबाड़े में दफन किया गया था।
इतिहास की किताब में दर्ज ये पंक्तियां पढ़ते हुए शायद ही कोई सोच सके कि आने वाले समय में इस जगह की पहचान और वर्तमान स्थिति को लेकर इतने सवाल खड़े होंगे।
लेकिन आज सवाल यही है—**जिस इमारत का इतिहास दर्ज है, क्या उसकी जमीन और उसके बचे हुए निशानों का पूरा हिसाब भी दर्ज है?**
महमूदाबाद एस्टेट से जुड़ती है कहानी
मलका-ए-जमानी इमामबाड़े का इतिहास केवल धार्मिक और स्थापत्य विरासत तक सीमित नहीं रहा। महमूदाबाद एस्टेट से जुड़ी संपत्तियों के विवाद ने भी इस कहानी को कानूनी संदर्भ दिया।
21 अक्टूबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने *Union of India & Another v. Raja Mohammed Amir Mohammad Khan* मामले में महमूदाबाद एस्टेट से संबंधित ‘Enemy Property’ विवाद पर फैसला सुनाया। यह मामला संपत्ति, उत्तराधिकार और संबंधित कानूनी अधिकारों के सवालों से जुड़ा था।
इसी दौर में प्रकाशित *टाइम्स ऑफ इंडिया* की रिपोर्ट में गोलागंज स्थित ‘Malka Zamania Imambara’ का उल्लेख महमूदाबाद की उन संपत्तियों में किया गया था जिनकी स्थिति इस विवाद के संदर्भ में चर्चा में थी।
यह ऐतिहासिक संदर्भ महत्वपूर्ण है, लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के व्यापक महमूदाबाद संपत्ति विवाद का फैसला और मलका-ए-जमानी इमामबाड़े के वर्तमान स्वामित्व या कब्जे की स्थिति एक ही प्रश्न नहीं हैं। इमामबाड़े के संबंध में अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए संबंधित संपत्ति की मूल अनुसूची, राजस्व रिकॉर्ड, वक्फ दस्तावेज और बाद के आदेशों की अलग-अलग जांच जरूरी है।
यानी अदालत का फैसला इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, लेकिन उससे आज की जमीन की पूरी स्थिति अपने आप साबित नहीं हो जाती।
वक्फ रिकॉर्ड में क्या दर्ज है?
इस कहानी में एक और महत्वपूर्ण सुराग सामने आता है।
एक पुराने ऑनलाइन वक्फ-संकलन में **“Masjid & Imambara Malka Zamaniya”** नाम की प्रविष्टि क्रमांक **213/1768** के साथ दिखाई देती है।
यदि इस प्रविष्टि की पुष्टि मूल सरकारी वक्फ रजिस्टर और संबंधित दस्तावेजों से हो जाती है, तो यह संपत्ति की पहचान और आगे की जांच के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
यहीं से यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के सामने कुछ सीधे सवाल खड़े होते हैं।
क्या बोर्ड के मूल रिकॉर्ड में मलका-ए-जमानी इमामबाड़ा इसी नाम से दर्ज है? यदि हां, तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है? संपत्ति का क्षेत्रफल कितना है? उसकी सीमाएं कहां तक हैं? वर्तमान में उसका मुतवल्ली कौन है? मौके पर किसका कब्जा है? और आखिरी बार उसका भौतिक निरीक्षण कब किया गया?
क्योंकि वक्फ संपत्ति की पहचान केवल रजिस्टर में नाम दर्ज होने से पूरी नहीं होती। उसकी वास्तविक स्थिति, सीमांकन, प्रबंधन और सुरक्षा की जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
क्या इमामबाड़ा सिर्फ रिकॉर्ड में रह जाएगा?
इतिहास की विडंबना देखिए।
कभी एक शानदार इमारत खड़ी थी। आज उसका बड़ा हिस्सा नहीं बचा। पुस्तक में उसके पांच दरवाजों का जिक्र मिलता है, लेकिन वर्तमान में उन दरवाजों की मूल स्थिति क्या है, कितने स्थापत्य अवशेष सुरक्षित हैं और कितनी जमीन पर बाद में निर्माण हुआ—इन सवालों के जवाब के लिए स्थल का विस्तृत सर्वे आवश्यक है।
क्या कभी पुराने नक्शों और मौजूदा स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन कराया गया?
क्या इमामबाड़े की मूल सीमा का सीमांकन हुआ?
क्या वहां मौजूद ऐतिहासिक अवशेषों की सूची तैयार की गई?
क्या मलका-ए-जमानी की कब्र की वर्तमान स्थिति का आधिकारिक निरीक्षण हुआ?
अगर ऐसा सर्वे हुआ है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए। यदि नहीं हुआ, तो अब इसमें देरी क्यों?
ये सवाल किसी संस्था को पहले से दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संपत्ति की स्थिति स्पष्ट करने के लिए हैं जिसके बारे में पुरानी पुस्तकें आज भी गवाही देती हैं।
शिया वक्फ बोर्ड की जवाबदेही कहां से शुरू होती है?
यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष अली जैदी और बोर्ड के संबंधित अधिकारियों से इस मामले में दस्तावेजी जवाब अपेक्षित है।
यदि मलका-ए-जमानी इमामबाड़ा बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज है, तो उसकी वर्तमान स्थिति पर बोर्ड का आधिकारिक पक्ष सामने आना चाहिए।
क्या बोर्ड के पास संपत्ति की नवीनतम तस्वीरें हैं?
क्या किसी अधिकारी ने स्थल का निरीक्षण किया?
क्या संपत्ति के कब्जे और सीमांकन को लेकर कोई विवाद दर्ज है?
क्या निर्माण या अतिक्रमण के संबंध में कोई शिकायत प्राप्त हुई?
यदि शिकायत आई, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?
और यदि कोई शिकायत नहीं आई, तो क्या बोर्ड ने स्वयं इस ऐतिहासिक संपत्ति की स्थिति जानने का प्रयास किया?
ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि संपत्ति की सुरक्षा के लिए केवल कागजी प्रविष्टि पर्याप्त नहीं होती। जमीन पर क्या मौजूद है, उसकी सीमा कहां है और उसका उपयोग किस प्रकार हो रहा है—यह जानना भी जरूरी है।
अली जैदी या बोर्ड के किसी अधिकारी की व्यक्तिगत मिलीभगत , बोर्ड से रिकॉर्ड की उपलब्धता क्या है
यदि संपत्ति सुरक्षित है, तो दस्तावेज सामने आने चाहिए। यदि कोई अनियमितता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
एलडीए के सामने भी उठते हैं सवाल
इस कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष लखनऊ विकास प्राधिकरण है।
गोलागंज में किसी भी वर्तमान निर्माण की वैधता का प्रश्न संबंधित भूखंड, स्वीकृत नक्शे, भूमि के उपयोग और लागू नियमों के आधार पर ही तय किया जा सकता है।
मलका-ए-जमानी इमामबाड़े के परिसर या उससे संबंधित भूमि पर यदि नया निर्माण हुआ है या हो रहा है, तो यह पता लगाना जरूरी है कि वह किस भूखंड पर है और उसके लिए क्या अनुमति दी गई है।
क्या उस स्थान का कोई स्वीकृत मानचित्र मौजूद है?
किस तारीख को अनुमति दी गई?
क्या निर्माण का क्षेत्र स्वीकृत नक्शे से मेल खाता है?
क्या किसी ऐतिहासिक अवशेष या धार्मिक स्थल की स्थिति को ध्यान में रखा गया?
क्या कोई शिकायत एलडीए के समक्ष आई?
क्या मौके का निरीक्षण हुआ?
यदि निर्माण अनधिकृत पाया गया, तो क्या कार्रवाई की गई?
और यदि निर्माण नियमों के अनुरूप है, तो संबंधित स्वीकृति और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों न की जाए?
इन प्रश्नों के उत्तर एलडीए के आधिकारिक रिकॉर्ड से ही मिल सकते हैं। केवल निर्माण देखकर उसे अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा; उसी तरह, बिना जांच किसी निर्माण को वैध मान लेना भी सही नहीं है।
क्या बिल्डरों की नजर ऐतिहासिक जमीन पर है?
स्थानीय स्तर पर इस स्थल की वर्तमान स्थिति और निर्माण को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ आशंकाएं इसे बिल्डरों और भू-माफिया की गतिविधियों से जोड़ती हैं।
फिर भी एक सवाल ऐसा है जिसे टाला नहीं जा सकता—
**क्या गोलागंज के इस ऐतिहासिक स्थल की वर्तमान स्थिति की कभी संयुक्त और निष्पक्ष जांच हुई है?**
अगर हुई है, तो उसका परिणाम जनता के सामने आना चाहिए। यदि नहीं हुई, तो जिला प्रशासन, वक्फ विभाग और एलडीए को मिलकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यही वह रास्ता है जिससे किसी भी गलत गतिविधि का पता लगाया जा सकता है और साथ ही उन लोगों के अधिकारों की रक्षा भी की जा सकती है जिन पर बिना प्रमाण आरोप लगाए जा रहे हों।
इतिहास को बचाने के लिए पांच दस्तावेज जरूरी
इस पूरे मामले की निष्पक्ष पड़ताल के लिए पांच प्रकार के दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण होंगे।
पहला—मूल वक्फ रिकॉर्ड: संपत्ति का पंजीकरण, नाम, क्षेत्रफल, सीमाएं और प्रबंधन से संबंधित दस्तावेज।
दूसरा—राजस्व अभिलेख: संबंधित गाटा या भूखंड संख्या, खतौनी, नक्शा, स्वामित्व और वर्तमान दर्ज स्थिति।
तीसरा—एलडीए का रिकॉर्ड: स्वीकृत मानचित्र, निर्माण अनुमति, निरीक्षण रिपोर्ट, नोटिस और कार्रवाई संबंधी आदेश।
चौथा—ऐतिहासिक दस्तावेज: पुराने नक्शे, तस्वीरें, पुस्तकों में दर्ज विवरण और इमामबाड़े के मूल स्वरूप के प्रमाण।
पांचवां—स्थल निरीक्षण रिपोर्ट: वर्तमान निर्माण, बचे हुए अवशेषों, कब्र की स्थिति और मूल इमारत की सीमा का तुलनात्मक विवरण।
इन दस्तावेजों को एक साथ रखकर देखा जाए तो पता लगाया जा सकता है कि इतिहास में वर्णित इमारत की आज क्या स्थिति है, भूमि पर किसका अधिकार दर्ज है और किसी संभावित अनियमितता की जांच किस दिशा में आगे बढ़नी चाहिए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, मलका-ए-जमानी इमामबाड़े का मामला केवल एक पुरानी इमारत का मामला नहीं है। यह ऐतिहासिक दस्तावेजों, धार्मिक विरासत, जमीन की स्थिति और सरकारी विभागों की जवाबदेही से जुड़ा विषय है।
सेव वक्फ इंडिया के प्रवक्ता मौलाना इफ्तिखार हुसैन इंकलाबी कहते है
राज्य सरकार से मांग है कि जिला प्रशासन, राजस्व विभाग, यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड और एलडीए की एक संयुक्त टीम बनाकर इस स्थल की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
मूल वक्फ रिकॉर्ड की पुष्टि हो। जमीन का सीमांकन कराया जाए। वर्तमान निर्माण की वैधता जांची जाए। पुराने स्थापत्य अवशेषों और मलका-ए-जमानी की कब्र की स्थिति का दस्तावेजी सर्वे कराया जाए।
यदि किसी प्रकार का अनधिकृत निर्माण या नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो। यदि कोई अनियमितता नहीं मिलती, तो संबंधित विभाग अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करके स्थिति स्पष्ट करें।
यह मांग किसी व्यक्ति को पहले से दोषी घोषित करने की नहीं, बल्कि सच सामने लाने की है।
कागजों से आगे बढ़कर जमीन को देखना होगा
गोलागंज की उस गली में आज खड़े होकर शायद कोई आसानी से कल्पना भी न कर सके कि यहां कभी एक शानदार इमामबाड़ा था। इतिहास की पुस्तक में उसके पांच दरवाजे, मस्जिद, मोटी लाखौरी ईंटों की दीवारें और विशाल शहतीर दर्ज हैं। उसी पुस्तक में यह भी दर्ज है कि मलका-ए-जमानी को इसी इमामबाड़े में दफन किया गया था।
इतिहास की यह गवाही आज के प्रशासन के लिए एक जिम्मेदारी भी है।
लेकिन जिम्मेदारी निभाने के लिए सिर्फ भावनाएं काफी नहीं हैं। दस्तावेज चाहिए। स्थल का सर्वे चाहिए। संबंधित विभागों का आधिकारिक पक्ष चाहिए और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक होने चाहिए।
क्योंकि अगर किसी ऐतिहासिक स्थल की पहचान धीरे-धीरे मिट रही है, तो उसके पीछे का कारण जानना जरूरी है। और यदि जमीन पर सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो उसे भी प्रमाण सहित स्पष्ट किया जाना चाहिए।
मलका-ए-जमानी की कहानी का अगला अध्याय अब सरकारी रिकॉर्ड में तलाशा जाना चाहिए।
किसके नाम दर्ज है जमीन? किसने नक्शा पास किया? किसने निरीक्षण किया? क्या कोई शिकायत लंबित है? और सबसे अहम—क्या उस इमामबाड़े के बचे हुए निशानों और कब्र को सुरक्षित रखने की कोई ठोस योजना है?
इन सवालों के जवाब सामने आएंगे, तभी यह तय हो सकेगा कि गोलागंज में इतिहास की इस अमानत के साथ वास्तव में क्या हुआ।
क्योंकि इतिहास को बचाने का पहला कदम आरोप लगाना नहीं, सच का पता लगाना है। और सच सामने लाने की जिम्मेदारी अब संबंधित विभागों की है।
तहलका टुडे इस मामले में यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड, लखनऊ विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित करेगा।




