तहलका टुडे टीम/हसनैन मुस्तफा
लखनऊ। शिया क़ौम की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत आज ऐसे दौर से गुजर रही है, जब उसके संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कहीं वक़्फ़ संपत्तियों के रिकॉर्ड को लेकर विवाद हैं, कहीं ऐतिहासिक इमारतों के रखरखाव की चिंता है, कहीं मरम्मत और निर्माण की प्रक्रिया में विभागीय अनुमति की समस्या सामने आती है, तो कहीं जिम्मेदार संस्थाओं की सक्रियता पर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अपनी विरासत की हिफ़ाज़त के लिए संगठित प्रयास आखिर कौन करेगा?
लखनऊ में शिया समुदाय से जुड़े 10 दर्जन से अधिक जनसेवा केंद्रों की मौजूदगी को यदि एक साझा सामाजिक अभियान से जोड़ दिया जाए, तो यह व्यवस्था क़ौम की अनेक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन इसके लिए केवल केंद्रों का मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। उनके संचालकों में सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास, आपसी समन्वय और एक स्पष्ट कार्ययोजना भी जरूरी है।
अब समय आ गया है कि हर अंजुमन का अपना जनसेवा केंद्र हो और हर जनसेवा केंद्र अपनी अंजुमन के क्षेत्र की समस्याओं के समाधान में सहयोग करे।
यह पहल केवल ऑनलाइन फॉर्म भरने या सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने तक सीमित न रहे, बल्कि वक़्फ़ रिकॉर्ड, धार्मिक स्थलों के संरक्षण, सरकारी शिकायतों, आरटीआई और जनप्रतिनिधियों से संवाद जैसे कामों को भी अपने दायरे में शामिल करे।
करबला दियानतुद्दौला की मीनार गिरने की खबर ने बढ़ाई चिंता
लखनऊ की धार्मिक विरासत से जुड़े स्थलों की स्थिति को लेकर स्थानीय स्तर पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। करबला दियानतुद्दौला की एक मीनार गिरने की खबर ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया है। यदि किसी ऐतिहासिक धार्मिक स्थल का हिस्सा गिरता है, तो यह पता लगाना आवश्यक है कि उसकी वास्तविक स्थिति क्या थी, रखरखाव की जिम्मेदारी किसके पास थी और क्या समय रहते तकनीकी निरीक्षण तथा जरूरी मरम्मत की गई थी।
इस घटना के कारणों की आधिकारिक पुष्टि और संबंधित विभाग की रिपोर्ट सामने आना जरूरी है। लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि धार्मिक स्थलों की नियमित निगरानी के लिए कोई व्यवस्थित व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?
काज़मैन रोज़े की मरम्मत और उसकी मौजूदा हालत को लेकर भी संबंधित विभागों से स्पष्ट जानकारी माँगी जानी चाहिए। शाह नजफ़, गार वाली करबला तथा छोटे-बड़े इमामबाड़ों के आसपास के हिस्सों और परिसरों की स्थिति का भी स्थलीय निरीक्षण कराया जाना चाहिए।
यदि कहीं दरारें, टूट-फूट, जलभराव या किसी हिस्से के गिरने का खतरा है, तो तस्वीरों और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर सक्षम प्राधिकारी से कार्रवाई की माँग की जाए। किसी संरक्षित स्मारक में मरम्मत का काम संबंधित विभाग की अनुमति और तकनीकी दिशा-निर्देशों के अनुसार ही होना चाहिए।
सवाल यह है कि इन स्थलों की स्थिति का नियमित रिकॉर्ड कौन तैयार करता है? मरम्मत की जरूरत सामने आने पर आवेदन कौन देता है? और यदि आवेदन लंबित रह जाए, तो उसका पीछा कौन करता है?
यही वह जगह है जहाँ अंजुमनों और जनसेवा केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
औक़ाफ़ के रिकॉर्ड पर सवाल, क़ौम को चाहिए दस्तावेज़ी जवाब
उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की कार्यप्रणाली और वक़्फ़ संपत्तियों के रिकॉर्ड को लेकर समय-समय पर गंभीर आरोप और सवाल सामने आते रहे हैं। उम्मीद पोर्टल पर पंजीकरण, पुराने रिकॉर्ड के मिलान और संपत्तियों की कानूनी स्थिति जैसे मुद्दों ने मुतवल्लियों तथा धार्मिक संस्थाओं के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं।
लेकिन इस विषय पर केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक वक़्फ़ की पंजीकरण संख्या, वक़्फ़नामा, पुराने सरकारी अभिलेख, संपत्ति का विवरण और पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी का मिलान किया जाना चाहिए।
यह समझना भी आवश्यक है कि पोर्टल पर किसी प्रविष्टि का रद्द या अनुपलब्ध होना अपने आप में वक़्फ़ के कानूनी अस्तित्व की समाप्ति का प्रमाण नहीं है। प्रत्येक मामले की स्थिति संबंधित आदेशों और दस्तावेज़ों के आधार पर जाँची जानी चाहिए।
यदि किसी संपत्ति का रिकॉर्ड गलत तरीके से हटाए जाने का संदेह है, तो संबंधित अंजुमन या मुतवल्ली को दस्तावेज़ जुटाकर बोर्ड से लिखित स्पष्टीकरण माँगना चाहिए। जवाब न मिलने पर लागू नियमों के अनुसार आरटीआई, शिकायत निवारण और अन्य कानूनी उपाय अपनाए जा सकते हैं।
आफताब ए शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी साहब और सेव वक़्फ़ इंडिया से जुड़े लोगों की ओर से वक़्फ़ संबंधी मुद्दों पर आवाज़ उठाए जाने के बीच यह सवाल भी उठता है कि क्या बाकी सामाजिक संस्थाएँ और अंजुमनें अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हैं?
किसी एक धार्मिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या संगठन पर पूरी क़ौम की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। व्यापक बदलाव के लिए स्थानीय स्तर पर दस्तावेज़ी काम और निरंतर निगरानी आवश्यक है।
हर अंजुमन का हो जनसेवा केंद्र: एक नई सामाजिक पहल
लखनऊ में शिया समुदाय से जुड़े 120 से अधिक जनसेवा केंद्रों की मौजूदगी का दावा एक संभावित संगठनात्मक ताकत की ओर संकेत करता है। इनकी वास्तविक संख्या, संचालन और उपलब्ध सेवाओं का सर्वेक्षण कराकर एक सत्यापित सूची तैयार की जानी चाहिए।
यदि ये केंद्र आपसी समन्वय के साथ काम करें, तो धार्मिक और सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए एक उपयोगी नेटवर्क बनाया जा सकता है।
इसी उद्देश्य से एक प्रस्ताव सामने आना चाहिए—हर अंजुमन का अपना जनसेवा केंद्र हो।
जहाँ किसी अंजुमन के पास पहले से केंद्र है, वहाँ उसकी सेवाओं को सामाजिक समस्याओं के समाधान से जोड़ा जाए। जहाँ केंद्र नहीं है, वहाँ स्थानीय जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार नया केंद्र स्थापित करने की संभावना देखी जाए। यदि अलग कार्यालय बनाना संभव न हो, तो किसी मौजूदा केंद्र के साथ साझेदारी करके भी यह व्यवस्था शुरू की जा सकती है।
हर अंजुमन का जनसेवा केंद्र अपने क्षेत्र की धार्मिक संपत्तियों और सार्वजनिक समस्याओं का दस्तावेज़ी रिकॉर्ड तैयार करने में सहयोग कर सकता है। यह रिकॉर्ड संबंधित मुतवल्ली, प्रबंध समिति और सक्षम विभाग से सत्यापित कराया जाए, ताकि अफवाहों और अपुष्ट आरोपों के बजाय तथ्य सामने आएँ।
जनसेवा केंद्र क्या-क्या काम कर सकते हैं?
1. वक़्फ़ दस्तावेज़ सहायता: पुराने वक़्फ़नामे, पंजीकरण संख्या, उपलब्ध अभिलेख और पोर्टल पर दर्ज विवरण को व्यवस्थित करने में सहायता।
2. मरम्मत और संरक्षण संबंधी शिकायतें: जर्जर इमारतों की तस्वीरें, शिकायत-पत्र और निरीक्षण के अनुरोध तैयार करने में मदद।
3. आरटीआई आवेदन: लागू कानून के अनुसार निरीक्षण रिपोर्ट, मरम्मत प्रस्ताव, बजट, स्वीकृति और लंबित कार्रवाई की जानकारी माँगने में सहायता।
4. आईजीआरएस और जनसुनवाई: संबंधित विभाग को शिकायत भेजना, प्राप्ति संख्या सुरक्षित रखना और निस्तारण की स्थिति देखना।
5. सरकारी योजनाओं की जानकारी: जरूरतमंद परिवारों को पात्रता के अनुसार उपलब्ध सरकारी योजनाओं और प्रमाणपत्र संबंधी सेवाओं की जानकारी देना।
6. कानूनी सहायता से संपर्क: वक़्फ़ विवाद, रिकॉर्ड में त्रुटि या विभागीय निष्क्रियता के मामलों में जरूरत पड़ने पर योग्य अधिवक्ता तक पहुँच बनाने में मदद।
7. शिकायतों की निगरानी: प्रत्येक मामले का रजिस्टर बनाना, संबंधित विभाग और अधिकारी का विवरण दर्ज करना तथा समय-समय पर प्रगति की समीक्षा करना।
इस प्रकार जनसेवा केंद्रों की भूमिका केवल ऑनलाइन सेवाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे नागरिक जागरूकता और सामाजिक जवाबदेही को मजबूत करने में भी योगदान दे सकेंगे।
बने एक साझा क़ौमी कमांड सेंटर
यदि 120 से अधिक जनसेवा केंद्र अलग-अलग काम करते रहें और उनके बीच कोई समन्वय न हो, तो उनकी सामूहिक क्षमता का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा। इसलिए अंजुमनों और केंद्र संचालकों की सहमति से एक साझा समन्वय समिति बनाई जा सकती है।
इसका उद्देश्य किसी संस्था पर नियंत्रण करना नहीं, बल्कि सबके काम को एक दिशा देना होना चाहिए।
इस समिति में अंजुमनों के प्रतिनिधि, जनसेवा केंद्र संचालक, वक़्फ़ मामलों के जानकार, योग्य अधिवक्ता, तकनीकी विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल किए जा सकते हैं। महिलाओं और नौजवानों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
समिति के तहत एक साझा शिकायत रजिस्टर या डिजिटल रिकॉर्ड बनाया जा सकता है। उसमें हर मामले का संक्षिप्त विवरण, संबंधित संपत्ति, जिम्मेदार विभाग, शिकायत की तारीख, प्राप्ति संख्या और कार्रवाई की स्थिति दर्ज हो।
हर महीने समीक्षा बैठक आयोजित की जाए। जिन मामलों में कार्रवाई नहीं हुई है, उनके संबंध में संबंधित अधिकारियों से लिखित जवाब माँगा जाए। जरूरत पड़ने पर जिलाधिकारी, नगर निगम, वक़्फ़ बोर्ड या पुरातत्व विभाग के समक्ष संयुक्त प्रतिनिधिमंडल भेजा जाए।
इस व्यवस्था को पारदर्शी रखना भी उतना ही जरूरी है। शिकायतकर्ता की निजी जानकारी सुरक्षित रखी जाए, अपुष्ट आरोप सार्वजनिक न किए जाएँ और किसी भी संपत्ति के दस्तावेज़ों में बदलाव या कानूनी निर्णय का अधिकार केवल सक्षम प्राधिकारी के पास ही रहे।
कमांड सेंटर का अर्थ किसी एक व्यक्ति की हुकूमत नहीं, बल्कि साझा नेतृत्व, स्पष्ट जिम्मेदारी और लगातार निगरानी होना चाहिए।
पुरातत्व विभाग और मरम्मत के मामलों में भी हो समन्वय
लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों के मामले में यह पहचानना जरूरी है कि कौन-सा स्थल किस विभाग के अधीन है और किसे उसकी मरम्मत की अनुमति देने का अधिकार है।
जहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण या अन्य सक्षम संरक्षण प्राधिकरण की अनुमति जरूरी हो, वहाँ अंजुमन और जनसेवा केंद्र आवेदन की प्रक्रिया में सहायता कर सकते हैं। वे तकनीकी निरीक्षण की माँग, मरम्मत प्रस्ताव की स्थिति और विभागीय पत्राचार का रिकॉर्ड रखने में सहयोग कर सकते हैं।
जहाँ किसी वक़्फ़ की प्रबंध समिति या मुतवल्ली रखरखाव के लिए जिम्मेदार है, वहाँ उनसे उपलब्ध रिकॉर्ड और प्रस्तावित कार्ययोजना की जानकारी माँगी जा सकती है।
इससे एक ओर धार्मिक भावनाओं के नाम पर नियमों की अनदेखी नहीं होगी, तो दूसरी ओर विभागीय प्रक्रिया के नाम पर किसी गंभीर समस्या को अनिश्चितकाल तक अनदेखा छोड़ने की संभावना भी कम करने में मदद मिलेगी।
सभासद से सांसद तक पहुँचे दस्तावेज़ी शिकायत
धार्मिक विरासत की हिफ़ाज़त केवल अंजुमनों या जनसेवा केंद्रों का काम नहीं है। अगर समाज में जागरूकता है तो स्थानीय सभासद, महापौर, विधायक, सांसद, विधान परिषद सदस्य और जिलाधिकारी भी संबंधित मामलों को सक्षम विभाग तक पहुँचाने और कार्रवाई की समीक्षा कराने में भूमिका निभा सकते हैं।
यदि किसी क्षेत्र में रोज़े या इमामबाड़े की हालत खराब है, तो संबंधित अंजुमन जनसेवा केंद्र की मदद से दस्तावेज़ तैयार कर सकती है। इसके बाद स्थानीय जनप्रतिनिधि और प्रशासन को संयुक्त ज्ञापन दिया जा सकता है।
ज्ञापन में केवल आरोप लगाने के बजाय स्पष्ट माँगें रखी जाएँ—स्थल का निरीक्षण, तकनीकी रिपोर्ट, मरम्मत की आवश्यकता, जिम्मेदार विभाग, उपलब्ध बजट और कार्रवाई की संभावित समय-सीमा।
इससे अधिकारियों के सामने समस्या का तथ्यात्मक विवरण जाएगा और शिकायतकर्ता के पास आगे की कार्रवाई के लिए लिखित रिकॉर्ड भी रहेगा।
90 दिनों में शुरू हो सकता है अभियान
यदि अंजुमनें और जनसेवा केंद्र वास्तव में इस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो शुरुआत एक सीमित लेकिन व्यवस्थित अभियान से की जा सकती है।
पहले 30 दिन: इच्छुक अंजुमनों और केंद्रों की सूची बनाई जाए। प्रत्येक केंद्र के प्रतिनिधि और संपर्क व्यक्ति तय हों। धार्मिक स्थलों तथा वक़्फ़ संपत्तियों की जानकारी जुटाने का प्रारूप तैयार किया जाए।
अगले 30 दिन: प्राथमिकता वाले स्थलों का निरीक्षण, उपलब्ध दस्तावेज़ों का संकलन और संबंधित विभागों को आवेदन भेजने का काम शुरू हो। तत्काल सुरक्षा जोखिम वाले मामलों को प्राथमिकता दी जाए।
अंतिम 30 दिन: लंबित शिकायतों की समीक्षा हो, जवाब न मिलने पर नियमानुसार आरटीआई या अन्य उपाय अपनाए जाएँ और अभियान की पहली सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट जारी की जाए।
यह योजना तभी प्रभावी होगी, जब इसमें शामिल संस्थाएँ स्वेच्छा से जिम्मेदारी स्वीकार करें और प्रत्येक गतिविधि का रिकॉर्ड रखें।
सवाल केवल अंजुमनों से नहीं, पूरी क़ौम से है
आखिर शिया समाज अपनी धार्मिक विरासत को बचाने के लिए कितने समय तक दूसरों की पहल का इंतजार करेगा? क्या हर अंजुमन अपने क्षेत्र की समस्याओं की सूची तैयार नहीं कर सकती? क्या हर जनसेवा केंद्र महीने में कुछ घंटे सामाजिक कार्यों के लिए नहीं दे सकता? क्या नौजवान सरकारी प्रक्रियाओं और दस्तावेज़ों की जानकारी लेकर अपने बुज़ुर्गों की मदद नहीं कर सकते?
यह काम किसी एक व्यक्ति, एक संगठन या एक धार्मिक नेतृत्व की आलोचना करके पूरा नहीं होगा। इसकी जरूरत एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें हर संस्था अपनी भूमिका निभाए और किसी समस्या को सामने लाने वाले व्यक्ति को अकेला न छोड़ दिया जाए।
यदि लखनऊ के जनसेवा केंद्रों की वास्तविक संख्या और उनकी क्षमता का सर्वेक्षण हो, हर अंजुमन को इस अभियान से जोड़ा जाए और एक साझा समन्वय व्यवस्था बने, तो धार्मिक विरासत के संरक्षण तथा सरकारी जवाबदेही के लिए एक मजबूत शुरुआत संभव है।
विरासत बचानी है तो अंजुमन और मोमिनीन को सक्रिय होना होगा
हमारी धार्मिक विरासत केवल अतीत की निशानी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। इमामबाड़े, रोज़े, करबलाएँ और वक़्फ़ संपत्तियाँ सुरक्षित रहें, इसके लिए भावनाओं के साथ दस्तावेज़, संगठन, तकनीकी जानकारी और कानूनी जागरूकता भी आवश्यक है।
हर अंजुमन का हो जनसेवा केंद्र, हर केंद्र का हो सामाजिक दायित्व और सभी को जोड़ने वाला एक पारदर्शी साझा मंच हो।
यदि ऐसा हो सके, तो लखनऊ में मौजूद जनसेवा केंद्रों का नेटवर्क क़ौमी विरासत की हिफ़ाज़त, सरकारी शिकायतों के निस्तारण और जरूरतमंद लोगों की सहायता में उपयोगी भूमिका निभा सकता है।
अब जरूरत केवल इस प्रस्ताव पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि इच्छुक अंजुमनों और जनसेवा केंद्र संचालकों को एक साथ बैठाकर इसे व्यवहार में उतारने की है।
क़ौम की ताकत केवल उसकी आबादी में नहीं, बल्कि उसके संगठन, जागरूकता और जवाबदेही में है। अपनी विरासत को बचाने का काम आज शुरू होगा, तभी आने वाली नस्लें कल इस पर गर्व कर सकेंगी।
अब खामोशी नहीं—दस्तावेज़, शिकायत, जवाबदेही और संगठित कार्रवाई चाहिए।




