तहलका टुडे | सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/मोहम्मद वसीक
लखनऊ, 18 अक्टूबर 2026।
लखनऊ के बहुचर्चित वक्फ अच्छे मिर्जा, पंजीकरण संख्या आई-987, औरंगाबाद जागीर से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण का फैसला उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लगभग 366 बीघा भूमि से जुड़े इस वक्फ के मुतवल्ली की नियुक्ति और प्रशासक के जरिए प्रबंधन को लेकर चल रहे विवाद में न्यायाधिकरण ने बोर्ड के विवादित आदेशों को निरस्त कर दिया है। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि मुतवल्ली की नियुक्ति का निर्णय वक्फनामा के प्रावधानों के अनुसार लिया जाए।
12 अक्टूबर 2026 को पारित इस फैसले को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, मुतवल्ली के अधिकारों और बोर्ड की प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वक्फनामा में मुतवल्ली नियुक्ति की व्यवस्था मौजूद है, तो संबंधित वक्फ के प्रबंधन में प्रशासक की नियुक्ति और उसके बने रहने की आवश्यकता किन परिस्थितियों में बनी रही?
पांच साल से प्रशासक के जरिए प्रबंधन, अब न्यायाधिकरण का हस्तक्षेप
इस प्रकरण में वादी सैयद सिब्तैन रिजवी ने अधिवक्ता मोहम्मद हुसैन रिजवी के जरिए न्यायाधिकरण के समक्ष अपनी याचिका में आरोप लगाया कि वक्फ के प्रबंधन में वक्फनामा की शर्तों का पालन नहीं किया गया और प्रशासक नियुक्त करने की कार्रवाई के कारण वक्फ के हित प्रभावित हुए। याचिकाकर्ता का पक्ष था कि वक्फ औलाद होने के कारण मुतवल्ली की नियुक्ति वक्फनामा में निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप होनी चाहिए।
याचिका में पूर्व में मुतवल्लियों और प्रशासकों की नियुक्ति, संबंधित आदेशों तथा वक्फ के प्रबंधन को लेकर विवादों का भी उल्लेख किया गया। वादी ने बोर्ड की कार्रवाई को चुनौती देते हुए मुतवल्ली नियुक्ति के लिए अपने आवेदन को अस्वीकार करने के आदेशों को निरस्त करने की मांग की थी।
न्यायाधिकरण ने 28 अप्रैल 2026 और 29 अप्रैल 2026 को पारित संबंधित आदेशों को अपास्त करते हुए मामले में नए सिरे से विधिसम्मत निर्णय लेने का निर्देश दिया। यह फैसला बोर्ड के लिए स्पष्ट संदेश है कि वक्फ के प्रबंधन से जुड़े निर्णय लागू कानून और वक्फनामा की शर्तों के अनुरूप होने चाहिए।
वक्फनामा की शर्तों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
न्यायाधिकरण के आदेश में वक्फनामा में दर्ज मुतवल्ली नियुक्ति की व्यवस्था पर विचार किया गया। वक्फनामा के उद्धृत अंश के अनुसार, पहले वाकिफ स्वयं मुतवल्ली रहेंगे, उसके बाद निर्धारित पारिवारिक उत्तराधिकार के अनुसार मुतवल्ली नियुक्त किए जाने की व्यवस्था है। परिवार में उपयुक्त व्यक्ति के चयन के संबंध में धार्मिक विद्वान और उनके उत्तराधिकारियों की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है।
न्यायाधिकरण ने इस व्यवस्था के संदर्भ में माना कि मुतवल्ली नियुक्ति के आवेदनों पर वक्फनामा के अनुसार विचार किया जाना चाहिए। आदेश में परिवार के सभी सदस्यों की सहमति को अनिवार्य शर्त मानने के आधार पर आवेदन खारिज किए जाने पर भी सवाल उठाया गया, क्योंकि ऐसी शर्त का उल्लेख वक्फनामा में होने के संबंध में पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।
इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायाधिकरण ने सैयद सिब्तैन रिजवी को सीधे मुतवल्ली नियुक्त कर दिया है। आदेश का सार यह है कि उनके और अन्य दावेदारों के आवेदनों पर विधि के अनुसार विचार करके वक्फनामा के अनुरूप निर्णय लिया जाए।
बोर्ड के अधिकारों और प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
न्यायाधिकरण के निर्णय में बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा अकेले पारित आदेश और बोर्ड की बैठक में अनुमोदन से संबंधित प्रश्न पर भी विचार किया गया। आदेश में वक्फ अधिनियम की धारा 32 के संदर्भ में कहा गया कि संबंधित विवाद के निस्तारण के लिए अध्यक्ष की प्रत्यायोजित शक्तियों का इस्तेमाल पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
न्यायाधिकरण ने इस आधार पर भी संबंधित आदेशों को विधिसम्मत नहीं माना और मामले को बोर्ड के पास पुनः निस्तारण के लिए भेजना आवश्यक समझा।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वक्फ संपत्ति का प्रबंधन केवल प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं है। इसमें वक्फनामा की शर्तें, लाभार्थियों के हित, मुतवल्ली की नियुक्ति की प्रक्रिया और संबंधित प्राधिकारी के कानूनी अधिकार सभी महत्वपूर्ण हैं।
क्या 366 बीघा की संपत्ति के खुर्द-बुर्द होने की जांच होगी?
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में वक्फ संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने और उसे खुर्द-बुर्द किए जाने के आरोप लगाए हैं। संपत्ति के कुछ हिस्सों के सरकारी अधिग्रहण और मुआवजे से संबंधित विषयों का भी उल्लेख किया गया है।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और राजस्व अभिलेखों, अधिग्रहण संबंधी दस्तावेजों, पट्टों तथा आय-व्यय के रिकॉर्ड की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, न्यायाधिकरण का उपलब्ध आदेश अपने आप में यह अंतिम निष्कर्ष नहीं देता कि 366 बीघा भूमि का अवैध हस्तांतरण हुआ है या किसी व्यक्ति ने भ्रष्टाचार किया है। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित दस्तावेजों और जांच से ही हो सकती है।
फिर भी, इतने बड़े वक्फ के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद के बाद बोर्ड की जवाबदेही का प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है।
अली जैदी के नेतृत्व वाले बोर्ड से जवाबदेही की मांग
इस प्रकरण को लेकर उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली जैदी के नेतृत्व में बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। विवादित आदेशों के निरस्त होने के बाद बोर्ड को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रशासक की नियुक्ति किन कानूनी आधारों पर की गई, मुतवल्ली नियुक्ति की प्रक्रिया में क्या बाधाएं थीं और न्यायाधिकरण के निर्देशों का अनुपालन किस समयसीमा में किया जाएगा।
यदि वक्फ संपत्ति के प्रबंधन में अनियमितताओं के आरोपों के समर्थन में दस्तावेज सामने आते हैं, तो सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। सार्वजनिक और धार्मिक न्यास संपत्तियों के मामले में पारदर्शिता, नियमित लेखा-परीक्षा और जवाबदेही आवश्यक है।
बोर्ड और चेयरमैन का पक्ष: इस खबर के प्रकाशन के समय संबंधित पक्ष का आधिकारिक जवाब उपलब्ध नहीं है। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
अब आगे क्या?
न्यायाधिकरण ने वादी तथा अन्य दावेदारों के आवेदनों पर विधि के अनुसार निर्णय लेने और प्रशासक नियुक्त करने के बजाय वक्फनामा के अनुरूप मुतवल्ली नियुक्ति पर आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
अब बोर्ड के सामने तीन प्रमुख जिम्मेदारियां हैं:
- न्यायाधिकरण के आदेश का अनुपालन करते हुए मुतवल्ली नियुक्ति के सभी दावों पर नियमानुसार निर्णय लेना।
- वक्फ की संपत्ति, आय, व्यय, अधिग्रहण और प्रबंधन से संबंधित अभिलेखों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
- संपत्ति के खुर्द-बुर्द किए जाने संबंधी आरोपों की तथ्यात्मक जांच कराना और दोष प्रमाणित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई करना।
वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में जवाबदेही जरूरी
366 बीघा भूमि से जुड़े वक्फ अच्छे मिर्जा का विवाद केवल एक मुतवल्ली की नियुक्ति का मामला नहीं रह गया है। यह वक्फनामा की शर्तों, बोर्ड की प्रशासनिक शक्तियों और धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।
न्यायाधिकरण के आदेश ने संबंधित विवाद में बोर्ड के दो आदेशों को निरस्त कर नए सिरे से निर्णय लेने का रास्ता स्पष्ट किया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड आदेश का अनुपालन कैसे करता है और वक्फ की संपत्ति तथा लाभार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाता है।
आवाम का सवाल: जब वक्फनामा में मुतवल्ली नियुक्ति की व्यवस्था दर्ज है, तो विवादित प्रशासकीय व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ी और इतने लंबे समय तक चले विवाद का पारदर्शी समाधान कब होगा?
स्रोत: उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ का वाद संख्या 449/2026, सैयद सिब्तैन रिजवी बनाम उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड आदि, दिनांक 12 अक्टूबर 2026 का आदेश देखिए







