तहलका टुडे इंटरनेशनल डेस्क/सैयद रिज़वान मुस्तफा
दुशांबे/नई दिल्ली।
तहजीब, अदब, मोहब्बत और गंगा-जमुनी संस्कृति की पहचान रखने वाली उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सांसद एवं भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की शासनाध्यक्ष परिषद की बैठक के दौरान ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति महामहिम मोहम्मद रज़ा आरिफ से मुलाकात की।
यह मुलाकात महज दो वरिष्ठ नेताओं के बीच औपचारिक भेंट नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर संवाद, आपसी सम्मान और कूटनीतिक संपर्क की अहमियत को रेखांकित करने वाला घटनाक्रम है। राजनाथ सिंह ने इस मुलाकात की जानकारी सोशल मीडिया मंच X पर साझा करते हुए लिखा, “Pleasure to meet H.E. Mr Mohammad Reza Aref, First Vice President of Iran.”
राजनाथ सिंह की इस मुलाकात को भारत और ईरान के बीच पारंपरिक संबंधों, क्षेत्रीय सहयोग तथा आपसी संवाद के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।
लखनऊ की तहजीब और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी
लखनऊ केवल एक शहर नहीं, बल्कि अदब, तहजीब, आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यहां की पहचान ऐसी परंपरा से जुड़ी है, जिसमें बातचीत का सलीका, बड़ों का सम्मान, मेहमाननवाजी और इंसानियत को विशेष महत्व दिया जाता है।
इसी लखनऊ का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनाथ सिंह आज देश के रक्षा मंत्री के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं। दुशांबे में ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति से उनकी मुलाकात इस बात की याद दिलाती है कि कूटनीति में संवाद और परस्पर सम्मान की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है।
लखनऊ की पहचान उसकी विविधतापूर्ण संस्कृति और साझा विरासत से भी है। शहर की शिया आबादी, इमामबाड़ों, मजलिसों और ईरान के साथ ऐतिहासिक धार्मिक-सांस्कृतिक संपर्कों ने भारत और ईरान के बीच जनस्तरीय रिश्तों को भी विशेष आयाम दिया है। इन रिश्तों का सम्मान दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक समझ और जनता के आपसी जुड़ाव को और मजबूत कर सकता है।
भारत और ईरान: इतिहास से भविष्य तक
भारत और ईरान के बीच सभ्यता, साहित्य, भाषा, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का लंबा इतिहास रहा है। फारसी भाषा और साहित्य ने भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक परंपराओं पर गहरा प्रभाव डाला है। वहीं, भारत की विविधता और सांस्कृतिक विरासत ईरान के साथ ऐतिहासिक संपर्कों की अनेक यादें संजोए हुए है।
आज के दौर में दोनों देशों के संबंधों में व्यापार, परिवहन, क्षेत्रीय संपर्क, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। भारत के लिए मध्य एशिया तक बेहतर संपर्क के अवसर और ईरान के लिए क्षेत्रीय व्यापारिक सहयोग की संभावनाएं विशेष महत्व रखती हैं।
ऐसे में SCO जैसे बहुपक्षीय मंच विभिन्न देशों के नेताओं को आपसी विचार-विमर्श और सहयोग के नए अवसर तलाशने का अवसर प्रदान करते हैं।
दुशांबे में SCO बैठक का महत्व
ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन की शासनाध्यक्ष परिषद की बैठक में सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग, व्यापार, परिवहन, संपर्क व्यवस्था और क्षेत्रीय विकास जैसे विषय प्रमुख रहे।
इस तरह की बैठकों में औपचारिक कार्यवाही के साथ-साथ विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की द्विपक्षीय मुलाकातें भी महत्वपूर्ण होती हैं। इनके माध्यम से आपसी प्राथमिकताओं को समझने, संवाद बनाए रखने और भविष्य के सहयोग की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर मिलता है।
राजनाथ सिंह और मोहम्मद रज़ा आरिफ की मुलाकात भी इसी व्यापक कूटनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
शांति, सम्मान और संवाद का संदेश
आज जब दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक तनाव, सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और आर्थिक अनिश्चितताएं मौजूद हैं, तब देशों के बीच संवाद की निरंतरता और आपसी सम्मान की भावना का महत्व और बढ़ जाता है।
भारत और ईरान जैसे ऐतिहासिक संपर्क रखने वाले देशों के बीच उच्चस्तरीय मुलाकातें इस संवाद को बनाए रखने का अवसर प्रदान करती हैं। इन संबंधों का लाभ तभी व्यापक रूप से सामने आएगा, जब सांस्कृतिक निकटता के साथ-साथ व्यापार, क्षेत्रीय संपर्क और जनहित से जुड़े क्षेत्रों में भी ठोस प्रगति हो।
लखनऊ की तहजीब हमें यही सिखाती है कि सम्मानजनक संवाद मतभेदों के बावजूद रिश्तों को आगे बढ़ाने का रास्ता खोल सकता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भी यही सिद्धांत देशों के बीच विश्वास और सहयोग की बुनियाद बन सकता है।
तहजीब की नगरी से दुनिया के मंच तक
लखनऊ के सांसद और भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रज़ा आरिफ से दुशांबे में हुई मुलाकात ने भारत–ईरान संबंधों पर ध्यान आकर्षित किया है। इस मुलाकात का वास्तविक महत्व आने वाले समय में दोनों देशों के संवाद, सहयोग और आधिकारिक स्तर पर सामने आने वाले परिणामों से और स्पष्ट होगा।
संदेश साफ है—रिश्तों की मजबूती केवल मुलाकातों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, भरोसे, निरंतर संवाद और जनहित में किए जाने वाले ठोस प्रयासों से तय होती है।




