✍️ रिपोर्ट: सैयद रिज़वान मुस्तफा
दिल्ली | इस्लामिक सेंटर,जब भी मजलूमियत, इंसाफ़ और इख़लास की बात होती है, ज़ेहन में सबसे पहले कर्बला और उसके सच्चे वारिस इमाम हुसैन (अ.स) का नाम आता है। उनकी राह पर चलने वाले लोग हर दौर में मजलूमों की आवाज़ बनते रहे हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं—हाजी मोहम्मद हनीफा जान, जो आज लद्दाख से सांसद हैं और पूरे भारत में चर्चा का विषय बने हुए हैं।
हाल ही में दिल्ली के इस्लामिक सेंटर मे एक दिल को छू लेने वाली मुलाक़ात हुई, जहाँ हनीफा जान साहब से रूबरू होने का मौक़ा मिला। इस ख़ास इंटरव्यू में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के मिशन, मजलूमों की खिदमत और लद्दाख के बच्चों के भविष्य के लिए किए जा रहे प्रयासों पर खुलकर बात की।
🌟 कौन हैं हनीफा जान?
- जन्म: 2 जनवरी 1969, बारू, कारगिल (लद्दाख)
- व्यवसाय: Self-employed, सामाजिक कार्यकर्ता, कारोबारी, किसान
- राजनीतिक रुझान: स्वतंत्र सांसद (Independent MP) — न किसी पार्टी के एजेंडे से बंधे, न किसी कुर्सी की लालच में
- संसद: 2024 लोकसभा में ऐतिहासिक जीत — बीजेपी और कांग्रेस दोनों को हराकर लद्दाख के असली नुमाइंदे बने
🏛️ संसद में मजलूमों की आवाज़
हनीफा जान साहब ने दिल्ली में हुए इंटरव्यू में दो टूक कहा:
“लद्दाख सिर्फ एक भू-भाग नहीं, मजलूमों का घर है। जब तक मुझे संसद भेजा गया है, मैं वहां के हर गरीब, हर बच्चे, हर परिवार की आवाज़ बनकर खड़ा रहूंगा।”
उन्होंने संसद के पहले ही सत्र में ज़ीरो ऑवर में अपनी बात रखी:
- लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग
- संविधान की छठीं अनुसूची में शामिल करने की दरख्वास्त
- स्थायी लोक सेवा आयोग (LPSC) की स्थापना
- लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें
🎓 शिक्षा पर ख़ास ध्यान
हनीफा जान साहब ने बताया कि लद्दाख के गरीब घरों से आने वाले बच्चे आज भी गर्मियों में दूरदराज़ के स्कूलों तक पैदल जाते हैं। वे चाहते हैं कि:
- लद्दाख में मॉडर्न उच्च शिक्षा संस्थान स्थापित हों
- मेडिकल व टेक्निकल कॉलेज खुले
- बच्चों को स्कॉलरशिप, कोचिंग व प्रशिक्षण की सुविधा मुफ्त मिले
“हर बच्चा अगर काबिल है, तो उसके रास्ते में गरीबी दीवार न बने,” – ये उनके शब्द थे जो लोगों के दिल को छू गए।
🤝 गरीबों की खिदमत
अपने एफिडेविट में हनीफा जान ने लगभग ₹3.28 करोड़ की संपत्ति घोषित की है, जिसमें उन्होंने न तो कोई महंगे बंगले खरीदे, न ही लग्ज़री गाड़ियाँ चलाईं। उनकी संपत्ति का बड़ा हिस्सा कारगिल के बाज़ार में छोटे व्यवसायिक भवनों और खेती की ज़मीन पर आधारित है।
उनका कहना था:
“मैं अमीर नहीं हूँ, लेकिन मजलूमों के काम आ सकूं तो यही सबसे बड़ी दौलत है।”
🕌 इमाम हुसैन (अ.स) से मोहब्बत
हनीफा जान का दिल कर्बला की रोशनी से रौशन है। उन्होंने इस बात को बार-बार दोहराया कि:
“मैं इमाम हुसैन (अ.स) को अपना रहबर मानता हूँ। मेरी राजनीति सिर्फ इख़लास, ईमानदारी और इंसाफ़ पर आधारित है।”
उन्होंने भारत में अपील की कि मजलूमों के लिए, शिक्षा के लिए, इंसाफ़ के लिए एकजुट हों।
📍 जमीनी दौरे और वादाखिलाफ़ी से इनकार
सांसद बनने के बाद उन्होंने Nubra, Turtuk, Diskit, Shakar-Chiktan जैसे दुर्गम इलाकों का दौरा किया। लोगों की परेशानियाँ सुनीं, अस्पतालों का निरीक्षण किया, और अपने खर्चे से कई गांवों में मदद पहुंचाई।
भी लद्दाख से उठी एक पाक आवाज़
हनीफा जान सिर्फ लद्दाख के सांसद नहीं हैं—वे भारत की उस तहजीब, उस हुसैनी जज़्बे के प्रतीक हैं, जिसमें नौहाख़्वानी भी है, इंसाफ़ की आवाज़ भी है, और बच्चों के लिए तालीम की फ़िक्र भी।
उनका जीवन और संघर्ष उन सभी नौजवानों के लिए प्रेरणा है जो राजनीति को सिर्फ सत्ता नहीं, खिदमत का ज़रिया मानते हैं।
इसीलिए आज हिंदुस्तान पूछ रहा है—
“क्या भारत का असली ताज कोई और नहीं, बल्कि हनीफा जान जैसे लोग हैं जो इमाम हुसैन (अ.स) की राह पर चलकर देश का नाम रोशन कर रहे हैं?”
भारत का ताज — हनीफा जान
आज जब देश में राजनीति अक्सर व्यक्तिगत लाभ और शोर-शराबे में खो जाती है, तब हनीफा जान जैसे नेता उम्मीद की किरण बनकर सामने आती हैं। वे बताते हैं कि संसद में बैठने का मक़सद केवल बहस नहीं, बल्कि बदलाव लाना है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जब कोई , वह भी इतनी सादगी और ईमानदारी के साथ संसद तक पहुंचे और हुसैनी रवायत की पैरवी करे, तो बेशक उसे “भारत का ताज” कहने में कोई गुरेज़ नहीं।