तहलका टुडे डेस्क | सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/मोहम्मद वसीक
लखनऊ/अलीगढ़। उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली और पुराने वक्फ रिकॉर्ड को लेकर उठने वाले सवालों के बीच वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ का एक अहम फैसला सामने आया है। अलीगढ़ के क़स्बा जलाली स्थित इमामबाड़ा अलमारूफ मज़हर अली से जुड़े मुकदमे में न्यायाधिकरण ने 6 मई 2026 को वादी का रेफरेंस मंज़ूर करते हुए 12 जून 2013 के पूर्व आदेश में दर्ज संबंधित निष्कर्षों को अपास्त कर दिया। न्यायाधिकरण ने कहा कि चूंकि विवादित इमामबाड़ा संबंधित वक्फ में शामिल नहीं है, इसलिए वह सार्वजनिक इमामबाड़ा नहीं, बल्कि वादी के बुज़ुर्गों का निजी इमामबाड़ा है।
वक्फ रेफरेंस नंबर 188/2013 में पारित इस फैसले ने संबंधित संपत्ति की कानूनी हैसियत पर चल रही लंबी लड़ाई में एक अहम मोड़ ला दिया है। फैसले में पुराने दस्तावेज़ों, वक्फ की ग़रज़, इमामबाड़े की मिल्कियत और इंतिज़ामी कार्रवाई से जुड़े सवालों पर विचार किया गया।
इस मामले में वादी पक्ष की पैरवी से जुड़े एडवोकेट मोहम्मद हुसैन रिज़वी की दलीलों मुकदमे का केंद्रीय सवाल यही था कि क्या इमामबाड़े को संबंधित वक्फ की संपत्ति माना जा सकता है या वक्फ की व्यवस्था और इमामबाड़े की मिल्कियत दो अलग-अलग कानूनी मसले हैं।

*वक्फ बोर्ड के पुराने आदेश पर ट्रिब्यूनल की अहम कार्रवाई*
मामले के अंतिम आदेश में न्यायाधिकरण ने साफ तौर पर दर्ज किया कि वादी की ओर से प्रस्तुत रेफरेंस स्वीकार किया जाता है। साथ ही, 12 जून 2013 के उस आदेश में विवादित इमामबाड़े के वक्फ में शामिल होने से संबंधित निष्कर्षों को अपास्त किया जाता है।
न्यायाधिकरण के आदेश के अनुसार, विवादित इमामबाड़ा अलमारूफ मज़हर अली संबंधित वक्फ में शामिल नहीं होने के कारण सार्वजनिक नहीं है, बल्कि वादी के पूर्वजों का निजी इमामबाड़ा है।
*तीन सदस्यीय पीठ ने सुनाया फैसला*
वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ के 6 मई 2026 के अंतिम आदेश पर अध्यक्ष और दो सदस्यों के नाम दर्ज हैं।
फैसला सुनाने वाली पीठ:
– प्रहलाद सिंह-II — अध्यक्ष, वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ
– ओम प्रकाश — सदस्य, वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ
– राम सुरेश वर्मा — सदस्य, वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ
आदेश में यह भी दर्ज है कि फैसला न्यायाधिकरण की पीठ की उपस्थिति में सुनाया गया। इस प्रकार, यह संबंधित वक्फ रेफरेंस में पारित औपचारिक न्यायिक आदेश है।
*एडवोकेट मोहम्मद हुसैन रिज़वी की दलीलों का अहम पहलू*
इस मुकदमे में कानूनी बहस का केंद्र पुराने मुआहिदों, वक्फ की ग़रज़ और इमामबाड़े की स्वतंत्र मिल्कियत का सवाल रहा। वादी पक्ष का मौकिफ़ था कि किसी धार्मिक स्थल के खर्च या देखरेख के लिए वक्फ की व्यवस्था होने से उस स्थल का स्वयं वक्फ की संपत्ति होना अपने आप साबित नहीं हो जाता।
एडवोकेट मोहम्मद हुसैन रिज़वी की पैरवी के संदर्भ में खबर का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है कि मामले में वक्फ की स्थापना के उद्देश्य और विवादित इमामबाड़े की मिल्कियत के बीच अंतर का सवाल उठाया गया।
*1901 का मुआहिदा और 1925 के दस्तावेज़ बने विवाद की बुनियाद*
इमामबाड़ा मज़हर अली विवाद में 10 अप्रैल 1901 के मुआहिदे और 30 जुलाई 1925 के दस्तावेज़ का उल्लेख महत्वपूर्ण है। मुकदमे में पुराने दस्तावेज़ों की व्याख्या, वक्फ की स्थापना का उद्देश्य और इमामबाड़े की संपत्ति की कानूनी हैसियत जैसे सवाल उठाए गए।
वादी पक्ष का मौकिफ़ था कि वक्फ और इमामबाड़े के संबंध को समझने के लिए पुराने दस्तावेज़ों का वास्तविक आशय देखा जाना चाहिए। किसी धार्मिक स्थल का वक्फ के कामों से जुड़ा होना और उसका स्वयं वक्फ की संपत्ति होना अलग-अलग कानूनी प्रश्न हो सकते हैं।
न्यायाधिकरण ने मामले के रिकॉर्ड और पक्षकारों की दलीलों के बाद वादी का रेफरेंस स्वीकार किया। अंतिम आदेश में विवादित इमामबाड़े को संबंधित वक्फ से बाहर माना गया।
*13 साल पुराना विवाद, अब आया अहम न्यायिक निष्कर्ष*
वक्फ रेफरेंस नंबर 188/2013 से स्पष्ट है कि यह मामला वर्ष 2013 से न्यायाधिकरण में विचाराधीन था। लंबे समय तक चले विवाद में इमामबाड़े की स्थिति, पुराने दस्तावेज़ और पूर्व प्रशासनिक आदेश महत्वपूर्ण रहे।
6 मई 2026 को पारित अंतिम आदेश में वादी का रेफरेंस स्वीकार किए जाने के साथ पत्रावली को नियमानुसार दाखिल-दफ्तर करने का निर्देश दिया गया।
यह फैसला संबंधित पक्ष के लिए महत्वपूर्ण राहत है, क्योंकि न्यायाधिकरण ने विवादित इमामबाड़े को सार्वजनिक वक्फ संपत्ति नहीं माना। लेकिन आदेश के विरुद्ध किसी अपील, स्थगन या बाद की कार्यवाही की स्थिति की पुष्टि अलग से करना आवश्यक है।
*वक्फ प्रशासन के लिए क्या है संदेश?*
यह मामला वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड और कानूनी स्थिति की जांच के महत्व को सामने लाता है। पुराने वक्फनामे, मुआहिदे, पंजीकरण रिकॉर्ड और संपत्ति के विवरण में स्पष्टता होना आवश्यक है, ताकि धार्मिक स्थलों की मिल्कियत और प्रबंधन को लेकर विवाद न बढ़ें।
यदि किसी संपत्ति को वक्फ में शामिल करने पर विवाद हो, तो संबंधित दस्तावेज़ों और लागू कानून के आधार पर उसका न्यायिक परीक्षण किया जा सकता है। इस मामले में न्यायाधिकरण ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर विवादित इमामबाड़े को संबंधित वक्फ में शामिल नहीं माना।
*पुराने रिकॉर्ड की जवाबदेही कौन तय करेगा?*
वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता, दस्तावेज़ों की शुद्धता और कानूनी प्रक्रिया का पालन बेहद जरूरी है। यदि किसी संपत्ति की स्थिति को लेकर विवाद पैदा होता है, तो संबंधित विभाग और बोर्ड की जिम्मेदारी है कि रिकॉर्ड स्पष्ट रखें और न्यायिक आदेशों के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई करें।
इमामबाड़ा मज़हर अली मामले में न्यायाधिकरण का फैसला यह दिखाता है कि संपत्ति की कानूनी हैसियत का निर्धारण केवल प्रशासनिक रिकॉर्ड के आधार पर अंतिम रूप से नहीं माना जा सकता; विवाद होने पर सक्षम न्यायिक मंच उसका परीक्षण कर सकता है।
अब संबंधित पक्षों और प्रशासन की जिम्मेदारी होगी कि फैसले के अनुपालन तथा वर्तमान कानूनी स्थिति को स्पष्ट रखें।
अलीगढ़ के इमामबाड़ा अलमारूफ मज़हर अली विवाद में यूपी वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ ने 6 मई 2026 को वादी का रेफरेंस स्वीकार करते हुए 12 जून 2013 के पूर्व आदेश के संबंधित निष्कर्षों को अपास्त किया और इमामबाड़े को संबंधित वक्फ में शामिल न होने के कारण निजी पैतृक इमामबाड़ा माना।
दस्तावेज़ी आधार: उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ; वक्फ रेफरेंस नंबर 188/2013; अंतिम आदेश दिनांक 6 मई 2026।




