100 वर्ष ,काकोरी: इंक़लाब की वो चिंगारी जिसने साम्राज्य को हिला दिया
(9 अगस्त 1925 की शाम – एक ट्रेन, कुछ जांबाज़, और आज़ादी का सपना)
अँधेरा धीरे-धीरे उतर रहा था, लेकिन कुछ नौजवानों के दिलों में रोशनी का तूफ़ान मचल रहा था। यह कोई साधारण शाम नहीं थी—यह वह घड़ी थी, जब मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगाने वाले वीर, अंग्रेजी हुकूमत के दिल में सीधा वार करने निकल पड़े थे।
आठ डाउन पैसेंजर गाड़ी के दूसरे दर्जे में अशफ़ाकउल्ला ख़ान, शचीन्द्रनाथ बख्शी और राजेंद्रनाथ लाहिड़ी सवार थे। उनका मिशन साफ था—निर्धारित जगह पर ज़ंजीर खींच कर ट्रेन रोकना।
तीसरे दर्जे के डिब्बे में बाकी सात शेर—रामप्रसाद बिस्मिल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, मुकुन्दी लाल, बनवारी लाल, मन्मथ नाथ गुप्त और चंद्रशेखर आज़ाद—अपने-अपने काम के लिए तैयार थे।
किसी को गार्ड और ड्राइवर को काबू करना था, तो किसी को ट्रेन के दोनों ओर पहरा देना था। सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी थी अंग्रेजों के ख़ज़ाने से भरी तिजोरी पर हाथ डालना—वो ख़ज़ाना जो भारत की मिट्टी से लूटकर, हमारे ही देश को गुलाम बनाए रखने के लिए इस्तेमाल हो रहा था।
जब ज़ंजीर खींची गई, हवा में सन्नाटा और दिलों में गड़गड़ाहट थी। गार्ड और ड्राइवर को पेट के बल लिटा दिया गया। भारी-भरकम तिजोरी को नीचे उतारा गया। हथौड़ों और छेनी की चोटों से लोहे का सीना चटकने लगा, और अशफ़ाकउल्ला के दमदार प्रहार ने उसे खोलकर रख दिया—अंदर था हिंदुस्तान का लूटा हुआ धन, जो अब आज़ादी की लड़ाई में खर्च होना था।
गांठ में बंधा वो ख़ज़ाना कंधों पर उठा, और ये जांबाज़ पैदल ही लखनऊ की ओर चल पड़े। शहर पहुंचकर ख़ज़ाना सुरक्षित जगह रख दिया गया। तय ठिकानों पर सब ठहर गए, लेकिन आज़ाद—वो बाग़ी शेर—उस रात एक पार्क में ही बैठकर आसमान तले जागते रहे।
सुबह होते ही अख़बारों में सुर्ख़ियाँ थीं—
“काकोरी के पास सनसनीख़ेज़ ट्रेन डकैती”
ब्रिटिश सरकार तिलमिला गई। गुप्तचर विभाग हर शक़ी शख़्स के पीछे लग गया।
47 दिन बाद, 26 सितंबर 1925 को, पूरे उत्तर प्रदेश में छापेमारी हुई। गिरफ़्तारियाँ शुरू हुईं। मुक़दमा चला—चार सूरमाओं को फांसी दी गई, चार को काला पानी, और सत्रह को लंबी कैद।
लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य को ये एहसास हो गया कि हिंदुस्तान की धरती पर ऐसे बेटे पैदा होते हैं जो मौत से नहीं डरते, और जिनके लिए वतन सबसे ऊपर है।
काकोरी सिर्फ़ एक “ट्रेन डकैती” नहीं थी—
ये वो आग थी जिसने आने वाले वर्षों में आज़ादी के आंदोलन को भड़का दिया।
ये वो कहानी है जिसे सुनकर आज भी रगों में लहू तेज़ दौड़ता है।
और ये वो सबक है कि इंक़लाब सिर्फ़ बंदूक से नहीं, बल्कि नीयत और क़ुर्बानी से जीतता है।
सैयद रिज़वान मुस्तफा