लखनऊ | तहलका टुडे विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ—जहां से पूरे प्रदेश की सरकार चलती है, जहां कानून-व्यवस्था और जनकल्याण की नीतियां तय होती हैं, जहां कमजोर और जरूरतमंद लोगों को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन पर है—वहीं एक परिवार के आशियाने को लेकर ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने मानवीय संवेदनाओं और बैंकिंग व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिवार का आरोप है कि पंजाब एंड सिंध बैंक की ऋण-वसूली से जुड़ी कार्रवाई के दौरान देर शाम बीमार बुजुर्ग मां और दिव्यांग बेटी को घर से बाहर होना पड़ा और मकान पर ताला लगा दिया गया। यदि घटनाक्रम परिवार के बताए अनुसार हुआ, तो यह केवल एक ऋण खाते का विवाद नहीं, बल्कि यह जांचने का विषय भी है कि कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया, पूर्व सूचना और प्रभावित परिवार की बुनियादी जरूरतों का कितना ध्यान रखा गया।
क्या कर्ज की वसूली के लिए कानून का पालन जरूरी नहीं? क्या एक बीमार मां और दिव्यांग बेटी की परिस्थितियों को समझने के लिए किसी विशेष आदेश की आवश्यकता होनी चाहिए?
इन सवालों का जवाब भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि तथ्यों की निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।
अदालत का आदेश है, तो क्या हर कदम की जांच नहीं होगी?
रईस हैदर एवं अन्य से संबंधित इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ के समक्ष पंजाब एंड सिंध बैंक ने SARFAESI Act, 2002 की धारा 14 के अंतर्गत मॉर्गेज संपत्ति का कब्जा दिलाने की मांग की थी। उपलब्ध आदेश के टाइप किए गए पाठ के अनुसार, न्यायालय ने बैंक का आवेदन स्वीकार करते हुए एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति और कब्जे की प्रक्रिया के संबंध में निर्देश दिए।
आदेश के अंतिम हिस्से में विपक्षीगण को आदेश प्राप्त होने के 30 दिन के भीतर संपत्ति का कब्जा बैंक को देने का निर्देश दर्ज है। अवधि पूरी होने के बाद भी कब्जा न दिए जाने की स्थिति में एडवोकेट कमिश्नर को कानून के अनुसार पुलिस सहायता लेने की अनुमति का उल्लेख है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आदेश की प्रति परिवार को किस तारीख को मिली, 30 दिन की अवधि कब से शुरू हुई और मकान पर ताला किस तारीख को लगाया गया?
यदि कार्रवाई आदेश में निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले हुई या उसके क्रियान्वयन में कोई प्रक्रियागत त्रुटि हुई, तो उसकी जांच और कानूनी समीक्षा आवश्यक है। हालांकि, आदेश के उपलब्ध पाठ से अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बैंक ने निश्चित रूप से कानून का उल्लंघन किया है।
धारा 13(2) का नोटिस नहीं मिलने का दावा
परिवार का कहना है कि उसे धारा 13(2) का नोटिस वास्तव में प्राप्त नहीं हुआ। दूसरी ओर, उपलब्ध न्यायिक आदेश में बैंक की ओर से 10 फरवरी 2026 के नोटिस तथा संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है।
इसलिए बैंक को नोटिस की तामील का प्रमाण, डाक की ट्रैकिंग रिपोर्ट, भेजे गए पते और समाचार पत्र में प्रकाशन से संबंधित रिकॉर्ड स्पष्ट करना चाहिए। नोटिस जारी होना और उसकी विधिवत तामील होना अलग-अलग प्रश्न हैं। इनका उत्तर दस्तावेजों की जांच से ही मिल सकता है।
सरकार की मानवीय जिम्मेदारी और बैंक की जवाबदेही
सरकार से अपेक्षा की जाती है कि कानून के शासन के साथ कमजोर और जरूरतमंद लोगों की कठिनाइयों को भी सुने। लेकिन किसी बैंक की कार्रवाई को केवल इस आधार पर सरकारी नीति के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता कि उससे किसी परिवार को परेशानी हुई है। इसके लिए घटना के तथ्य और लागू कानूनी प्रक्रिया की जांच जरूरी है।
फिर भी, जब किसी परिवार में बीमार बुजुर्ग और दिव्यांग सदस्य हों, तो प्रशासन से यह अपेक्षा उचित है कि वह अपनी कानूनी सीमाओं के भीतर उनकी बुनियादी जरूरतों और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर संवेदनशीलता दिखाए।
बैंक का कर्ज अपनी जगह है। अदालत का आदेश अपनी जगह। लेकिन नोटिस की तामील, कब्जे की तारीख, सामान की सूची और परिवार को आवश्यक सामान तक पहुंच देने जैसे प्रश्नों की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सीधे सवाल
1. क्या आदेश की प्रति परिवार को विधिवत दी गई और 30 दिन की अवधि का पालन हुआ?
2. क्या कब्जे से पहले कार्रवाई की तारीख की पर्याप्त सूचना दी गई?
3. क्या घर से निकाले गए सामान की सूची तैयार कर उसे संबंधित व्यक्ति को सौंपा गया?
4. क्या बीमार मां और दिव्यांग बेटी की दवाइयों तथा आवश्यक सामान तक सुरक्षित पहुंच की व्यवस्था की गई?
5. क्या बैंक नोटिस की तामील और कब्जे की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए प्रस्तुत करेगा?
निष्पक्ष जांच हो, परिवार को कानूनी राहत मिले
यदि रईस हैदर के परिवार को लगता है कि कब्जे की कार्रवाई में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो वह SARFAESI Act की धारा 17 के अंतर्गत DRT में उचित राहत मांगने के लिए तत्काल कानूनी सलाह ले सकता है। कब्जे की तारीख, आदेश की प्रमाणित प्रति और कब्जा मेमो इस मामले में विशेष महत्व रखते हैं।
यदि परिवार की दवाइयां या आवश्यक सामान मकान के भीतर बंद हैं, तो बैंक और अधिकृत कब्जा अधिकारी से तत्काल लिखित रूप में सुरक्षित पहुंच की मांग की जानी चाहिए।
आवाम की मांग है कि पंजाब एंड सिंध बैंक तथा संबंधित अधिकारियों से पूरी कार्रवाई का रिकॉर्ड लेकर निष्पक्ष जांच की जाए। यदि किसी स्तर पर कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन पाया जाता है, तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो और प्रभावित परिवार को उचित राहत मिले।
लखनऊ की इस घटना में उठे सवालों का जवाब बैंक और संबंधित अधिकारियों को दस्तावेजों के आधार पर देना चाहिए। किसी परिवार की मजबूरी को सुने बिना निष्कर्ष निकालना उचित नहीं, लेकिन किसी कानूनी कार्रवाई को जांच से परे मान लेना भी सही नहीं है।
कर्ज की वसूली कानून के अनुसार होनी चाहिए—और कानून का पालन हर कदम पर होना चाहिए।




