✍️ रिपोर्ट: सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
“वो मेरे सामने मेरे बेटे को ले गए… मैंने कहा, ‘वो बच्चा है!’
उन्होंने जवाब दिया – ‘अब यह बड़ा हो गया है… अब यह मरने के काबिल है।'”
यह एक मां की चीख नहीं, एक पूरी कौम की चीत्कार है —
स्रेब्रेनित्सा की ज़मीन से उठती वो चीखें, जिन्हें पूरी दुनिया ने सुना, मगर कोई नहीं बोला।
🔥 यूरोप के बीचों-बीच इंसानियत का जनाज़ा
11 जुलाई 1995…
बोस्निया का एक छोटा सा शहर ‘स्रेब्रेनित्सा’, जिसे संयुक्त राष्ट्र ने Safe Zone घोषित किया था,
कुछ ही घंटों में मौत की फैक्ट्री में तब्दील हो गया।
बोस्नियाई सर्ब सैनिकों ने वहां के 8,000 से अधिक मुस्लिम पुरुषों और लड़कों को
उनकी उम्र, उनकी दाढ़ी और उनके नाम देखकर चुन-चुन कर मार डाला।
ये वो समय था जब संयुक्त राष्ट्र मौजूद था,
डच शांति सैनिक वहाँ थे,
अमेरिका के पास सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें थीं,
मगर सबने सिर्फ देखा — और चुप रहे।
💣 एक सुनियोजित नरसंहार
जनरल रातको म्लादिक की कमान में आए सर्ब सैनिकों ने:
- महिलाओं और बच्चों को अलग कर UN की निगरानी में भेज दिया।
- और फिर मुसलमान पुरुषों को ट्रकों में भरकर ले गए —
कहीं स्कूल में, कहीं गोदामों में, कहीं जंगलों में। - फिर बंदूकें दगाईं, और कब्रें पहले से खुदी थीं।
📡 जब अमेरिका जानता था, मगर हिला नहीं
CIA और NATO को यह सब पहले से पता था।
उन्हें उपग्रह चित्रों से सर्बियाई गतिविधियाँ दिख रही थीं।
अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी थी कि स्रेब्रेनित्सा खतरे में है।
मगर अमेरिका उस समय ‘सीमित हस्तक्षेप’ की नीति पर चल रहा था।
नाटो की हवाई शक्ति निष्क्रिय रही,
और संयुक्त राष्ट्र के सैनिक हथियार डाल बैठे।
इसलिए सवाल उठता है —
क्या अमेरिका की चुप्पी इस नरसंहार में साझीदार थी?
⚖️ न्याय हुआ, मगर बहुत देर से
बोस्निया में युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICTY) ने:
- जनरल रातको म्लादिक को उम्रकैद दी।
- राडोवन काराडजिक को भी युद्ध अपराधों का दोषी ठहराया।
UN ने स्रेब्रेनित्सा को “Genocide” घोषित किया।
मगर क्या यह 8,000 मौतों का मुआवज़ा था?
🕊️ आज स्रेब्रेनित्सा एक शहर नहीं — एक जिंदा चीख है
- हर साल 11 जुलाई को स्मृति दिवस मनाया जाता है।
- Potočari Memorial Center में रोज़ नई कब्रें खुलती हैं।
- DNA से पहचान चलती है।
- और सैकड़ों माताएं आज भी उन बेटों की तस्वीर लिए बैठी हैं — जो कभी लौटकर नहीं आए।
✍️ यह सिर्फ बोस्निया की कहानी नहीं…
यह कहानी है:
- दुनिया की आंखों के सामने हुए ‘Live Genocide’ की।
- उन “Safe Zones” की, जो कभी भी क़त्लगाह बन सकते हैं।
- उन ताकतों की, जो “मानवाधिकार” का नारा तो लगाते हैं, लेकिन जब ज़रूरत पड़े तो पीछे हट जाते हैं।
📢 “Never Again” सिर्फ एक नारा नहीं होना चाहिए
स्रेब्रेनित्सा की माताएं आज भी इंसाफ नहीं मांगतीं,
वो बस इतना कहती हैं —
“दूसरी मां को यह दर्द न मिले।”
मगर क्या दुनिया ने कुछ सीखा?
आज गाज़ा, सीरिया, यमन, सूडान, और भारत के अंदरुनी हिस्सों में जो हालात बनते हैं,
वो यही सवाल उठाते हैं —
“क्या स्रेब्रेनित्सा फिर से हो सकता है?”
जब किसी इंसान की हत्या उसके मज़हब, नाम या पहचान की वजह से होती है —
तो वो सिर्फ एक इंसान की नहीं,
पूरी इंसानियत की हत्या होती है।
और जब दुनिया सब कुछ जानकर भी चुप रहती है,
तो दोषी सिर्फ कातिल नहीं,
हर वो हाथ होता है जो चुप था।
🖊 सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
एडिटर, तहलका टुडे
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