इंटरनेशनल डेस्क/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा
इतिहास जब भी जंग के सौदागरों की फेहरिस्त लिखेगा, उसमें डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू जैसे नाम सिर्फ़ नेताओं के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसी सियासत के चेहरों के रूप में दर्ज होंगे, जिसने इंसानियत को बारूद के ढेर पर बैठाकर “सुरक्षा” का झूठ बेचा।
आज फिर वही खेल खेला जा रहा है—एक तरफ़ ईरान को परमाणु खतरा बताकर दुनिया को डराया जा रहा है, दूसरी तरफ़ मासूमों की लाशों, बर्बाद शहरों, यतीम बच्चों और बेवा औरतों पर सियासी भाषण दिए जा रहे हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान, जिसमें वह कहता है कि “हमारे बच्चों को कभी परमाणु ईरान का सामना न करना पड़े”, पहली नज़र में देशभक्ति जैसा लग सकता है। लेकिन अगर इस बयान के पीछे छिपे राजनीतिक मंसूबे, युद्ध की भूख और सत्ता के नशे को समझा जाए, तो यह शहीद सैनिकों के नाम पर रची गई एक बेहद सस्ती और खतरनाक राजनीतिक पटकथा से ज्यादा कुछ नहीं।
यह वही ट्रंप है जिसकी जिद, उत्तेजक बयानबाज़ी, टकराव की नीति और “पहले हमला” वाली सोच ने सिर्फ़ पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि अमेरिकी परिवारों के घरों में भी मातम पहुंचाया।
यह सवाल उठना ही चाहिए कि अमेरिकी सैनिकों की मौत का जिम्मेदार कौन है?
क्या हर बार कोई “बाहरी दुश्मन” ही जिम्मेदार है?
या फिर वॉशिंगटन की वही सत्ता, जो अपने जवानों को रणनीति नहीं, बल्कि राजनीति के मोहरे की तरह इस्तेमाल करती है?
ट्रंप की जंगपरस्ती: सैनिकों की जान भी उसके लिए सिर्फ़ एक चुनावी नैरेटिव
जब ट्रंप प्रेस कॉन्फ्रेंस में खड़ा होकर अपने सैनिकों का जिक्र करता है, तो वह अक्सर दर्द नहीं, बल्कि राजनीतिक स्क्रिप्ट पढ़ता हुआ दिखाई देता है।
सवाल यह है कि अगर उसे सचमुच अमेरिकी सैनिकों की फिक्र होती, तो क्या वह दुनिया को हर वक्त जंग, हमला, प्रतिबंध और तबाही की तरफ धकेलता?
जिस सोच में हर समस्या का हल बम, ड्रोन, सैन्य गठबंधन और कूटनीतिक धमकी हो — वहाँ इंसान की जान की कीमत बहुत कम रह जाती है।
अमेरिकी सैनिक भी आखिर इंसान हैं — उनके भी घर हैं, माँएँ हैं, बीवियाँ हैं, बच्चे हैं, सपने हैं।
लेकिन ट्रंप और उसके जैसे सत्ता-लोभी नेताओं के लिए ये सब सिर्फ़ सियासी प्रतीक हैं।
उनकी मौत को “बलिदान” कहकर मंच से भुनाया जाता है, लेकिन उनकी मौत की वजह बनी नीतियों पर कभी सवाल नहीं उठाया जाता।
सच तो यह है कि
अमेरिकी सैनिकों की मौत पर सबसे पहले सवाल ईरान से नहीं, व्हाइट हाउस की जंगी सोच से पूछा जाना चाहिए।
‘परमाणु ईरान’ — डर की मार्केटिंग, हथियारों का कारोबार और झूठ का साम्राज्य
दुनिया को दशकों से एक ही कहानी सुनाई जा रही है —
“ईरान परमाणु हथियार बना रहा है”
“ईरान दुनिया के लिए खतरा है”
“ईरान को रोको, नहीं तो देर हो जाएगी”
लेकिन हर बार वही सवाल खड़ा होता है —
अगर ईरान इतना ही बड़ा खतरा है, तो निर्णायक और निर्विवाद सबूत कहाँ हैं?
हक़ीक़त यह है कि “परमाणु ईरान” का डर सिर्फ़ सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति का सबसे सफल प्रोपेगेंडा मॉडल रहा है।
इस डर से:
- हथियार उद्योग फलता-फूलता है
- सैन्य बजट बढ़ता है
- सहयोगी देशों को लाइन में रखा जाता है
- जनता को असली समस्याओं से भटकाया जाता है
- और युद्ध को “नैतिक कर्तव्य” की शक्ल दे दी जाती है
यानी कहानी साफ़ है:
पहले दुश्मन गढ़ो, फिर डर बेचो, फिर हमला जायज़ ठहराओ।
यही वॉशिंगटन की पुरानी चाल है।
और इसी खेल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल हो जाता है — वह सवाल पूछने के बजाय वही नैरेटिव दोहराने लगता है, जो सत्ता चाहती है।
असल खतरा कौन? वह मुल्क जो डराया जा रहा है, या वह ताकत जो दुनिया को डराकर चलाती है?
दुनिया को एक पल के लिए ईमानदारी से सोचना चाहिए।
जो देश खुद दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य ढांचे, सबसे बड़े परमाणु जखीरे और सबसे लंबी युद्ध सूची के साथ खड़ा हो —
क्या असल खतरा वही नहीं?
ईरान पर उंगली उठाने वाले वही लोग हैं, जो:
- फिलिस्तीन में मासूमों की मौत पर चुप हैं
- गाज़ा के मलबे में दबे बच्चों पर चुप हैं
- सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और लीबिया की तबाही पर चुप हैं
- इज़राइल की बमबारी को “आत्मरक्षा” कहकर पेश करते हैं
यानी यह एक ऐसा नैतिक पाखंड है, जहाँ
**जब अमेरिका और उसके सहयोगी हमला करें तो उसे “सुरक्षा” कहा जाता है,
और जब कोई मजलूम अपना बचाव करे तो उसे “खतरा” या “आतंक” कह दिया जाता है।**
यही दुनिया का सबसे बड़ा अन्याय है।
नेतन्याहू और ट्रंप: बारूद की राजनीति के दो चेहरे
अगर ट्रंप अमेरिका में जंगपरस्त राजनीति का चेहरा है, तो नेतन्याहू पश्चिम एशिया में उसी सोच का विस्तार है।
एक डर बेचता है, दूसरा बम गिराता है।
एक “सभ्यता की रक्षा” की भाषा बोलता है, दूसरा “सुरक्षा” के नाम पर तबाही मचाता है।
लेकिन दोनों की राजनीति का ईंधन एक ही है —
डर, खून, ध्रुवीकरण और इंसानी दर्द का राजनीतिक इस्तेमाल।
दुनिया यह देख रही है कि कैसे मजलूमों की चीखें सत्ता के गलियारों में “कोलैटरल डैमेज” बन जाती हैं।
कैसे बच्चों की मौत को “दुर्भाग्य” कहकर आगे बढ़ जाया जाता है।
कैसे अस्पताल, स्कूल, घर, मस्जिदें और शरणस्थल भी अब युद्ध की भाषा में सिर्फ़ “टारगेट” बनकर रह गए हैं।
और फिर कैमरों के सामने खड़े होकर वही लोग शांति, सुरक्षा और सभ्यता की बातें करते हैं।
यह सिर्फ़ पाखंड नहीं —
यह इंसानियत का सबसे अपमानजनक मज़ाक है।
मजलूमों पर दुनिया की खामोशी: यह सिर्फ़ चुप्पी नहीं, साझेदारी है
आज का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ़ जुल्म नहीं, बल्कि
जुल्म पर दुनिया की संगठित खामोशी है।
- बच्चे मरते हैं — दुनिया चुप
- औरतें उजड़ती हैं — दुनिया चुप
- शहर राख होते हैं — दुनिया चुप
- इंसानियत चीखती है — दुनिया चुप
क्यों?
क्योंकि जब जुल्म ताकतवर करता है, तो दुनिया का बड़ा हिस्सा उसे “कूटनीति”, “संतुलन”, “रणनीति” और “राष्ट्रीय हित” जैसे मुलायम शब्दों में छिपा देता है।
मीडिया के बड़े मंचों पर मौतों की गिनती भी राजनीति देखकर तय होती है —
कुछ लाशें “ब्रेकिंग न्यूज़” बनती हैं, कुछ बस आंकड़ा।
यह कैसी दुनिया है, जहाँ मजलूम की चीख़ को माइक्रोफोन नहीं मिलता,
लेकिन जालिम की प्रेस कॉन्फ्रेंस दुनिया भर में लाइव चलती है?
ट्रंप का बयान श्रद्धांजलि नहीं, खून पर राजनीति है
जब कोई नेता अपने सैनिकों की मौत के बाद भी अमन, संयम और सच्चाई की बात न करे,
बल्कि एक नए दुश्मन का डर बेचने लगे —
तो समझ लेना चाहिए कि वह शोक नहीं, राजनीति कर रहा है।
ट्रंप का बयान सैनिकों के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि उनकी मौत को एक राजनीतिक हथियार में बदलने की कोशिश है।
यह ऐसा बयान है जो:
- शहीदों की पीड़ा को नहीं समझता
- परिवारों के घाव नहीं भरता
- दुनिया को सच नहीं बताता
- बस एक और जंग के लिए माहौल बनाता है
यह श्रद्धांजलि नहीं — खून पर लिखा गया चुनावी पोस्टर है।
हक़ीक़त यह है…
अमेरिकी सैनिकों की मौतों का सबसे बड़ा कारण ईरान नहीं, बल्कि वह जंगी सोच है जो हर बार दुनिया को युद्ध की तरफ धकेलती है।
और आज जो ट्रंप “हमारे बच्चों” की बात कर रहा है,
उसे पहले उन हजारों बच्चों का हिसाब देना चाहिए
जो अमेरिकी और इज़राइली नीतियों के कारण:
- यतीम हुए
- बेघर हुए
- मलबे में दबे
- और बिना नाम की कब्रों में दफ्न कर दिए गए
अगर ट्रंप सच में इंसानियत की बात करना चाहता है,
तो उसे पहले यह बताना होगा कि
दुनिया के कितने मुल्क उसकी और उसके जैसे नेताओं की सत्ता की हवस के कारण कब्रिस्तान बने?
दुनिया को ट्रंप के झूठ से नहीं, उसकी सोच से डरना चाहिए
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा खतरा कोई “परमाणु ईरान” नहीं,
बल्कि वह जंगपरस्त, अहंकारी, गैर-जिम्मेदार और इंसान-विरोधी राजनीति है
जो खुद को दुनिया का मालिक समझती है।
ट्रंप का बयान एक बार फिर यह साबित करता है कि
अमेरिका की सत्ता का एक बड़ा हिस्सा शांति की भाषा नहीं,
बल्कि वर्चस्व, डर और खून की राजनीति समझता है।**
और जब तक दुनिया इस झूठ को पहचानकर उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगी,
तब तक मजलूमों का खून बहता रहेगा,
और जालिम कैमरों के सामने खुद को “रक्षक” बताते रहेंगे।
लेकिन इतिहास हमेशा देर से सही, फैसला ज़रूर करता है।
और इतिहास की अदालत में बारूद के सौदागर कभी बेगुनाह नहीं बचते।




