तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
लखनऊ। उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के 18 अगस्त 2026 के आदेश ने हलचल तेज कर दी है। वक्फ हादी बेगम, हाजरा बेगम और सरदार बेगम बनाम उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड एवं अन्य से जुड़ी प्रथम अपील संख्या 93/2025 में अदालत ने 04 नवंबर 2024 की बोर्ड कार्यवाही पर दर्ज दो सदस्यों के विवादित हस्ताक्षरों की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच कराने का आदेश दिया है।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बोर्ड की मूल केस फाइल और 04 नवंबर 2024 की बैठक का उपस्थिति/कार्यवाही रजिस्टर न्यायालय में मंगवाया और उन्हें सीलबंद सुरक्षित अभिरक्षा में रखने का निर्देश दिया। बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री जिशान रिजवी को भी आदेश के अनुपालन में व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित होना पड़ा।
सबसे अहम बात—हाईकोर्ट ने 04 नवंबर 2024 को उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा पारित विवादित आदेश के संचालन एवं क्रियान्वयन को अगली सुनवाई तक रोक दिया है।
आखिर 04 नवंबर 2024 की बैठक में हुआ क्या था?
मामला वक्फ संख्या I-1503, जनपद कानपुर से संबंधित है। बोर्ड ने इस मामले में 04 नवंबर 2024 को आदेश/कार्यवाही की थी।
इसी कार्यवाही में बोर्ड के दो सदस्यों—
सैयद शबाहत हुसैन
और
डॉ. नूरुस हसन नकवी
के नाम से हस्ताक्षर दर्ज बताए गए।
अपीलकर्ता की ओर से अदालत में दाखिल प्रत्युत्तर शपथपत्र में इन हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर गंभीर सवाल उठाए गए। अपीलकर्ता का आरोप था कि दोनों सदस्यों के नाम से दर्ज हस्ताक्षर वास्तविक नहीं हैं।
मामले में अपीलकर्ता ने एक फॉरेंसिक हैंडराइटिंग विशेषज्ञ/फॉरेंसिक परीक्षक की रिपोर्ट भी न्यायालय के सामने रखी।
हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, 06 अगस्त 2026 की फॉरेंसिक रिपोर्ट में राय दी गई कि दोनों सदस्यों के नाम से दर्शाए गए हस्ताक्षर अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना। अदालत ने अब स्वतंत्र रूप से राज्य फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी, लखनऊ से जांच कराने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने शिकायत को रिकॉर्ड के सामने परखा
इस मामले में हाईकोर्ट की कार्रवाई का सबसे अहम पहलू यह है कि अदालत ने सिर्फ आरोप सुनकर फैसला नहीं किया।
अदालत ने—
- मूल बोर्ड केस फाइल तलब की।
- 04 नवंबर 2024 का मूल आदेश मंगवाया।
- बोर्ड बैठक का मूल उपस्थिति/कार्यवाही रजिस्टर मंगवाया।
- रिकॉर्ड को सीलबंद कर सुरक्षित कराया।
- विवादित हस्ताक्षरों की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच का आदेश दिया।
- और 04 नवंबर 2024 के विवादित आदेश के संचालन एवं क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता को देखते हुए विवादित हस्ताक्षरों की वास्तविकता और लेखकत्व की जांच सक्षम फॉरेंसिक विशेषज्ञ से कराया जाना आवश्यक है।
सीईओ ज़ीशान रिजवी को व्यक्तिगत रूप से क्यों बुलाया गया?
हाईकोर्ट के पूर्व आदेश के अनुपालन में बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जिशान रिजवी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ा।
सीईओ के माध्यम से न्यायालय के समक्ष—
वक्फ संख्या I-1503, जनपद कानपुर की मूल केस फाइल
और
04 नवंबर 2024 की बैठक का उपस्थिति रजिस्टर
पेश किया गया।
अदालत ने इन दस्तावेजों को सीलबंद कर वरिष्ठ रजिस्ट्रार की सुरक्षित अभिरक्षा में रखने का निर्देश दिया।
18 अगस्त की सुनवाई में सीईओ फिर व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहे। हालांकि अदालत ने अब कहा है कि उन्हें दोबारा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी, जब तक न्यायालय फिर ऐसा निर्देश न दे।
अब FSL में होगी ‘दस्तखतों की असली परीक्षा’
हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि विवादित हस्ताक्षरों की जांच राज्य फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी, लखनऊ के फॉरेंसिक डॉक्यूमेंट डिवीजन से कराई जाए।
एफएसएल को यह निर्धारित करना होगा कि 04 नवंबर 2024 के बोर्ड आदेश पर सैयद शबाहत हुसैन और डॉ. नूरुस हसन नकवी के नाम से किए गए हस्ताक्षर वास्तव में उन्हीं दोनों ने किए या किसी अन्य व्यक्ति ने।
इसके लिए तीन रिकॉर्ड निर्णायक होंगे—
‘A’ — 04 नवंबर 2024 का विवादित आदेश
जिस पर दोनों विवादित हस्ताक्षर हैं।
04 नवंबर 2024 का उपस्थिति/कार्यवाही रजिस्टर
जिसमें दोनों सदस्यों के हस्ताक्षर बताए गए हैं।
‘B’ — 31 मार्च 2022 का पूर्व बोर्ड आदेश
जिसे संदर्भ/स्वीकृत नमूना हस्ताक्षरों के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।
यानी अब सवाल कागजों पर नहीं, वैज्ञानिक जांच के जरिए तय करने की कोशिश होगी कि विवादित हस्ताक्षर वास्तव में किसके हैं।
विवादित आदेश पर हाईकोर्ट की रोक—सबसे बड़ा झटका
हाईकोर्ट ने अपने आदेश के पैरा 17 में स्पष्ट कर दिया है कि अगली निर्धारित तारीख तक 04 नवंबर 2024 के विवादित बोर्ड आदेश का संचालन और क्रियान्वयन स्थगित रहेगा।
इसका मतलब है कि फिलहाल उक्त आदेश को लागू नहीं किया जा सकेगा।
अदालत ने रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और फॉरेंसिक जांच कराने के साथ-साथ विवादित आदेश के अमल पर रोक लगाकर मामले को और गंभीर न्यायिक जांच के दायरे में ला दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल—अगर दस्तखत गलत निकले तो?
फिलहाल अदालत ने किसी व्यक्ति को जालसाजी का दोषी घोषित नहीं किया है। लेकिन फॉरेंसिक जांच के बाद यदि विशेषज्ञ यह निष्कर्ष देते हैं कि संबंधित सदस्यों के नाम से किए गए हस्ताक्षर उन्हीं सदस्यों के नहीं हैं, तो मामले की गंभीरता और बढ़ सकती है।
तब सवाल सिर्फ हस्ताक्षरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि—
04 नवंबर 2024 की कार्यवाही कैसे तैयार हुई?
विवादित हस्ताक्षर रिकॉर्ड में कैसे पहुंचे?
उस कार्यवाही के आधार पर लिए गए निर्णय की वैधानिक स्थिति क्या होगी?
और सबसे अहम—
आधिकारिक वक्फ रिकॉर्ड में यदि हस्ताक्षर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए पाए जाते हैं तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
इन सभी सवालों के जवाब फिलहाल जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं।
21 सितंबर को खुलेगा अगला अध्याय
हाईकोर्ट ने मामले को आगे के आदेशों के लिए 21 सितंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है।
अदालत ने वरिष्ठ रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि एफएसएल की रिपोर्ट अगली तारीख तक न्यायालय को प्राप्त हो जाए।
अब इस मामले में सभी की निगाहें FSL रिपोर्ट पर टिकी हैं।
वक्फ बोर्ड की आधिकारिक बैठक के रिकॉर्ड में दर्ज हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर हाईकोर्ट को सरकारी फॉरेंसिक जांच की जरूरत क्यों पड़ी?
यह सवाल अब केवल एक वक्फ की फाइल तक सीमित नहीं रह गया है। यह सरकारी/वैधानिक संस्था के रिकॉर्ड की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुका है।
हाईकोर्ट का आदेश अंतिम रूप से किसी व्यक्ति को जालसाजी का दोषी नहीं ठहराता। लेकिन अदालत ने आरोपों और उपलब्ध सामग्री की गंभीरता को देखते हुए मूल रिकॉर्ड सुरक्षित कराए, विवादित आदेश के अमल पर रोक लगाई और हस्ताक्षरों की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच का आदेश दिया है।
अब 21 सितंबर 2026 और उससे पहले आने वाली एफएसएल रिपोर्ट बताएगी कि 04 नवंबर 2024 की उस कार्यवाही में दर्ज हस्ताक्षरों की वास्तविक कहानी क्या है।








