तहलका टुडे डेस्क/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव/ मोहम्मद वसीक
लखनऊ उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड में कार्यकाल की 21 अक्टूबर पूरी होने के समय की गतिविधियों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कैमरे बंद किए जाने, फाइलें फाड़े जाने, डिस्पैच रोके जाने और पुराने दिनांक में आदेश भेजने की कथित कोशिशों के बीच अब कई औकाफ की महत्वपूर्ण पत्रावलियां उठाकर ले जाने और गायब किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
यदि ये आरोप दस्तावेजों और जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल कार्यालयी अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा। सवाल शिया वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड, उनके प्रशासनिक नियंत्रण, लंबित विवादों और सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा का भी है।
सबसे बड़ा सवाल—आखिर किन औकाफ की फाइलें गायब हैं, वे किसके कब्जे में गईं और कार्यकाल समाप्ति के समय ही यह सब होने के आरोप क्यों सामने आ रहे हैं?
कई औकाफ की फाइलें कहां गईं? रिकॉर्ड सुरक्षित है या नहीं?
वक्फ बोर्ड की पत्रावलियां किसी साधारण कार्यालयी कागज का नाम नहीं हैं। इनमें संपत्तियों के पंजीकरण, मुतवल्लियों की नियुक्ति, प्रबंध समितियों, किरायेदारी, संपत्ति विवादों, आय-व्यय और प्रशासनिक आदेशों से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज हो सकते हैं।
ऐसे में कई औकाफ की फाइलें उठाकर ले जाने और गायब किए जाने के आरोप बेहद गंभीर हैं। यदि किसी संपत्ति की मूल पत्रावली उपलब्ध नहीं है, तो यह पता लगाना जरूरी है कि फाइल अंतिम बार किस अधिकारी या कर्मचारी के पास थी, उसे किस आदेश के तहत निकाला गया और क्या फाइल मूवमेंट रजिस्टर में उसकी प्रविष्टि दर्ज है।
यह भी जांच का विषय है कि क्या संबंधित पत्रावलियों की स्कैन कॉपी, डिजिटल रिकॉर्ड या प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध हैं। यदि किसी फाइल को जानबूझकर हटाया गया या नष्ट किया गया है, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच आवश्यक होगी।
कैमरे बंद, फाइलें फाड़ी गईं—क्या छिपाना चाहता था कोई?
कार्यकाल समाप्ति के दिन कार्यालय के कैमरे बंद किए जाने और फाइलें फाड़े जाने के आरोप भी उठाए जा रहे हैं। इन आरोपों की पुष्टि सीसीटीवी रिकॉर्ड, कार्यालय के लॉग और संबंधित कर्मचारियों के बयानों से की जानी चाहिए।
जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कैमरे कब बंद हुए, किसके निर्देश पर बंद हुए और उस अवधि में किन लोगों की कार्यालय में आवाजाही रही। यदि फाइलें फाड़ी गईं, तो उनकी पहचान, विषय और संबंधित औकाफ का विवरण सामने लाया जाना चाहिए।
सरकारी अभिलेखों की सुरक्षा किसी व्यक्ति की निजी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संस्थागत दायित्व है। इसलिए रिकॉर्ड के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
चार्ज शीटेड हसन रज़ा के सेवा-विस्तार की कथित कोशिश—पत्रावलियों की जांच जरूरी
सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा के संबंध में आरोप लगाए जा रहे हैं कि अपना कार्यकाल एक वर्ष और बढ़वाने के लिए पत्रावलियों में कथित हेराफेरी की कोशिश की गई। इस दावे की पुष्टि के लिए सेवा-विस्तार संबंधी प्रस्ताव, नोटशीट, शासन को भेजे गए पत्र और अनुमोदन की स्थिति की जांच आवश्यक है।
क्या सेवा-विस्तार का कोई प्रस्ताव तैयार किया गया था? क्या उसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखा गया? क्या उसमें तारीख, टिप्पणी या आदेश से संबंधित कोई अनियमितता हुई? और शासन ने उस पर क्या निर्णय लिया?
इन सवालों का उत्तर मूल फाइलों और सरकारी रिकॉर्ड से मिलना चाहिए। यदि किसी पत्रावली में जानबूझकर बदलाव किए जाने के प्रमाण मिलते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
बैकडेट डिस्पैच की कथित कवायद—आदेश कब बने और कब भेजे गए?
आरोप है कि खूब रकम पकड़कर कार्यकाल समाप्ति के दिन कई आदेश टाइप होते रहे और कुछ को पिछली तारीख में डिस्पैच करने की कोशिश की गई। यदि ऐसा हुआ है, तो प्रत्येक आदेश की वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी है।
इसके लिए आदेश संख्या, टाइपिंग और हस्ताक्षर की तारीख, ई-ऑफिस या कंप्यूटर लॉग, डिस्पैच रजिस्टर, डाक रसीद और प्राप्तकर्ता के रिकॉर्ड का मिलान किया जाना चाहिए।
किसी आदेश पर पुरानी तारीख लिखी होना और वास्तव में उसे बैकडेट में जारी करना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए जांच का आधार अनुमान नहीं, बल्कि प्रमाणित रिकॉर्ड होना चाहिए।
पूर्व चेयरमैन अली जैदी के बटलर पैलेस आवास पर गतिविधियों को लेकर भी सवाल
पूर्व चेयरमैन अली जैदी के बटलर पैलेस स्थित आवास पर काम कराने वालों की आवाजाही को लेकर भी चर्चा और आरोप सामने आए हैं। यदि वहां बोर्ड से संबंधित आदेशों, नियुक्तियों या पत्रावलियों पर अनुचित प्रभाव डालने की कोशिश हुई, तो इसकी स्वतंत्र पुष्टि होनी चाहिए।
किस व्यक्ति ने किस उद्देश्य से संपर्क किया, क्या किसी सरकारी फाइल पर वहां निर्णय लिया गया और क्या इन गतिविधियों का बोर्ड के आधिकारिक रिकॉर्ड से संबंध है—इन प्रश्नों का उत्तर प्रमाणों के आधार पर ही दिया जा सकता है।
किसी आवास पर लोगों की आवाजाही अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है, लेकिन सरकारी कामकाज को प्रभावित करने के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
विधान परिषद चुनाव की व्यस्तता के बीच क्या हुआ?
विधान परिषद चुनाव के कारण शासन और प्रशासन की व्यस्तता का फायदा उठाकर बोर्ड में कथित अनियमितताओं को अंजाम देने की कोशिश की गई।
इस दावे की जांच के लिए घटनाओं की तारीख, अधिकारियों की जिम्मेदारियों, आदेशों के समय और फाइलों की आवाजाही का रिकॉर्ड मिलाना जरूरी है। यदि किसी अवधि में निगरानी व्यवस्था प्रभावित हुई, तो यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि उसका कारण क्या था और क्या किसी ने इसका अनुचित लाभ उठाया।
सात सीधे सवाल
- कार्यकाल समाप्ति के दिन बोर्ड कार्यालय के कैमरे बंद थे या नहीं? यदि थे, तो किसके निर्देश पर?
- किन-किन औकाफ की पत्रावलियां गायब हैं और वे आखिरी बार किस अधिकारी या कर्मचारी के पास दर्ज थीं?
- क्या फाइलें कार्यालय से बाहर ले जाने की अनुमति थी? यदि थी, तो उसका लिखित आदेश और रजिस्टर कहां है?
- क्या किसी फाइल को फाड़ने, हटाने या रिकॉर्ड में बदलाव करने के प्रमाण मिले हैं?
- क्या हसन रज़ा के एक वर्ष के सेवा-विस्तार का प्रस्ताव तैयार हुआ था और शासन ने उस पर क्या निर्णय लिया?
- क्या किसी आदेश को पिछली तारीख में डिस्पैच किया गया? यदि हां, तो वास्तविक तारीख और जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
- क्या राज्य सरकार सभी संबंधित पत्रावलियों, सीसीटीवी रिकॉर्ड, ई-ऑफिस लॉग और डिस्पैच रजिस्टर को सुरक्षित कराकर स्वतंत्र जांच कराएगी?
अब सिर्फ सफाई नहीं, रिकॉर्ड के साथ जवाब जरूरी
उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का काम धार्मिक और सार्वजनिक संपत्तियों के प्रशासन से जुड़ा है। ऐसी संस्था में फाइलों की सुरक्षा, आदेशों की प्रामाणिकता और निर्णयों की पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि औकाफ की पत्रावलियां वास्तव में गायब हैं, तो उनकी सूची सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर तैयार की जानी चाहिए। प्रत्येक फाइल की अंतिम उपलब्ध स्थिति, जिम्मेदार अधिकारी और उसके गायब होने की परिस्थितियों का पता लगाया जाना चाहिए। साथ ही, डिजिटल रिकॉर्ड और प्रमाणित प्रतियों को सुरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि किसी वक्फ संपत्ति के अधिकार, प्रबंधन या लंबित मुकदमे पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
सेव वक्फ इंडिया की मांग है कि संबंधित रिकॉर्ड को तत्काल सुरक्षित किया जाए, गायब बताई जा रही औकाफ की फाइलों की सूची तैयार हो और कैमरों, डिस्पैच तथा पत्रावलियों की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
यदि आरोप सही हैं, तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि आरोपों में तथ्य नहीं हैं, तो जांच से स्थिति साफ होनी चाहिए।
सवाल सीधा है—औकाफ की फाइलें कहां हैं, आदेश कब जारी हुए और इन सबकी जिम्मेदारी किसकी है? अब जवाब अटकलों से नहीं, दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए।




