तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव लमोहम्मद वसीक
लखनऊ।उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के कामकाज और फैसलों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुजफ्फरनगर की दरगाह करबला ईदगाह की प्रबंध कमेटी से जुड़े विवाद में उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ ने बोर्ड के 14 फरवरी 2026 के आदेश को एडवोकेट मोहम्मद हुसैन रिजवी के आर्गुमेंट के बाद निरस्त कर दिया है। न्यायाधिकरण ने उस आदेश के आधार पर जारी 16 मार्च 2026 के तोलियत प्रमाण-पत्र को भी रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई और निर्णय के लिए बोर्ड के पास भेज दिया।
यह फैसला उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली जैदी के नेतृत्व वाले बोर्ड के लिए बड़ा कानूनी झटका है। सवाल उठ रहा है कि आखिर बोर्ड ने संबंधित पक्षों के दावों पर ऐसा आदेश क्यों पारित किया, जिसे न्यायाधिकरण ने पर्याप्त कारणों के अभाव में टिकाऊ नहीं माना? वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन जैसे संवेदनशील विषय में यदि आदेशों के पीछे स्पष्ट कानूनी आधार दर्ज नहीं होगा, तो जवाबदेही तय करने की मांग उठना स्वाभाविक है।
हालांकि, न्यायाधिकरण के इस आदेश में चेयरमैन अली जैदी के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार को साबित करने वाला कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं है। यह निर्णय मुख्य रूप से बोर्ड के विवादित आदेश की वैधता, उसमें कारणों के अभाव और दोबारा सुनवाई की आवश्यकता से संबंधित है।
न्यायाधिकरण ने क्यों पलटा बोर्ड का फैसला?
मामला मुजफ्फरनगर स्थित वक्फ दरगाह करबला ईदगाह, पंजीकरण संख्या 2016/460 की प्रबंध कमेटी और मुतवल्ली व्यवस्था से जुड़ा है। मूसी रजा ने बोर्ड के समक्ष अपनी प्रस्तावित कमेटी के गठन के लिए प्रार्थना-पत्र दिया था। दूसरी ओर, मोहम्मद सादिक की ओर से भी कमेटी नियुक्त करने का आवेदन प्रस्तुत किया गया था।
बोर्ड ने 14 फरवरी 2026 को मूसी रजा के आवेदन को अस्वीकार करते हुए दूसरी कमेटी को दो वर्ष के लिए नियुक्त करने का आदेश पारित किया। इसके बाद 16 मार्च 2026 को तोलियत प्रमाण-पत्र जारी हुआ। मूसी रजा ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए वक्फ न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया।
न्यायाधिकरण ने अभिलेखों और दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलों पर विचार करने के बाद पाया कि विवादित आदेश में मूसी रजा के दावे को अस्वीकार करने के पर्याप्त कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे। निर्णय में यह भी रेखांकित किया गया कि संबंधित पक्षों के प्रार्थना-पत्रों का निस्तारण करते समय निर्णय के पीछे तर्क और कारण दर्ज करना आवश्यक है।
केवल आदेश जारी करना काफी नहीं, कारण भी बताने होंगे
न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा उच्चतम न्यायालय के प्रासंगिक निर्णयों का उल्लेख किया। इनमें एस.एन. मुखर्जी बनाम भारत संघ और महिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त के निर्णय शामिल हैं।
इन न्यायिक सिद्धांतों का मूल संदेश स्पष्ट है—जहां किसी प्राधिकारी से न्यायिक या अर्द्ध-न्यायिक प्रकृति का निर्णय अपेक्षित हो, वहां आदेश में निर्णय के पीछे के कारणों का स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है। बाद में मुकदमे के दौरान दी गई दलीलों के सहारे किसी कारणरहित आदेश की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता।
यही वह कानूनी बिंदु है, जिसने बोर्ड के आदेश को चुनौती के घेरे में ला खड़ा किया। न्यायाधिकरण ने 14 अक्टूबर 2026 के अपने निर्णय में पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए विवादित आदेश और तोलियत प्रमाण-पत्र निरस्त कर दिए।
परिवार की परंपरा बनाम कमेटी नियुक्ति का विवाद
मूसी रजा की ओर से संबंधित धार्मिक संपत्ति की देखरेख और मुतवल्ली व्यवस्था में अपने परिवार की पुरानी भूमिका का दावा किया गया था। दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष ने इस दावे पर आपत्ति करते हुए कहा कि संबंधित संपत्ति वक्फ अभिलेखों में दरगाह, करबला और ईदगाह के रूप में दर्ज है।
भूमि के उपयोग और पुराने अभिलेखों को लेकर भी पक्षकारों के बीच मतभेद सामने आए। न्यायाधिकरण ने इन विवादों पर अंतिम रूप से स्वामित्व या मुतवल्ली पद का निर्णय देने के बजाय बोर्ड के आदेश में पर्याप्त कारणों की कमी को प्रमुख आधार बनाया।
इसलिए न्यायाधिकरण का फैसला मूसी रजा को सीधे मुतवल्ली घोषित नहीं करता। इसका प्रभाव यह है कि बोर्ड को संबंधित पक्षों के दावों पर दोबारा सुनवाई करके विधिसम्मत निर्णय देना होगा।
21 अक्टूबर को अली जैदी के नेतृत्व वाले बोर्ड के सामने अब जवाबदेही की कसौटी
इस फैसले के बाद वक्फ बोर्ड के कामकाज पर निगाह रखने वाले लोगों के सामने कई अहम सवाल हैं। क्या बोर्ड अपनी पिछली प्रक्रिया की कमियों को दूर करेगा? क्या दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिलेगा? क्या नए आदेश में प्रत्येक महत्वपूर्ण दावे पर स्पष्ट कारण दर्ज किए जाएंगे?
वक्फ संपत्तियां धार्मिक और सामुदायिक महत्व रखती हैं। उनके प्रबंधन से जुड़े विवादों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और कानूनी प्रक्रिया का पालन अत्यंत आवश्यक है। किसी पक्ष के आवेदन को स्वीकार करना या अस्वीकार करना बोर्ड का निर्णय हो सकता है, लेकिन उस निर्णय का कानूनी आधार स्पष्ट होना भी जरूरी है।
न्यायाधिकरण का यह फैसला बोर्ड के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत संदेश है कि उसके निर्णय न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हैं। यदि आदेश में आवश्यक कारणों का अभाव पाया जाता है, तो उसे निरस्त करके नए सिरे से निर्णय देने का निर्देश दिया जा सकता है।
अब आगे क्या होगा?
न्यायाधिकरण ने उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड को निर्देश दिया है कि संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देकर उनके प्रार्थना-पत्रों का विधिसम्मत और तर्कपूर्ण आदेश के माध्यम से निस्तारण किया जाए। आदेश की प्रति सूचना और अनुपालन के लिए बोर्ड को भेजे जाने का निर्देश भी दिया गया है।
अब देखना होगा कि बोर्ड इस निर्देश का पालन किस प्रकार करता है और नई सुनवाई के बाद क्या निर्णय सामने आता है। फिलहाल, पुराने आदेश और उसके आधार पर जारी तोलियत प्रमाण-पत्र का निरस्त होना इस विवाद में एक अहम घटनाक्रम ह
सवाल: जब न्यायाधिकरण ने बोर्ड के आदेश को पर्याप्त कारणों के अभाव में निरस्त कर दिया है, तो क्या बोर्ड के जिम्मेदार पदाधिकारी इस कानूनी झटके की जवाबदेही स्वीकार करेंगे और भविष्य में वक्फ संपत्तियों से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करेंगे?
दस्तावेजी आधार: उत्तर प्रदेश वक्फ न्यायाधिकरण, लखनऊ, वाद संख्या 10/2026, मूसी रजा बनाम उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड एवं अन्य, निर्णय दिनांक 14 अक्टूबर 2026।




