“लखनऊ इंदिरा भवन से आगरा तक उठ रहे सवाल — क्या वक्फ बोर्ड में सब कुछ ‘सेटिंग’ से हो रहा है?” “शहीद-ए-सालिस (अ.र.) की मजार पर आखिर किसके इशारे पर चल रहा खेल?” “योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के बावजूद वक्फ बोर्ड में विवादित चेहरों की एंट्री क्यों?”

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“बंद कमरों में तय हुई नियुक्ति या नियमों के तहत कार्रवाई? जवाब मांग रहा शिया समाज”

शहीद-ए-सालिस की मजार पर “सौदेबाज़ी” के आरोप से मचा भूचाल

वक्फ बोर्ड का पत्र वायरल, चेयरमैन अली जैदी और अधिकारियों पर गंभीर आरोप

“भ्रष्टाचार, विवादित नियुक्ति और वक्फ कानून की धज्जियां” — शिया समाज में बढ़ता आक्रोश

विशेष रिपोर्ट

तहलका टुडे डेस्क

आगरा / लखनऊ :
जिस दरगाह पर लोग सदियों से इंसाफ़, अमन और रूहानी सुकून की दुआ लेकर आते रहे… आज उसी ऐतिहासिक मजार शहीद-ए-सालिस (अ.र.) के चारों तरफ़ सवाल, विवाद, कथित सौदेबाज़ी और सत्ता के खेल की चर्चाएँ तेज़ हो चुकी हैं।

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“बंद कमरों में तय हुई नियुक्ति या नियमों के तहत कार्रवाई? जवाब मांग रहा शिया समाज”शहीद-ए-सालिस की मजार पर “सौदेबाज़ी” के आरोप से मचा भूचालवक्फ बोर्ड का पत्र वायरल, चेयरमैन अली जैदी और अधिकारियों पर गंभीर आरोप“भ्रष्टाचार, विवादित नियुक्ति और वक्फ कानून की धज्जियां” — शिया समाज में बढ़ता आक्रोशविशेष रिपोर्टतहलका टुडे डेस्कआखिर कौन थे शहीद-ए-सालिस?वायरल पत्र ने मचा दिया बवाल“इंदिरा भवन में हुआ खेल?”बंद कमरों की बैठकों पर उठ रहे सवालविवादित चेहरों की एंट्री पर बवाल“क्यों बार-बार वही चेहरे?”पुराने विवाद फिर सुर्खियों में“जिसे हटाया गया, उसी ने बढ़ाई आमदनी?”धरना-प्रदर्शन की तैयारीअब सवाल सिर्फ़ एक मजार का नहीं…“क्या वक्फ बोर्ड में चल रही नियुक्तियाँ नियमों के तहत हो रही हैं…या फिर सब कुछ बंद कमरों में तय हो रहा है?”

उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड से जारी एक आधिकारिक पत्र ने पूरे शिया समाज, धार्मिक हलकों और इंसाफ पसंद लोगों के बीच ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है कि आगरा से लेकर लखनऊ और ईरान तक बेचैनी महसूस की जा रही है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दस्तावेज़, बंद कमरों में हुई कथित बैठकों की चर्चाएँ, विवादित नामों की एंट्री और करोड़ों की वक्फ संपत्तियों पर उठते सवाल अब सीधे वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा रहे हैं।

आखिर कौन थे शहीद-ए-सालिस?

काज़ी नुरुल्लाह शूस्त्री शहीद-ए-सालिस (अ.र.) सिर्फ़ एक आलिम नहीं थे, बल्कि इंसाफ़, इल्म और अहलेबैत (अ.स.) की मोहब्बत की ऐसी आवाज़ थे जिन्हें इतिहास आज भी सम्मान के साथ याद करता है।

उन्होंने सत्ता के दबाव के सामने झुकने से इंकार किया और इसी “जुर्म” में उन्हें दर्दनाक यातनाएँ देकर शहीद कर दिया गया। उनकी शहादत आज भी ईरान, इराक़ और हिंदुस्तान के धार्मिक संस्थानों में याद की जाती है।

लेकिन अब उसी शहीद की मजार पर उठते विवाद यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या वक्फ संस्थाएँ अपनी असल रूह खो चुकी हैं?

वायरल पत्र ने मचा दिया बवाल

उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड, इंदिरा भवन, लखनऊ से जारी पत्र संख्या 389 दिनांक 04-05-2026 अब इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।

इस पत्र में अज़ादार हुसैन रिज़वी पुत्र स्वर्गीय नाजिर हुसैन रिज़वी निवासी शिकोहाबाद, फिरोजाबाद को वक्फ मजार शहीद-ए-सालिस, आगरा का प्रबंधक नियुक्त किए जाने का आदेश जारी किया गया है।

पत्र में स्पष्ट लिखा गया कि पूर्व प्रबंधक अली अब्बास रिज़वी को कार्यमुक्त करते हुए अज़ादार हुसैन रिज़वी को अग्रिम आदेशों तक मैनेजर नियुक्त किया जाता है।

यह आदेश प्रशासक जफर सज्जाद द्वारा जारी किया गया, जिसकी प्रतिलिपि चेयरमैन अली जैदी, मुख्य कार्यपालक अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी सैयद हसन रज़ा रिज़वी को भी भेजी गई।

लेकिन जैसे ही यह पत्र वायरल हुआ, वैसे ही पूरा मामला “नियुक्ति” से निकलकर “कथित सौदेबाज़ी” तक पहुँच गया।

“इंदिरा भवन में हुआ खेल?”

बंद कमरों की बैठकों पर उठ रहे सवाल

स्थानीय लोगों, कई अंजुमनों और समाज के लोगों का आरोप है कि यह नियुक्ति नियमों के तहत नहीं बल्कि “सेटिंग” के जरिए हुई।

आरोप लगाने वालों का कहना है कि 13 मई को लखनऊ स्थित इंदिरा भवन में पुराने और नए दोनों मैनेजरों को बुलाया गया था। वहीं कथित तौर पर प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा के माध्यम से “सौदा” तय हुआ और उसके बाद प्रशासक जफर सज्जाद द्वारा नियुक्ति पत्र जारी कर दिया गया।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन चर्चाओं ने पूरे शिया समाज में भारी गुस्सा और बेचैनी पैदा कर दी है।

विवादित चेहरों की एंट्री पर बवाल

अज़ादार हुसैन रिज़वी को लेकर समाज के एक वर्ग में पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। विरोध करने वालों का दावा है कि उनके खिलाफ दूसरे के नाम पर नौकरी करने और करोड़ों रुपये के कथित गबन से जुड़े मामले अदालत में विचाराधीन हैं।

इतना ही नहीं, पिछले वर्ष उनके पुत्र का नाम एक अन्य धर्म की युवती से छेड़छाड़ के मामले में सामने आने और जेल भेजे जाने की चर्चा भी अब फिर तेज़ हो गई है।

लोग सवाल उठा रहे हैं —
क्या इतनी ऐतिहासिक और संवेदनशील धार्मिक संपत्ति की जिम्मेदारी ऐसे विवादित नामों को दी जानी चाहिए?

“क्यों बार-बार वही चेहरे?”

इस पूरे विवाद ने उस समय और आग पकड़ ली जब मजार से जुड़े कुछ पुराने विवादित नाम फिर चर्चा में आने लगे। समाज के लोगों का कहना है कि आखिर क्यों बार-बार ऐसे लोगों को मजार और वक्फ संपत्तियों से जोड़ा जा रहा है जिन पर पहले से गंभीर आरोप लगते रहे हैं?

कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि पुराने आपराधिक नेटवर्क और दबंग समूहों से जुड़े लोगों की सक्रियता ने पूरे माहौल को और ज्यादा संदिग्ध बना दिया है।

पुराने विवाद फिर सुर्खियों में

मौलाना अम्मार जरवली पर हुए कथित हमले और मौलाना आगा रूही साहब पर दर्ज फर्जी मुकदमों जैसे पुराने मामले भी अब फिर चर्चा में हैं।

समाज के लोग कह रहे हैं कि अगर वक्फ संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही खत्म हो गई तो धार्मिक धरोहरें भी सियासत, दबाव और आर्थिक खेल का मैदान बन जाएंगी।

“जिसे हटाया गया, उसी ने बढ़ाई आमदनी?”

पूर्व प्रबंधक अली अब्बास रिज़वी के समर्थकों का दावा है कि उनके कार्यकाल में मजार की आमदनी और व्यवस्था दोनों में बड़ा सुधार हुआ था।

बताया जा रहा है कि उन्होंने:

  • किरायेदारी व्यवस्था को नियमित कराया
  • बरसी “देसा” का सफल आयोजन कराया
  • 15 नए AC लगवाए
  • आधुनिक कार्यालय तैयार कराया
  • ज़ायरीनों के लिए पार्किंग व्यवस्था बनवाई

समर्थकों का कहना है कि जहाँ पहले 22 कमरों से लगभग 38 लाख रुपये सालाना की बैलेंस शीट जमा होती थी, वहीं उनके कार्यकाल में सिर्फ़ 12 कमरों से लगभग 60 लाख रुपये की बैलेंस शीट प्रस्तुत की गई।

अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है —
अगर आमदनी बढ़ रही थी, व्यवस्थाएँ सुधर रही थीं, तो फिर इतनी जल्दबाज़ी में उन्हें हटाने की वजह क्या थी?

धरना-प्रदर्शन की तैयारी

सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय, जिला प्रशासन और विभिन्न जांच एजेंसियों तक पहुँच चुकी है।

कई अंजुमनों और सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो बड़े स्तर पर आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और कानूनी कार्रवाई शुरू की जाएगी।

अब सवाल सिर्फ़ एक मजार का नहीं…

यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली जैदी और प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा के खिलाफ समाज में लगातार गुस्सा बढ़ता जा रहा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि बोर्ड के भीतर भ्रष्टाचार, मनमानी और कथित सेटिंग का खेल अपने चरम पर पहुँच चुका है।

आगरा से लेकर लखनऊ और ईरान के धार्मिक हलकों तक लोग अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं —

“क्या वक्फ बोर्ड में चल रही नियुक्तियाँ नियमों के तहत हो रही हैं…

या फिर सब कुछ बंद कमरों में तय हो रहा है?”

और शायद सबसे दर्दनाक सवाल यह है —

“जिस दरगाह पर लोग इंसाफ़ मांगने जाते हैं…
और वहां के हालात ऐसे है
तो फिर आम आदमी आखिर कहाँ जाए?”

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