तहलका टुडे डेस्क
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में वक्फ संपत्तियों पर कब्जे का मामला अब केवल अवैध निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह कथित तौर पर भू माफियाओं, वक्फ बोर्ड के अधिकारियों और संरक्षण देने वाले सिस्टम के गठजोड़ का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। थाना सहादतगंज स्थित टापे वाली गली का वक्फ संख्या 2705, तकिया कब्रिस्तान अता हुसैन अब सवालों के घेरे में है, जहां कब्रें खोदकर सड़क बना दी गई, अवैध निर्माण खड़े कर दिए गए और अब जमीन बेचने तक की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सूत्रों के मुताबिक इस कब्रिस्तान की जमीन बेचने में कथित तौर पर भू माफियाओं और वक्फ बोर्ड के एक प्रशासनिक अधिकारी के बीच “आधे-आधे रकम” का सौदा तय किया गया है। यही वजह बताई जा रही है कि लगातार शिकायतों के बावजूद फाइलें दबाई जाती रहीं और कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी।
मुर्दों की जमीन पर सौदेबाजी का आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस जमीन पर कभी मोमिनीन की कब्रें थीं, आज वहां सीमेंट, सरिया और आलीशान निर्माण दिखाई दे रहे हैं। आरोप है कि पहले धीरे-धीरे कब्रों के बीच रास्ता निकाला गया, फिर उसी रास्ते को सड़क का रूप दे दिया गया और अब उसी जमीन पर दो बड़े मकान खड़े कर दिए गए हैं।
इलाके के बुजुर्गों का कहना है कि यह केवल जमीन कब्जाने का मामला नहीं बल्कि “मुर्दों की बेअदबी” और धार्मिक भावनाओं को कुचलने का मामला है।
वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा पर गंभीर सवाल
पूरा मामला अब शिया वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। आरोप है कि मुतावल्ली द्वारा शिकायत करने के बावजूद फाइलों को दबाया गया और भू माफियाओं को संरक्षण दिया गया।
सूत्रों का दावा है कि:
- अवैध कब्जों की शिकायतें वक्फ बोर्ड तक पहुंचीं
- लेकिन कार्रवाई की जगह फाइलों को “मैनेज” किया गया
- भू माफियाओं से सांठगांठ कर जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया
- कथित तौर पर जमीन बेचने के बदले रकम के बंटवारे तक की चर्चा हुई
स्थानीय लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर वक्फ बोर्ड चाहता तो एक दिन में निर्माण रुक सकता था, फिर आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
वसीम रिजवी काल से जुड़े तार
सूत्रों के अनुसार प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा का नाम पहले भी विवादों में रहा है। बताया जा रहा है कि वह पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी के बेहद करीबी रहे और इंस्पेक्टर से लेकर प्रशासनिक अधिकारी बनने तक उनकी पकड़ मजबूत होती गई।
आरोप है कि वक्फ संपत्तियों पर कब्जे का नेटवर्क वर्षों से सक्रिय है और प्रदेश भर में कब्रिस्तानों तथा वक्फ जमीनों को धीरे-धीरे भू माफियाओं के हवाले किया जाता रहा।
“बेचारे चेयरमैन अली जैदी भी दबाव में”
सूत्रों के मुताबिक वर्तमान चेयरमैन अली जैदी भी इस पूरे मामले में खुलकर कार्रवाई नहीं कर पा रहे। आरोप है कि उन्हें इस तरह घेरा गया कि वह दूसरे कार्यकाल और राजनीतिक समीकरणों के दबाव में कठोर कदम उठाने से बचते रहे।
स्थानीय लोगों में चर्चा है कि:
“लखनऊ की तल्ख सियासत में तलवार चलाने वाले चेयरमैन भी भू माफियाओं की घुड़की के आगे खामोश हो गए।”
यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि चार्जशीटेड होने के बावजूद बिना शासन की अनुमति के कार्यकाल बढ़ाने जैसे मामलों ने बोर्ड की साख को कमजोर किया।
एलडीए, नगर निगम और पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
सेव वक्फ इंडिया ने सवाल उठाया कि:
- आखिर एलडीए ने अवैध निर्माण क्यों नहीं रोका?
- नगर निगम ने जलकर और गृहकर कैसे लगा दिया?
- पुलिस ने शिकायतों पर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की?
- स्थानीय जेई और जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें क्यों बंद कर लीं?
लोगों का कहना है कि राजधानी में अगर कब्रिस्तान की जमीन सुरक्षित नहीं है, तो बाकी वक्फ संपत्तियों का क्या हाल होगा।
सेव वक्फ इंडिया ने खोला मोर्चा
सेव वक्फ इंडिया के लखनऊ मंडल प्रभारी मौलाना इफ्तिखार हुसैन इंकलाबी ने मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर, वक्फ मंत्री, एलडीए, नगर निगम और शिया वक्फ बोर्ड को पत्र भेजकर मांग की है कि:
- अवैध कब्जेदारों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज हो
- भू माफियाओं पर गैंगस्टर एक्ट लगाया जाए
- वक्फ बोर्ड के जिम्मेदार अधिकारियों की जांच हो
- पूरे मामले की न्यायिक जांच कराई जाए
- कब्रिस्तान की मूल स्थिति बहाल की जाए
- वक्फ संपत्तियों का डिजिटल सर्वे कराया जाए
मौलाना कल्बे जवाद नकवी को भी भेजी गई प्रतिलिपि
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायत की प्रतिलिपि भारत की सुप्रीम रिलीजियस अथॉरिटी आफताबे शरीयत मौलाना कल्बे जवाद नकवी को भी भेजी गई है, ताकि धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी इस मुद्दे को उठाया जा सके।
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टापे वाली गली का यह मामला अब केवल एक कब्रिस्तान का विवाद नहीं रहा, बल्कि यह वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा, प्रशासनिक ईमानदारी और भू माफियाओं के बढ़ते नेटवर्क पर बड़ा सवाल बन चुका है।
लोगों का कहना है कि अगर मृतकों की कब्रें भी सुरक्षित नहीं रहीं, तो आने वाली नस्लों को इतिहास में केवल कब्जे, सौदेबाजी और खामोश सिस्टम की कहानियां ही मिलेंगी।




