चार्जशीटेड रिटायर्ड अधिकारी का बढ़ा कार्यकाल, खत्म होते चेयरमैन कार्यकाल के बीच औकाफ़ “खुर्द-बुर्द” होने के आरोप तेज
आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी की मुख्यमंत्री से जांच मांग के बाद चल रही कार्यवाही से बढ़ी हलचल, कई संगठनों ने सरकार को भेजे शिकायत पत्र
तहलका टुडे टीम
लखनऊ। उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड इन दिनों गंभीर विवादों, अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सुर्खियों में है। बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट अचानक बंद हो जाने, 2000 से अधिक औकाफ़ की फाइलें गायब होने तथा रजिस्टर्ड नंबर 37 से जुड़े हजारों रिकॉर्ड फाड़े जाने के आरोपों ने पूरे प्रदेश में हलचल पैदा कर दी है।
वक्फ हितैषियों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक वर्गों का आरोप है कि बोर्ड में लंबे समय से बड़े स्तर पर प्रशासनिक अव्यवस्था और रिकॉर्ड में हेरफेर चल रहा है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि महत्वपूर्ण वक्फ संपत्तियों से जुड़े दस्तावेज व्यवस्थित तरीके से गायब किए जा रहे हैं, ताकि बहुमूल्य औकाफ़ की जमीनों और संपत्तियों को खुर्द-बुर्द किया जा सके।
मामले को और गंभीर तब माना जा रहा है जब यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट “upshiacwb.org” भी बंद हो गई है। वेबसाइट पर पहले वक्फ संपत्तियों, आदेशों, नोटिस, शिकायतों और प्रशासनिक सूचनाओं का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता था। अब वेबसाइट के ठप होने से पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
WHOIS रिकॉर्ड के अनुसार डोमेन Registered On: 2016-04-30 को हुआ था और Expires On: 2027-04-30 इसके बावजूद वेबसाइट का न चलना तकनीकी लापरवाही से अधिक एक बड़े प्रशासनिक संकट की ओर इशारा माना जा रहा है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा का नाम भी चर्चा में है। आरोप है कि चार्जशीटेड होने के बावजूद उनका कार्यकाल नियम, कानून और शासनादेशों के विपरीत बढ़ाया गया। वहीं दूसरी ओर चेयरमैन अली ज़ैदी का कार्यकाल भी समाप्ति के चंद महीने बचे है। ऐसे समय में वक्फ बोर्ड में चल रही गतिविधियों को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
वक्फ मामलों से जुड़े लोगों का कहना है कि खत्म होते कार्यकाल और प्रशासनिक अस्थिरता के बीच औकाफ़ की संपत्तियों को बचाने के बजाय उन्हें बेचने, कब्जाने और रिकॉर्ड बदलने की कोशिशें तेज हो गई हैं। आरोप है कि बोर्ड के भीतर “खुराफात” का ऐसा माहौल बन चुका है जहां जवाबदेही और पारदर्शिता लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही है।
इस मामले में आफताब-ए-शरीयत मौलाना डॉ. कल्बे जवाद नकवी द्वारा मुख्यमंत्री द्वारा जांच की मांग किए जाने के बाद प्रदेशभर में यह मुद्दा और अधिक गर्म हो गया है। धार्मिक और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वक्फ की ऐतिहासिक और बहुमूल्य संपत्तियां हमेशा के लिए विवादों और कब्जों में चली जाएंगी।
सूत्रों के अनुसार कई सामाजिक, धार्मिक और वक्फ हितैषी संगठनों ने प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार, केंद्रीय वक्फ परिषद और संबंधित विभागों को लगातार शिकायत पत्र भेजे हैं। इन पत्रों में रिकॉर्ड गायब होने, वेबसाइट बंद होने, फाइलों के नष्ट किए जाने तथा भ्रष्टाचार के आरोपों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है।
जानकारी यह भी सामने आ रही है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो विभिन्न संगठन राजधानी लखनऊ में बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। इंदिरा भवन, गांधी स्मारक और विधानसभा के बाहर धरना-प्रदर्शन की रणनीति बनाई जा रही है। आंदोलनकारियों का कहना है कि वक्फ संपत्तियां उम्मत की अमानत हैं और उनकी रक्षा के लिए सड़क से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ी जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों और लगातार उठ रहे विवादों के बावजूद यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन अली ज़ैदी और मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) की ओर से अब तक कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है। उनकी चुप्पी ने संदेह और नाराजगी दोनों को बढ़ा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वक्फ रिकॉर्ड, रजिस्टर और डिजिटल डेटा सुरक्षित नहीं रहे तो भविष्य में हजारों वक्फ संपत्तियों के वास्तविक दस्तावेजों और मालिकाना स्थिति को लेकर बड़े कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं। यही कारण है कि अब यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं बल्कि धार्मिक और सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।




