एडवोकेट पुनीत चंद्रा और सिद्धार्थ सिन्हा की प्रभावशाली पैरवी के बाद शेखर हॉस्पिटल,हिंद मेडिकल कॉलेज के मुखिया डॉ. अमोद कुमार सचान को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, अग्रिम जमानत याचिका खारिज केजीएमयू से बर्खास्तगी, विजिलेंस जांच और विवेचना में सहयोग न करने के आरोपों को हाईकोर्ट ने माना महत्वपूर्ण; हजरतगंज के चर्चित मुकदमे में बड़ा आदेश

Allahabad High Court Lucknow Bench rejected the anticipatory bail plea of Dr Amod Kumar Sachan in the Hazratganj case. The court considered KGMU dismissal, vigilance inquiry and investigation-related facts before denying relief.

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रिपोर्ट: रिजवान मुस्तफा/ तहलका टुडे

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में केजीएमयू के पूर्व प्रोफेसर और हिन्द चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े डॉ. अमोद कुमार सचान की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। माननीय न्यायमूर्ति राजीव सिंह की अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया।

मामला थाना हजरतगंज, लखनऊ में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 62/2026 से जुड़ा है, जिसमें डॉ. अमोद कुमार सचान पर भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। यह विवाद इंटरलिंक्ड दवा मंडी प्राइवेट लिमिटेड, निदेशक मंडल में कथित फेरबदल, बैंक खातों के संचालन, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के परिवर्तन और कथित जालसाजी से संबंधित है।

सुनवाई के दौरान डॉ. अमोद कुमार सचान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने यह दलील दी कि पूरा विवाद कंपनी प्रबंधन और निदेशक मंडल के अधिकारों से जुड़ा है, जिसका समाधान कंपनी कानून के तहत राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) में किया जा सकता है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि एफआईआर दबाव बनाने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई है और मामले में हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।

वहीं दूसरी ओर विपक्षी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ एडवोकेट पुनीत चंद्रा और एडवोकेट सिद्धार्थ सिन्हा ने विस्तृत और प्रभावशाली बहस करते हुए न्यायालय के समक्ष कई महत्वपूर्ण तथ्य रखे। उन्होंने अदालत को बताया कि मामला केवल कंपनी विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कथित रूप से दस्तावेजों में हेरफेर, फर्जी प्रस्तावों का उपयोग, निदेशकों के अधिकारों का उल्लंघन और वित्तीय अनियमितताओं जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।

हिन्द चैरिटेबल ट्रस्ट का विवाद भी अदालत के समक्ष आया

सुनवाई के दौरान हिन्द चैरिटेबल ट्रस्ट से जुड़े विवादों का भी उल्लेख किया गया। विपक्षी पक्ष ने अदालत को बताया कि ट्रस्ट की स्थापना समाजसेवा और जनकल्याण के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन समय के साथ ट्रस्ट के संचालन और वित्तीय गतिविधियों को लेकर गंभीर प्रश्न उठे।

अदालत को यह भी बताया गया कि ट्रस्ट से जुड़े दस्तावेजों, बैंक खातों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर पहले से विवाद चल रहे हैं तथा कई मामलों में न्यायालयों और जांच एजेंसियों का हस्तक्षेप हो चुका है।

केजीएमयू से बर्खास्तगी बनी महत्वपूर्ण तथ्य

सुनवाई के दौरान विपक्षी पक्ष ने यह भी बताया कि डॉ. अमोद कुमार सचान पहले किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), लखनऊ में प्रोफेसर थे। उनके विरुद्ध निजी गतिविधियों, निजी संस्थाओं में कथित संलिप्तता और अन्य आरोपों को लेकर अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई थी।

हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों के अनुसार, जांच के बाद उनकी सेवाएं 12 जुलाई 2025 को समाप्त कर दी गई थीं। न्यायालय ने अपने आदेश में इस तथ्य का उल्लेख करते हुए इसे मामले की पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

विजिलेंस जांच का भी उल्लेख

मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) द्वारा चल रही जांच का मुद्दा भी उठा। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों में यह उल्लेख किया गया कि डॉ. सचान के विरुद्ध विजिलेंस जांच प्रचलित है।

यद्यपि यह जांच वर्तमान मुकदमे से अलग विषय है, फिर भी अदालत ने अपने आदेश में इसका उल्लेख किया और इसे रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का हिस्सा माना।

विवेचना में सहयोग न करने का आरोप

राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में यह कहा गया कि आरोपी जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे हैं। सरकारी अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए आरोपी का सहयोग आवश्यक है, जबकि जांच एजेंसी को पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है।

अदालत ने इस पहलू पर भी विचार किया और अपने आदेश में इसका उल्लेख किया।

अदालत ने क्या कहा?

माननीय न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने आदेश में कहा कि उपलब्ध अभिलेखों, दोनों पक्षों की दलीलों, मामले की प्रकृति तथा जांच की स्थिति को देखते हुए आवेदक को अग्रिम जमानत का लाभ देने का कोई आधार नहीं बनता।

अदालत ने यह भी माना कि मामले में गंभीर आरोप हैं और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आवेदक को इस स्तर पर राहत प्रदान करना उचित नहीं होगा।

इसके साथ ही अदालत ने डॉ. अमोद कुमार सचान की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

कानूनी और सामाजिक हलकों में चर्चा

हाईकोर्ट का यह आदेश राजधानी लखनऊ के कानूनी, चिकित्सा और ट्रस्ट प्रबंधन से जुड़े हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। हिन्द चैरिटेबल ट्रस्ट, इंटरलिंक्ड दवा मंडी प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़े विवाद पहले से ही सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब पुलिस विवेचना और तेज हो सकती है तथा मामले में आगे की कार्रवाई पर सभी की निगाहें रहेंगी।

फिलहाल हाईकोर्ट के इस आदेश को डॉ. अमोद कुमार सचान के लिए बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है, जबकि विपक्षी पक्ष से जुड़े अधिवक्ताओं, विशेषकर एडवोकेट पुनीत चंद्रा और एडवोकेट सिद्धार्थ सिन्हा की बहस को इस आदेश में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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