तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफा
रात के दो बजे हैं।
पूरा शहर सो चुका है।
मस्जिद की मीनार ख़ामोश है।
मंदिर के कपाट बंद हैं।
इमामबाड़े की चौखट पर सन्नाटा पसरा है।
स्कूल की कक्षाओं में अँधेरा है।
लेकिन लाखों घरों में एक रोशनी अब भी जल रही है।
वह दीये की नहीं…
उम्मीद की नहीं…
वह मोबाइल की स्क्रीन की नीली रोशनी है।
उसी रोशनी में एक पूरी पीढ़ी अपनी आँखें नहीं…
अपना भविष्य खो रही है।
माँ समझती है—बेटा पढ़ रहा है।
बाप समझता है—कोई नया हुनर सीख रहा होगा।
उस्ताद समझते हैं—बच्चा रिसर्च कर रहा है।
मौलाना समझते हैं—मोबाइल में कुरआन पढ़ रहा होगा।
पंडित जी समझते हैं—शायद कोई धार्मिक ग्रंथ देख रहा है।
लेकिन…
उस स्क्रीन के पीछे न किताब है…
न इल्म…
न तालीम…
न तहज़ीब…
वहाँ लालच बैठा है।
एक ऐसा लालच, जो कहता है—
“सिर्फ़ पाँच सौ लगाओ…”
“पाँच मिनट में पाँच हज़ार कमाओ…”
“डॉलर ऊपर जाएगा या नीचे…”
“क्रिप्टो का अगला धमाका…”
“आज किस्मत बदल जाएगी…”
और यहीं से शुरू होती है…
एक ख़ामोश तबाही।
पहले जेब खाली होती है।
फिर बैंक अकाउंट।
फिर भरोसा।
फिर रिश्ते।
फिर घर।
और आख़िर में…
इंसान अपने आप से हार जाता है।
आज नशा सिर्फ़ बोतल में नहीं मिलता।
नशा अब मोबाइल में उतर आया है।
पहले जुए के अड्डे तलाशने पड़ते थे।
अब जुआ जेब में रखा रहता है।
पहले बर्बादी घर से बाहर ले जाती थी।
अब बर्बादी घर के भीतर बैठकर पूरी हो जाती है।
मस्जिद की आख़िरी सफ़ में खड़ा नौजवान भी उसी स्क्रीन पर है।
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा लड़का भी उसी स्क्रीन पर है।
स्कूल की क्लास में बैठा छात्र भी उसी स्क्रीन पर है।
कोचिंग में बैठा बच्चा भी उसी स्क्रीन पर है।
मजलिस में बैठा नौजवान भी उसी स्क्रीन पर है।
सबको लगता है…
वह पढ़ रहा है।
असल में…
वह धीरे-धीरे डूब रहा है।
आज ऑनलाइन कैसीनो…
स्पोर्ट्स बेटिंग…
तीन पत्ती…
रम्मी…
रियल मनी गेम…
क्रिप्टो में अंधी सट्टेबाज़ी…
हाई-रिस्क ट्रेडिंग…
और न जाने कितने डिजिटल जाल…
एक पूरी पीढ़ी का वक़्त, पैसा, ज़ेहन और सुकून निगल रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ़ बैंक बैलेंस नहीं है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान है—
माँ की टूटी हुई उम्मीद।
बाप की झुकी हुई नज़र।
बहन की अधूरी शादी।
बेटी की रुकी हुई पढ़ाई।
और एक ऐसे घर का उजड़ जाना, जहाँ कभी हँसी गूँजा करती थी।
आज ज़रूरत सिर्फ़ कानून की नहीं है।
ज़रूरत जागरूक समाज की है।
मस्जिदों के मिम्बरों से भी इस पर बात होनी चाहिए।
मंदिरों के प्रवचनों में भी इसकी चर्चा होनी चाहिए।
स्कूलों की कक्षाओं में भी बच्चों को वित्तीय समझ सिखाई जानी चाहिए।
माँ-बाप को भी अपने बच्चों से यह पूछना चाहिए—
“बेटा… मोबाइल में क्या देख रहे हो?”
और उससे भी पहले…
“बेटा… तुम ठीक तो हो?”
क्योंकि कई बार…
बच्चे पैसों से पहले उम्मीद हारते हैं।
और जब उम्मीद हार जाती है…
तो घरों की दीवारें खड़ी रहती हैं…
लेकिन परिवार बिखर जाते हैं।
अगर मन्नत पूरी हो जाए…
तो चाँदी और सोने की निशानियाँ चढ़ाने से पहले…
किसी ग़रीब के घर राशन पहुँचा दीजिए।
किसी बच्चे की फ़ीस भर दीजिए।
किसी बेटी की शादी आसान कर दीजिए।
किसी बीमार का इलाज करा दीजिए।
किसी बुज़ुर्ग की आँखों में फिर से रोशनी लौटा दीजिए।
यही वह दौलत है…
जिसे कोई चोर नहीं चुरा सकता।
यही वह सदक़ा है…
जिसका सवाब हमेशा ज़िंदा रहता है।
याद रखिए…
मोबाइल बुरा नहीं है।
लेकिन मोबाइल के भीतर छिपे लालच…
कई बार पूरे ख़ानदान की तक़दीर निगल लेते हैं।
अगर आज भी हम नहीं चेते…
तो आने वाली नस्लें हमसे पूछेंगी—
“जब हमारी ज़िंदगी स्क्रीन पर बिक रही थी… तब आप सब ख़ामोश क्यों थे?”




