सैयद रिज़वान मुस्तफा
बाराबंकी।
बाराबंकी में इन दिनों लगता है व्यवस्था ने एक नया फार्मूला खोज लिया है—
सवाल उठे तो जवाब मत दो, सवाल उठाने वाले को ही सवाल बना दो!
कहीं अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल, कहीं मेडिकल स्टोर में भ्रष्टाचार वसूली का मामला, कहीं कथित वसूली की चर्चा, कहीं सरकारी कार्यालयों में बिचौलियों की शिकायत और कहीं जमीनों पर कब्जे के आरोप… लेकिन जैसे ही कोई पत्रकार इन सवालों की गठरी खोलने लगे, कहानी अचानक पलट जाती है।
अस्पताल गायब…
मेडिकल स्टोर गायब…
भ्रष्टाचार का सवाल गायब…
और सामने आ जाता है—पत्रकार!
यही तो है बाराबंकी की नई कहानी!
पहले खबर, फिर वीडियो और फिर FIR—वाह!
मामला सोशल मीडिया पत्रकार अनुज धीमान का है। उनके खिलाफ शिकायत में एक लाख रुपये मांगने, धमकी देने और पत्रकार सतीश कुमार कश्यप की छवि खराब करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
आरोप गंभीर हैं तो जांच भी गंभीर होनी चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि कहानी की शुरुआत आखिर किस मुद्दे से हुई थी?
अगर किसी पत्रकार ने सरकारी अस्पताल की डॉक्टर की भ्रष्टाचार से डूबी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया था तो सबसे पहले यह जांचिए कि अस्पताल में वास्तव में हो क्या रहा था।
अगर खबर गलत थी तो दस्तावेज निकालिए।
अगर खबर सही थी तो कार्रवाई कीजिए।
लेकिन अगर खबर पर सवाल उठाने के बजाय पत्रकार पर ही FIR हो जाए तो जनता पूछेगी—
“हुजूर, बीमारी क्या थी और इलाज किसका शुरू हो गया?”
एक लाख का सवाल—और सवाल भी पूरे एक लाख का!
FIR में आरोप है कि अनुज धीमान ने कथित तौर पर एक लाख रुपये की मांग की।
अब यह आरोप है तो पुलिस जांच करेगी।
लेकिन जनता का छोटा-सा सवाल है—
एक लाख की मांग हुई तो रिकॉर्ड कहां है?
ऑडियो है?
वीडियो है?
चैट है?
कॉल रिकॉर्ड है?
स्वतंत्र गवाह है?
फॉरेंसिक जांच हुई?
अगर सबूत है तो सामने आए।
अगर नहीं है तो जांच करे।
क्योंकि आजकल जमाना डिजिटल है साहब!
रुपया मांगने वाला भी मोबाइल रखता है और रुपया देने वाला भी।
इसलिए एक लाख की कहानी में अगर एक लाख का सबूत मिल जाए तो कहानी खुद साफ हो जाएगी।
डॉक्टर साहब का वीडियो—कहानी में नया मोड़
अब इस कहानी का दूसरा दिलचस्प किरदार है—डॉक्टर साहब का अपना वीडियो।
वीडियो सामने आया।
बातें सामने आईं।
दावे सामने आए।
अब जनता का सवाल भी सामने आ गया—
“डॉक्टर साहब ने वीडियो में जो कहा, उसकी भी जांच होगी या सिर्फ पत्रकार की?”
अगर वीडियो में अस्पताल, मरीज, मेडिकल स्टोर, किसी कथित लेन-देन या किसी अधिकारी/व्यक्ति से संबंधों का जिक्र है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए।
वीडियो में कही गई बात अपने आप में अंतिम सत्य नहीं होती, लेकिन उसे नजरअंदाज करना भी उचित नहीं।
वीडियो है तो जांचिए।
ऑडियो है तो जांचिए।
रिकॉर्ड है तो जांचिए।
आरोप है तो जांचिए।
फिर फैसला कीजिए।
मेडिकल स्टोर वाला सवाल कौन पूछेगा?
अगर किसी अस्पताल में मरीजों को बाहर से दवा खरीदने का दबाव नहीं है—बहुत अच्छी बात!
अगर किसी मेडिकल स्टोर से कोई अनुचित लेन-देन नहीं है—और भी अच्छी बात!
तो जांच कराकर साफ कर दीजिए।
मरीजों से पूछिए।
दवा की पर्चियां देखिए।
मेडिकल स्टोर के बिल देखिए।
CCTV देखिए।
स्टॉक रजिस्टर देखिए।
सिस्टम साफ है तो जांच से डर कैसा?
और अगर कोई गड़बड़ी है तो कार्रवाई होनी चाहिए।
आखिर मरीज इलाज कराने आता है,
जांच कराने नहीं!
पत्रकारों को पत्रकारों से भिड़ाने का कमाल
इस पूरे मामले का सबसे व्यंग्यात्मक पहलू यही है—
पत्रकार को पत्रकार के सामने खड़ा कर दीजिए।
एक पत्रकार कहेगा—मैं सही।
दूसरा कहेगा—मैं सही।
तीसरा मोबाइल निकालकर लाइव आ जाएगा।
चौथा बोलेगा—मेरे पास एक्सक्लूसिव है!
और जनता पूछेगी—
“भाई, अस्पताल का क्या हुआ?”
बस यही तो डर है।
कहीं पत्रकार बनाम पत्रकार की लड़ाई में जनता बनाम व्यवस्था का सवाल दब न जाए।
ABP और बड़े नामों की एंट्री
शिकायत में ABP News से जुड़े संबंधों का भी उल्लेख है।
अब पत्रकारिता में बड़ा नाम आते ही मामला थोड़ा और चमकदार हो जाता है।
लेकिन नियम बहुत सरल है—
रिश्ता है तो प्रमाण दीजिए।
रिश्ता नहीं है तो भ्रम दूर कीजिए।
किसी बड़े मीडिया संस्थान का नाम लेना किसी को ईमानदार या बेईमान नहीं बनाता।
और किसी न्यायिक अधिकारी ADJ से रिश्तेदारी का दावा भी प्रमाण के बिना तथ्य नहीं बन जाता।
नाम बड़ा हो सकता है, लेकिन सबूत उससे भी बड़ा होना चाहिए।
बाराबंकी का असली सवाल
अनुज धीमान दोषी हैं?
जांच करिए।
उन्होंने पैसे मांगे?
सबूत लाइए।
उन्होंने गलत खबर चलाई?
तथ्य बताइए।
उन्होंने किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया?
कानून अपना काम करे।
लेकिन अगर उन्होंने किसी वास्तविक समस्या पर सवाल उठाया था तो—
उस समस्या की भी जांच करिए!
यही तो निष्पक्षता है।
साहब, पत्रकार को मत खिलाइए ‘बोटी’!
क्योंकि बोटी का खेल पुराना है।
एक को इधर डालो।
दूसरे को उधर डालो।
दोनों लड़ेंगे।
फिर तीसरा मजा देखेगा।
और जिस मुद्दे पर दोनों लड़ रहे थे, वह चुपचाप फाइल के नीचे दब जाएगा।
वाह साहब!
क्या व्यवस्था है—
पत्रकार भिड़े, मुद्दा सोए, फाइल मुस्कुराए!
लेकिन अब पत्रकारों को भी समझना होगा—
**लड़ना है तो भ्रष्टाचार से लड़िए,
एक-दूसरे से नहीं।**
सवाल करना है तो व्यवस्था से करिए,
सवाल पूछने वाले से नहीं।
आज अनुज, कल कोई और
आज अनुज धीमान के खिलाफ FIR है।
कल कोई दूसरा पत्रकार हो सकता है।
इससे पहले भी कई पत्रकारों को निशाना भ्रष्टाचारी,भूमाफिया,खनन माफिया,दुराचारी भ्रष्ट तंत्र से मिलकर करवा चुके है।
अगर हर सवाल का जवाब FIR बन गया तो फिर जनता अपनी शिकायत किसके पास ले जाएगी?
पत्रकार का काम किसी की आरती उतारना नहीं।
पत्रकार का काम है—
“साहब, जवाब दीजिए!”
और अगर जवाब सही है तो खबर खत्म।
अगर जवाब गलत है तो खबर जारी।
लेकिन सवाल पूछने वाले को ही खत्म कर देना—
यह पत्रकारिता नहीं, सवाल से बचने का रास्ता हो सकता है।
अब गेंद प्रशासन के पाले में
अब जरूरत है निष्पक्ष जांच की।
डॉक्टर की शिकायत की भी।
अनुज धीमान पर लगे आरोपों की भी।
सतीश कश्यप की शिकायत की भी।
वीडियो की भी।
ऑडियो की भी।
और उस मूल मुद्दे की भी जिसके कारण पूरा विवाद पैदा हुआ।
**किसी को बचाइए मत।
किसी को फंसाइए मत।
सिर्फ सबूत देखिए।**
क्योंकि बाराबंकी की जनता को पत्रकारों की कुश्ती नहीं चाहिए।
उसे चाहिए—
अस्पताल में ईमानदार व्यवस्था,
दफ्तर में बिना दलाल काम,
मरीज को बिना दबाव इलाज,
नकली बाबू से बचाव
और पत्रकार को सवाल पूछने की आजादी।
वरना कहानी यही रहेगी—
“सवाल पत्रकार ने पूछा,
जवाब FIR ने दिया;
अस्पताल और भ्रष्टाचार में डूबा डाक्टर पीछे रह गया,
पत्रकार आगे आ गया!”
और जनता फिर वही पूछेगी—




