तहलका टुडे टीम/सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव /मोहम्मद वसीक
लखनऊ/बाराबंकी। सियासत में कुछ तस्वीरें अखबार के पन्ने के साथ पुरानी हो जाती हैं, मगर कुछ तस्वीरें किसी शहर की स्मृतियों में ठहर जाती हैं। मंगलवार को लखनऊ में नामांकन पत्र हाथ में लिए खड़ी पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत की तस्वीर भी बाराबंकी के लिए शायद ऐसी ही तस्वीर है।
विधान भवन में हलचल थी। नेताओं और कार्यकर्ताओं की आवाजाही थी। कैमरों के फ्लैश चमक रहे थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में राज्यसभा द्विवार्षिक चुनाव-2026 के लिए भाजपा प्रत्याशियों की नामांकन प्रक्रिया चल रही थी। इन्हीं चेहरों के बीच एक चेहरा ऐसा था, जिसके साथ बाराबंकी की पुरानी राजनीतिक यादें भी चली आई थीं—प्रियंका सिंह रावत।
उन्होंने राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल किया तो कागज पर हस्ताक्षर भले एक प्रत्याशी के थे, लेकिन बाराबंकी में उनके समर्थकों के लिए यह अपने जिले की आवाज के एक बार फिर संसद की ओर बढ़ने का क्षण बन गया।
एक सफर जो फिर संसद की चौखट तक पहुंचा
प्रियंका सिंह रावत के लिए संसद कोई अनजानी मंजिल नहीं है। वह बाराबंकी का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वक्त बदला, चुनाव बदले, राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, लेकिन सार्वजनिक जीवन से उनका रिश्ता बना रहा।
अब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें राज्यसभा प्रत्याशी बनाकर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के बड़े मंच के लिए चुना है।
यही वजह है कि उनके नामांकन की खबर बाराबंकी में सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति या चुनावी प्रक्रिया की तरह नहीं देखी जा रही। समर्थकों के लिए इसमें वापसी, विश्वास और नई शुरुआत—तीनों की कहानी छिपी है।
सियासत में हर रास्ता सीधा नहीं होता। कभी जनता आपको संसद पहुंचाती है, कभी संगठन आपके अनुभव पर भरोसा करके नई राह खोलता है। प्रियंका सिंह रावत की राजनीतिक यात्रा भी अब ऐसे ही एक नए मोड़ पर खड़ी है।
प्रियंका बोलीं—सम्मान नहीं, यह नई जिम्मेदारी है
राज्यसभा प्रत्याशी बनाए जाने पर प्रियंका सिंह रावत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और केंद्रीय व प्रदेश नेतृत्व के प्रति आभार जताया।
उनके संदेश में उत्सव से ज्यादा जिम्मेदारी का भाव था।
उन्होंने कहा कि भाजपा ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सम्मान, अवसर और नेतृत्व देने का काम किया है। विशेष रूप से अनुसूचित समाज के सम्मान, अधिकार और सशक्तिकरण को नई दिशा देने में पार्टी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्रियंका सिंह रावत ने संकल्प जताया कि नेतृत्व ने उन पर जो विश्वास किया है, उसे वह निष्ठा, समर्पण और जनसेवा के जरिए सार्थक करने का प्रयास करेंगी।
योगी की मौजूदगी, साथ खड़ा दिखा संगठन
नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने इस अवसर को और महत्वपूर्ण बना दिया। कार्यक्रम में केंद्रीय राज्यमंत्री एवं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक, केशव प्रसाद मौर्य, मंत्री सुरेश खन्ना, संजय निषाद सहित पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे।
नामांकन के बाद सामने आई तस्वीरों में प्रियंका सिंह रावत पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व के साथ दिखाई दीं। एक तस्वीर में नामांकन का दस्तावेज उनके हाथ में है, दूसरी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ प्रत्याशियों का समूह है।
इन तस्वीरों के अपने राजनीतिक अर्थ हैं—पार्टी ने भरोसा जताया है और अब उस भरोसे को जनविश्वास में बदलने की जिम्मेदारी प्रत्याशी की है। 
बाराबंकी के लिए क्यों खास है यह नामांकन?
बाराबंकी राजधानी लखनऊ से बहुत दूर नहीं है, मगर हर जिले की तरह उसकी भी अपनी आकांक्षाएं हैं—गांव की सड़क से रोजगार तक, किसान से नौजवान तक और स्थानीय समस्याओं से विकास की बड़ी परियोजनाओं तक।
ऐसे में जिले से जुड़ा कोई राजनीतिक चेहरा जब संसद के उच्च सदन की ओर बढ़ता है तो उम्मीदें भी उसके साथ चल पड़ती हैं।
प्रियंका सिंह रावत यदि राज्यसभा पहुंचती हैं तो उनके सामने केवल पार्टी का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी नहीं होगी; बाराबंकी की निगाहें भी उन पर होंगी।
वह किसान जो अपनी समस्या दिल्ली तक पहुंचाना चाहता है, वह नौजवान जो अपने जिले में अवसर चाहता है, वह महिला जो अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य देखती है और वह कार्यकर्ता जिसने वर्षों तक संगठन का झंडा उठाया—हर किसी की अपनी उम्मीद होगी।
यह केवल वापसी नहीं, दूसरी पारी की दस्तक है
राजनीति में पहली सफलता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन उससे भी कठिन होता है समय गुजरने के बाद दोबारा नेतृत्व का विश्वास हासिल करना।
इसीलिए प्रियंका सिंह रावत का राज्यसभा प्रत्याशी बनाया जाना उनके राजनीतिक सफर की साधारण घटना नहीं माना जा सकता। इसे उनकी राष्ट्रीय राजनीति में नई पारी की दस्तक के रूप में भी देखा जाएगा।
कल तक बाराबंकी उन्हें अपनी पूर्व सांसद के रूप में याद करता था। आज वही बाराबंकी उन्हें राज्यसभा की दहलीज पर खड़ा देख रहा है।
और शायद गांव की चौपाल पर कोई बुजुर्ग अखबार की यही तस्वीर देखकर कह रहा हो—
“अपनी बिटिया फिर दिल्ली जा रही है… इस बार उम्मीदें भी उसके साथ भेजना।”
यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। यहां कुर्सियां स्थायी नहीं होतीं, चुनाव स्थायी नहीं होते और राजनीतिक परिस्थितियां भी स्थायी नहीं होतीं—लेकिन जनता की उम्मीद बार-बार नया रास्ता खोज लेती है।
आज वह रास्ता बाराबंकी से लखनऊ होते हुए एक बार फिर दिल्ली की ओर जाता दिखाई दे रहा है।
प्रियंका सिंह रावत का नामांकन हो चुका है। अब इंतजार उस दिन का है, जब राज्यसभा के सदन में उनकी मौजूदगी के साथ बाराबंकी एक बार फिर कह सके—देश की संसद में हमारी भी आवाज है।




