“नगराम की सरज़मीं से निकला वो इल्मी चिराग जो दुनिया के हर कोने में रोशनी बांटता रहा”

THlkaEDITR
5 Min Read

प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस नगरामी साहब की याद में एक रूहानी खिराजे-अकीदत

तहलका टुडे टीम/सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा

24 जुलाई 1942 – …”अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल,
हम वो नहीं कि जिन को ज़माना बना गया…”

24 जुलाई 1942 — यह तारीख़ न सिर्फ एक विलादत का दिन है, बल्कि एक रौशनी की शुरुआत है। इस दिन नगराम, लखनऊ की मिट्टी ने एक ऐसे इंसान को पैदा किया जिसने तालीम, तहज़ीब और समाजसेवा की मिसालें कायम कीं। आज जब हम मरहूम प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस नगरामी साहब की यौमे पैदाइश पर याद कर उनकी यादों को ज़िंदा कर रहे हैं, तो यह एक औपचारिक स्मरण नहीं, बल्कि एक दिली मोहब्बत है — उस किरदार को जो आज भी ज़िंदा है, हर उस शख्स में जिसने उनसे कुछ सीखा।

✨ इल्म और अख़लाक़ की बुलंद मीनार

प्रो. यूनुस नगरामी साहब लखनऊ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा के प्रोफेसर रहे। लेकिन उनका मक़ाम सिर्फ़ किताबों और क्लासरूम तक सीमित नहीं रहा। वे एक ऐसे शिक्षक थे जो अपने लहजे, अपने अंदाज़ और अपने अमल से दिलों को जीतते थे।

उन्होंने तालीम को सिर्फ़ डिग्री का ज़रिया नहीं, बल्कि इंसान को इंसान बनाने की सूरत माना। उनकी कोशिश थी कि हर बच्चा पढ़े, समझे, और समाज का जागरूक हिस्सा बने। उन्होंने उर्दू के प्रसार के लिए सैकड़ों नाईट स्कूल शुरू कराए और लखनऊ की गलियों में इल्म की रौशनी फैलाई।

🖋️ तहरीर से तक़रीर तक: एक लेखक की रूह

उनके लिखे गए कुछ यादगार लेखों और तज़कीरात ने शिक्षा और समाज पर गहरा असर डाला।
उनकी किताब “Tazkirah Mohammad Yunus” आज भी Sufinama.org पर एक अमानत की तरह मौजूद है।

उनके बारे में The Milli Gazette ने 2001 में जो श्रद्धांजलि दी थी, उसमें लिखा:

> “He was a dynamic and active teacher who benefited thousands of seekers of knowledge. He fulfilled every responsibility he was entrusted with, with wisdom, dignity and discipline.”

यही नहीं, उन्होंने समाज और मज़हब के बीच संवाद को मज़बूत करने के लिए मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फोरम बनाया, और पूरी दुनिया में भारतीय मुसलमानों की आवाज़ बने।

🌏 नगराम से मक्का तक: एक नाम, एक पहचान

उनकी वैश्विक सोच ने नगराम जैसे छोटे से क़स्बे को मक्का, लंदन, कुवैत, जेद्दा जैसे शहरों तक पहुंचाया। वे Muslim World League की बैठकों में भारत का प्रतिनिधित्व करते थे और भारत के मुस्लिम समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और तालीमी स्थिति पर प्रभावी भाषण देते थे।

राष्ट्रपति पुरस्कार, Meer Academy Award, और Imtiyaz-e-Meer जैसे कई सम्मान उनके कार्यों के प्रमाण हैं।

👨‍👦 पिता से बेटे तक: विरासत ज़िंदा है

इस मौके पर डॉ. अम्मार नगरामी साहब से हमारी खुसूसी मुलाक़ात अम्बर फाउंडेशन के चेयरमैन वफा अब्बास के साथ हुई। उनकी आंखों में वालिद की यादें थीं, मगर आवाज़ में आत्मविश्वास। उन्होंने फरमाया:

“अब्बा जान हमारे लिए सिर्फ़ एक वालिद नहीं थे, बल्कि एक मिसाल थे इंसानियत की। मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं कि उनकी रौशनी में पला और अब उनकी राह पर चल रहा हूं।”

डॉ. अम्मार आज न सिर्फ़ उनके नाम को जिन्दा रखे हुए हैं, बल्कि अपने अमल से यह दिखा रहे हैं कि एक सच्ची विरासत क्या होती है — ऐसी जो समय से बड़ी हो जाती है।

🕌 समाज के लिए ज़िंदा किताब

यूनुस नगरामी साहब ने समाज के हर वर्ग के लिए काम किया — लड़कियों की तालीम, गरीब बच्चों की मदद, उर्दू की पुनर्स्थापना और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल।

उनकी सेवाएं ये साबित करती हैं कि वो सिर्फ़ एक प्रोफेसर नहीं थे, बल्कि समाज के रुहानी डॉक्टर थे।

📖 आख़िरी सफ़ा नहीं, हमेशा की दुआ

आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो सिर्फ़ उनके अफ़सानों को नहीं, उनकी दी हुई रौशनी को भी याद करते हैं।

“कुछ लोग फना होकर भी मिटते नहीं,
वो दिलों में उतरते हैं और रह जाते हैं।”

🤲 दुआ और इल्तिजा

हम दुआ करते हैं कि अल्लाह तआला मोहम्मद यूनुस नगरामी साहब की मग़फिरत फरमाए, उनकी रूह को करार और जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम अता फरमाए।
आमीन या रब्बल आलमीन।

✍️ ये ऑर्टिकल है, नगराम की सरज़मीं से निकली एक रौशन चिराग़ की याद में, जो बुझकर भी आज रौशनी दे रहा है।

Share This Article
Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *