बाराबंकी, 12 जुलाई /सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव
राजनीति में अक्सर भाषण सुर्खियां बनते हैं, लेकिन कभी-कभी एक पोस्टर भी इतिहास लिख देता है। बाराबंकी में ऐसा ही एक घटनाक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है।
22 मई 2026 को बाराबंकी विधानसभा से विधायक प्रत्याशी सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा ने एक भावनात्मक सार्वजनिक अपील जारी की थी। इस पोस्टर में भारत सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की गई थी। पोस्टर का संदेश था कि “गाय हमारी आस्था है, संस्कृति है, जीवन है” और उसके संरक्षण, संवर्धन तथा सम्मान को राष्ट्रीय दायित्व बताया गया था।
इस अपील की चर्चा केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांव-गांव और शहर-शहर पहुंची। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी रही कि बाराबंकी जिले में मुस्लिम परिवारों ने आपसी सौहार्द और सामाजिक सद्भाव को ध्यान में रखते हुए गाय की कुर्बानी से परहेज़ किया। यह विषय स्थानीय चर्चाओं का हिस्सा बना रहा।
इसी बीच, परमधर्माधीश जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने गौ माता के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से देशव्यापी 81 दिवसीय “गविषि (गोरक्षार्थ-धर्मयुद्ध) यात्रा” प्रारंभ की। अब इस यात्रा में बाराबंकी का शामिल होना जिले के लिए विशेष महत्व का विषय माना जा रहा है।
जब गौ संरक्षण पर बदली राजनीतिक तस्वीर
यात्रा के बाराबंकी आगमन पर एक और दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर सामने आई। सूत्रों के अनुसार, जहां इस कार्यक्रम में भाजपा की अपेक्षा समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता अधिक दिखाई दी।
दरियाबाद विधानसभा के देवीगंज चौराहे पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह ‘गोप’ सांसद तनुज पुनिया ने बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ जगद्गुरु शंकराचार्य का भव्य स्वागत किया। आरती उतारी गई, पुष्पवर्षा हुई और गौ संरक्षण के इस अभियान को समर्थन देने का संकल्प लिया गया। साथ ही गाय को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाने की मांग को आगे बढ़ाने का भी प्रण व्यक्त किया गया।
जब एक सैयद की आवाज़ आंदोलन बन गई
बाराबंकी के राजनीतिक गलियारों में आज एक चर्चा सबसे अधिक सुनाई दे रही है—“जब एक सैयद की आवाज़ आंदोलन बन गई।”
सैयद रिज़वान मुस्तफ़ा की अपील ने गौ संरक्षण के मुद्दे को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय संवाद का विषय बनाने की कोशिश की। यही कारण है कि इस मुद्दे पर अब विभिन्न विचारधाराओं के लोग भी खुलकर चर्चा कर रहे हैं।
सिर्फ राजनीति नहीं, सामाजिक संदेश भी
विश्लेषकों का मानना है कि यदि गौ संरक्षण का विषय सामाजिक सद्भाव, संवेदनशील संवाद और सभी समुदायों की भागीदारी के साथ आगे बढ़े, तो यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का माध्यम भी बन सकता है।
बाराबंकी में उभरी यह तस्वीर फिलहाल यही संकेत दे रही है कि गौ संरक्षण का मुद्दा अब केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक वर्गों के बीच भी अपनी जगह बना रहा है।




